ओशो : मन की प्रसन्नता को साधो।
ओशो-गीता दर्शन - भाग –8
मन की प्रसन्नता को साधो। जितने तुम मन को प्रसन्न कर सकोगे, तुम पाओगे कि तुम उतने ही मन के पार जाने लगे। मन की प्रसन्नता मन के पार ले जाने का उपाय है।
मन की प्रसन्नता ऐसे है, जैसे फूल की गंध। फूल तो पीछे पड़ा रह जाता है, गंध ऊपर उठ जाती है। जब तुम्हारा मन प्रसन्न होता है, मन तो नीचे पड़ा रह जाता है, प्रसन्नता की गंध ऊपर उठ जाती है। सिर्फ प्रसन्नचित्त लोगों ने ही परमात्मा को जाना है, वह नाचते हुए लोगों का अनुभव है। उदास, बीमार, रुग्णचित्तों का अनुभव नहीं है। क्योंकि परमात्मा यानी परम उत्सव।
प्रसन्न होकर तैयारी करो। नाचने का थोड़ा अभ्यास करो; थोड़े पैरों में अर बांधो, कंठ को मधुर करो, गीत को गुंजने दो। क्योंकि उस परम उत्सव में तुम तभी सम्मिलित किए जा सकोगे, जब तुम्हारी थोड़ी तैयारी होगी।
मन की प्रसन्नता और शात भाव…….।
क्योंकि मन की प्रसन्नता उथली भी हो सकती है। जैसे बाजार में खड़े सड्कों पर लोग हंसते हैं। वह हंसना उथला है। उसमें कोई गहराई नहीं है। वह ऐसे ही है, जैसे छिछली नदी में शोरगुल होता है, कंकड़—पत्थरों में आवाज होती है। और गहरी नदी में सब शात हो जाता है। गहरी नदी भी प्रसन्न होती है, लेकिन शात होती है। तुम गहरी नदी की तरह शात भी रहो और प्रसन्न भी। तुम्हारी प्रसन्नता खिलखिलाहट की तरह नहीं होगी, स्मित की तरह होगी, मुस्कुराहट की तरह होगी। और भीतर एक शात पृष्ठभूमि हो, मौन। और तुम्हारी प्रसन्नता, तुम्हारी हंसी कुछ कहे न। सिर्फ तुम्हें प्रकट करे, कुछ कहे न।
कोई गिर गया छिलके पर फिसलकर, तुम हंस दिए। यह मौन नहीं है हंसना। तुम व्यंग्य कर रहे हो। तुम गाली से भी गहन चोट पहुंचा रहे हो उस आदमी को, जो गिर पड़ा है। तुम्हारी हंसी कुछ न कहे, सिर्फ तुम्हें कहे। तुम्हारे मौन को प्रकट करे तुम्हारी प्रसन्नता। मन का निग्रह..।
मन के निग्रह का अर्थ है कि तुम मन के प्रति सदा जागे रहो; मन के साथ तादात्म्य न हो जाए। क्रोध आए, तो भी तुम जागकर जानते रहो कि क्रोध ने मुझे घेरा है, लेकिन मैं क्रोध नहीं हूं। मैं क्रोध से अलग हूं। मैं साक्षी हूं। साक्षी— भाव है मन का निग्रह।
भाव की पवित्रता।
कुछ भी हो, तुम भाव को अपवित्र मत करो। एक आदमी तुम्हें धोखा दे दे, तो दो उपाय हैं। एक तो यह है कि तुम भाव को अपवित्र कर लो कि यह आदमी बुरा है और अब कभी किसी का भरोसा न करूंगा। और इस आदमी का तो अब कभी भरोसा नहीं करूंगा। और यह आदमी चोर है, बेईमान है। और तुमने अपने भाव को कलुषित कर लिया।
बड़े मजे की बात यह है कि उसने तुम्हें चोरी करके जितना नुकसान पहुंचाया, उससे ज्यादा नुकसान तुम अपने भाव को अपवित्र करके पहुंचा रहे हो। यह भी हो सकता था कि तुम कहते कि बेचारा आदमी, शायद तकलीफ में होगा, गरीबी में होगा, मुसीबत में होगा। उपाय नहीं खोज सका कोई, इसलिए चोरी की है। और मुझे अगर समझ आ जाती कि इसको चोरी करनी पड़ेगी, तो मैं ऐसे ही दे देता।
तुम अपने भाव को बचाओ; क्योंकि अंतिम रूप से भाव ही तुम्हारी संपदा है। इस संसार में किसने तुम्हें धोखा दिया, किसने नहीं दिया, इसका कोई हिसाब आखिरी में नहीं बचेगा। तुम्हारा भाव क्या रहा; बस, वही बचेगा।
भाव की पवित्रता, ऐसे यह मन संबंधी तप कहा जाता है।
ये तीन तप अगर तुम साध सको, तो तुम्हारे भीतर सत्व का उदय होगा। तुम सात्विक हो सकते हो।
आज इतना ही।
ओशो - गीता दर्शन – भाग - 8, - अध्याय—17
(प्रवचन—सातवां) - शरीर, वाणी और मन के तप
