ओशो : आत्म परिवर्तन के लिए चाहिए मौन और प्रेम !

आत्म परिवर्तन के लिए चाहिए मौन और प्रेम !

जो चुप नहीं हो सकता वह जीवन को कभी भी नहीं बदल सकता है। गहरी चुप्पी में ही, गहरे मौन में ही, गहरे साइलेंस में ही मनुष्य के भीतर क्रांति की, आत्म-परिवर्तन की क्षमता के दर्शन होते हैं। इतनी विराट शक्ति का अनुभव होता है कि कुछ भी बदला जा सकता है। इतनी बड़ी आग उपलब्ध हो जाती है कि कचरे को जलाया जा सकता है। उसके पहले तो जिंदगी में कोई क्रांति, कोई ट्रांसफार्मेशन नहीं हो सकता है।

इसलिए पहला ध्यान इस तरफ दें। चैबीस घंटे दौड़ते हैं, आधा घंटा न दौड़ें। चैबीस घंटे मन को काम में रखते हैं, आधा घंटा बेकाम छोड़ दें। चैबीस घंटे उलझे हुए हैं, आधा घंटे केवल साक्षी रह जाएं। यह तो पहला सूत्र है। और आज तक जगत में जिन लोगों ने भी कुछ जाना है, इस सूत्र के बिना नहीं जाना है। जो भी सत्य, जो भी सौंदर्य, जो भी श्रेष्ठ अनुभूतियां उपलब्ध हुई हैं, वे मौन में, एकांत में, शांति में, ध्यान में उपलब्ध हुई हैं। तो जिसकी भी आकांक्षा है, जिसके प्राणों में भी प्यास है उसे मौन की दिशा में कदम रखने होंगे। यह पहला सूत्र है।

दूसरा सूत्र भी इतना ही महत्वपूर्ण, इतना ही गहरा और इतना ही जरूरी है। मन के तल पर चाहिए मौन, हृदय के तल पर चाहिए प्रेम। मन तो हो जाए चुप, शून्य और हृदय भर जाए प्रेम से, हो जाए पूर्ण। लेकिन हम प्रेम को भी जीवन में जीते नहीं। प्रेम भी हमारे जीवन में छिपा ही पड़ा रह जाता है, उसे हम कभी विकसित नहीं करते। प्रेम के बीज भी हमारे जीवन में कभी वृक्ष नहीं बन पाते। पता नहीं किस कारण इतनी बड़ी सम्पत्ति को पाकर भी हम दरिद्र रह जाते हैं?

एक ही डर काम करता है जिससे जीवन में प्रेम विकसित नहीं हो पाता, एक ही भूल काम करती है। वह भूल मैं आपको कहूं, तो शायद प्रेम के द्वार खुल सकते हैं। और वह भूल यह हैः उस आदमी के जीवन में प्रेम कभी विकसित न होगा जो हमेशा दूसरों से प्रेम मांगता रहेगा। उसके जीवन में कभी प्रेम विकसित न होगा। जो प्रेम को मांगेगा उसके भीतर प्रेम हमेशा बीज की भांति पड़ा रह जाएगा। प्रेम कभी विकसित न होगा।

और ये भी समझ लें, जिसके भीतर प्रेम विकसित न होगा, वह चाहे दर-दर भीख मांगता फिरे, उसे प्रेम मिल भी नहीं सकता। क्योंकि प्रेम मिलता है प्रेम देने से, मांगने से नहीं। और जितना वह प्रेम को मांगता फिरता है, उतना ही उसके भीतर प्रेम विकसित नहीं हो पाता। क्योंकि प्रेम विकसित होता है देने से। प्रेम दान से विकसित होता है। और अपने भीतर गठरियां बांध कर रख लेने से सड़ जाता है और नष्ट हो जाता है।

हम सब अपने-अपने प्रेम की गठरियां बांधे हुए हैं, तिजोड़ियां बंद किए हुए हैं। शायद हम समझते हों कि जिस भांति रुपयों पर लोहे की तिजोड़ियां लगानी पड़ती हैं, तभी रुपया बचता है। इसी भांति प्रेम पर भी हम तिजोड़ियां बंद किए हुए हैं। हमको पता ही नहीं रुपये का कानून अलग है और प्रेम का कानून अलग है। रुपया बंद करने से सुरक्षित होता है, प्रेम बंद करने से मर जाता है। रुपयों को तिजोड़ी में बंद करने वाला अगर कहीं फूलों को ले जाकर तिजोड़ी में बंद कर दे तो क्या होगा? फूल मर जाएंगे। क्योंकि फूलों का नियम अलग है, रुपयों का नियम अलग है।

हम प्रेम के साथ भी संपत्ति जैसा व्यवहार करते हैं इसलिए प्रेम विकसित नहीं हो पाता। बड़ा मजा यह हैः प्रेम बांटने से विकसित होता है, लुटाने से विकसित होता है। जो जितनी जोर से अपने भीतर से प्रेम उलीचता है, उतना ही उसका हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है, उतना ही भर जाता है। और हम सब बहुत कृपण और कंजूस हैं।

रुपये के संबंध में कोई कंजूस हो तो कोई हर्जा नहीं, लेकिन प्रेम के संबंध में कंजूसी आत्मघात सिद्ध होती है। प्रेम के संबंध में जो कृपण हैं, वे ही अधार्मिक हैं, उसी को मैं इररिलिजीयस कहता हूं। और प्रेम के संबंध में जो मुक्त हस्त, बांटने को उत्सुक है वही धार्मिक है। प्रेम को जो उलीचता रहता है और बांटता रहता है वही धार्मिक है।

ओशो

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