ओशो : श्रद्धा करनी हो तो मृत्यु पर ही करनी चाहिए
श्रद्धा करनी हो तो मृत्यु पर ही करनी चाहिए क्योंकि मृत्यु कभी किसी को धोखा नहीं देती। आती ही है, कभी दगा नहीं करती। तुम कहीं भी छिपो, खोज लेती है। कभी वचन-भंग नहीं करती। इस मृत्यु के महासत्य को जो पहचान लेता है आंख भरकर, आंख मिलाकर जो देख लेता है मृत्यु की आंखों में, उसके जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है; वही क्रांति संन्यास है। फिर वह घर में रहे, बाजार में रहे, कुछ फर्क नहीं पड़ता। मृत्यु की याद ने उसकी दौड़-धूप बंद कर दी, उसकी आपाधापी गयी, उसकी महत्त्वाकांक्षा गयी। मिला तो ठीक, नहीं मिला तो ठीक। सफल हुए तो ठीक, असफल हुए तो ठीक। यश हुआ तो ठीक, अपयश हुआ तो ठीक। आएगी कल मौत, सब पर पानी फेर जाएगी। यशस्वी, अयशस्वी, सब धूल चाट जाएंगे।
ओशो
प्रेम रंग रस ओढ़ चदरिया -प्र -9
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