ओशो : भगवान महावीर और गौतम

भगवान महावीर और गौतम

गौतम उस समय का बड़ा पंडित था।

गौतम महावीर के चरणों में गिर गया। उनका शिष्‍य बन गया। गौतम इतना प्रभावित हो गया महावीर से, कि आसक्‍त हो गया,महावीर के प्रति मोह से भर गय। गौतम महावीर का  श्रेष्ठतम शिष्‍य।  उनका पहला संदेशवाहक है। लेकिन, गौतम ज्ञान को उपल्‍बध नहीं हो सका। गौतम के पीछे हजारों-हजारों लोग दीक्षित हुए और ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। और गौतम ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हो सका।   
  
जो महावीर कहते थे, वही लोगों तक पहुंचाने लगा। उससे ज्‍यादा कुशल संदेशवाहक महावीर के पास दूसरा नहीं था। लेकिन वह ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हो सका। वह उसका पांडित्य बाधा बन गया।  वह पहले भी पंडित था, वह अब भी पंडित था। 

अब महावीर जो जानते थे, कहते थे,  वह उसी को दोहराने लगा। हो सकता है महावीर से भी बेहतर दोहराने लगा हो। लेकिन ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हुआ। वह पंडित ही रहा। उसने जिस तरह बाहर की जानकारी इकट्ठी की थी,उसी तरह उसने भीतर की जानकारी भी इकट्ठी कर ली। यह भी जानकारी रही,यह भी ज्ञान न बना।

गौतम बहुत रोता था। वह महावीर से बार-बार कहता था, मेरे पीछे आये लोग,मुझसे कम जानने वाले  लोग, साधारण लोग, मेरे जो शिष्‍य थे वे, आपके पास आकर ज्ञान को उपलब्‍ध हो गये। मैं कब पहुंच पाऊंगा?

जिस दिन महावीर की अंतिम घड़ी आयी, उस दिन गौतम को महावीर ने पास के गांव में संदेश देने भेजा था। गौतम लौट रहा है गांव से संदेश देकर, तब राहगीर ने रास्‍ते में खबर दी कि महावीर निर्वाण को उपलब्‍ध हो गये। गौतम वहीं छाती पीटकर रोने, लगा,सड़क पर बैठकर। मेरा क्‍या होगा? उनके बिना अब क्‍या होगा। अब मैं अनंत काल तक भटकूंगा।  वैसा गुरु अब कहां मिलेगा?  कठोरता की उन्‍होंने मुझ पर? जब जाने की घड़ी थी तो मुझे दूर क्‍यों भेज दिया?

 राहगीरों ने कहा है.....कि तेरा उन्‍होंने स्‍मरण किया और उन्‍होंने कहा है कि गौतम को यह कह देना।  यह जो सूत्र है, यह गौतम के लिए कहलवाया गया है।

‘’जैस कमल शरद-कमल के निर्मल जल को भी नहीं छूता और अलिप्‍त रहता है। वैसे ही संसार अपनी समस्‍त आसक्‍तियां मिटा कर सब प्रकार के स्‍नेह-बंधनों से रहित हो जा। अत: गौतम, क्षण मात्र भी प्रमाद मत कर।‘’

ये जो आखिरी शब्‍द है कि तू संसार के सागर को पार कर गया—गौतम पत्‍नी को छोड़ आया, बच्‍चों को छोड़ आया। धन को छोड़ आया, मान प्रतिष्‍ठा को,पद को अहंकार को छोड़ आया। तू प्रख्‍यात था, इतने लोग जानते थे, सैकड़ों लोगों का तू गुरु था। अब उसको छोड़ कर महावीर के चरणों में गिर गया। सब छोड़ आया। तो महावीर कहते है, तूने पूरे सागर को छोड़ दिया गौतम, लेकिन अब तू किनारे को पकड़कर अटक गया। तूने मुझे पकड़ लिया। किनारे को पकड़े लिया? अब मुझे भी छोड़।



किनारा चढ़ने को है, बाधा बनने को नहीं। इसे भी छोड़ दे और इसके भी पार हो जा।


ओशो
महावीर वाणी


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