मन की प्रसन्नता को साधो। जितने तुम मन को प्रसन्न कर सकोगे, तुम पाओगे कि तुम उतने ही मन के पार जाने लगे। मन की प्रसन्नता मन के पार ले जाने का उपाय है।
मन की प्रसन्नता ऐसे है, जैसे फूल की गंध। फूल तो पीछे पड़ा रह जाता है, गंध ऊपर उठ जाती है। जब तुम्हारा मन प्रसन्न होता है, मन तो नीचे पड़ा रह जाता है, प्रसन्नता की गंध ऊपर उठ जाती है। सिर्फ प्रसन्नचित्त लोगों ने ही परमात्मा को जाना है, वह नाचते हुए लोगों का अनुभव है। उदास, बीमार, रुग्णचित्तों का अनुभव नहीं है। क्योंकि परमात्मा यानी परम उत्सव।
प्रसन्न होकर तैयारी करो। नाचने का थोड़ा अभ्यास करो; थोड़े पैरों में अर बांधो, कंठ को मधुर करो, गीत को गुंजने दो। क्योंकि उस परम उत्सव में तुम तभी सम्मिलित किए जा सकोगे, जब तुम्हारी थोड़ी तैयारी होगी।
मन की प्रसन्नता और शात भाव…….।
क्योंकि मन की प्रसन्नता उथली भी हो सकती है। जैसे बाजार में खड़े सड्कों पर लोग हंसते हैं। वह हंसना उथला है। उसमें कोई गहराई नहीं है। वह ऐसे ही है, जैसे छिछली नदी में शोरगुल होता है, कंकड़—पत्थरों में आवाज होती है। और गहरी नदी में सब शात हो जाता है। गहरी नदी भी प्रसन्न होती है, लेकिन शात होती है। तुम गहरी नदी की तरह शात भी रहो और प्रसन्न भी। तुम्हारी प्रसन्नता खिलखिलाहट की तरह नहीं होगी, स्मित की तरह होगी, मुस्कुराहट की तरह होगी। और भीतर एक शात पृष्ठभूमि हो, मौन। और तुम्हारी प्रसन्नता, तुम्हारी हंसी कुछ कहे न। सिर्फ तुम्हें प्रकट करे, कुछ कहे न।
कोई गिर गया छिलके पर फिसलकर, तुम हंस दिए। यह मौन नहीं है हंसना। तुम व्यंग्य कर रहे हो। तुम गाली से भी गहन चोट पहुंचा रहे हो उस आदमी को, जो गिर पड़ा है। तुम्हारी हंसी कुछ न कहे, सिर्फ तुम्हें कहे। तुम्हारे मौन को प्रकट करे तुम्हारी प्रसन्नता। मन का निग्रह..।
मन के निग्रह का अर्थ है कि तुम मन के प्रति सदा जागे रहो; मन के साथ तादात्म्य न हो जाए। क्रोध आए, तो भी तुम जागकर जानते रहो कि क्रोध ने मुझे घेरा है, लेकिन मैं क्रोध नहीं हूं। मैं क्रोध से अलग हूं। मैं साक्षी हूं। साक्षी— भाव है मन का निग्रह।
भाव की पवित्रता।
कुछ भी हो, तुम भाव को अपवित्र मत करो। एक आदमी तुम्हें धोखा दे दे, तो दो उपाय हैं। एक तो यह है कि तुम भाव को अपवित्र कर लो कि यह आदमी बुरा है और अब कभी किसी का भरोसा न करूंगा। और इस आदमी का तो अब कभी भरोसा नहीं करूंगा। और यह आदमी चोर है, बेईमान है। और तुमने अपने भाव को कलुषित कर लिया।
बड़े मजे की बात यह है कि उसने तुम्हें चोरी करके जितना नुकसान पहुंचाया, उससे ज्यादा नुकसान तुम अपने भाव को अपवित्र करके पहुंचा रहे हो। यह भी हो सकता था कि तुम कहते कि बेचारा आदमी, शायद तकलीफ में होगा, गरीबी में होगा, मुसीबत में होगा। उपाय नहीं खोज सका कोई, इसलिए चोरी की है। और मुझे अगर समझ आ जाती कि इसको चोरी करनी पड़ेगी, तो मैं ऐसे ही दे देता।
तुम अपने भाव को बचाओ; क्योंकि अंतिम रूप से भाव ही तुम्हारी संपदा है। इस संसार में किसने तुम्हें धोखा दिया, किसने नहीं दिया, इसका कोई हिसाब आखिरी में नहीं बचेगा। तुम्हारा भाव क्या रहा; बस, वही बचेगा।
भाव की पवित्रता, ऐसे यह मन संबंधी तप कहा जाता है।
ये तीन तप अगर तुम साध सको, तो तुम्हारे भीतर सत्व का उदय होगा। तुम सात्विक हो सकते हो।
आज इतना ही।
ओशो - गीता दर्शन – भाग - 8, - अध्याय—17
(प्रवचन—सातवां) - शरीर, वाणी और मन के तप
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