ओशो : धर्म को समझना लगभग असम्भव है

धर्म को समझना लगभग असम्भव है

तर्क कहता है: जीवन जीवन है और वह कभी भी मृत्यु नहीं बन सकता।
जीवन, मृत्यु कैसे हो सकता है?
लेकिन वास्तविक यथार्थ अथवा सत्य यही है-
कि जीवन प्रत्येक क्षण मृत्यु की ओर बढ़ रहा है,
और जीवन मृत्यु भी है।
तर्क कहता है : प्रेम, प्रेम है, और वह कभी भी घृणा नहीं बन सकता
लेकिन प्रेम प्रत्येक क्षण गतिशील होकर घृणा बन रहा है
और घृणा प्रत्येक क्षण गति करती हुई प्रेम बन रही है।
तुम उसी व्यक्ति से प्रेम करते हो, और तुम उसी व्यक्ति से घृणा करते हो।
जितना गहरा प्रेम होता है, उतनी ही गहरी घृणा होती है।
घृणा और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
क्या तुम किसी व्यक्ति को प्रेम किए बिना, घृणा कर सकते हो?
तुम एक व्यकि्त से बिना प्रेम किए कैसे घृणा कर सकते हो?
पहले तुम्हें प्रेम करना होगा, केवल तभी तुम घृणा कर सकते हो।
घृणा के पहले कदम के लिए प्रेम जरूरी है।
तुम किसी व्यक्ति के साथ यदि कभी मित्र बनकर नहीं रहे हो,
तो कैसे उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हो सकते हो?
केवल तर्क में ही मित्र और शत्रु अलग होते हैं,
वास्तविक सत्य यही है कि वे एक साथ ही होते हैं।
यदि तुम गहराई से अपनी घृणा में खोजो, तो यहां छिपा हुआ प्रेम पाओगे।
जिस क्षण तुम जन्म लेते हो, मृत्यु का जन्म भी तुम्हारे ही साथ हो जाता है।
जन्म है मृत्यु का प्रारम्भ,
और मृत्यु है जन्म की ओर निरंतर आगे बढ़ना।

हेराक्लाईटिस कहता है:
परमात्मा जन्म भी है और मृत्यु भी।
वह ग्रीष्म भी है और शरद ऋतु भी।
वह भूख भी है और तृप्ति भी।
वह अच्छा भी है और बुरा भी।
वह सदा दोनों एक साथ है।
और परमात्मा ही सत्य है। वही अखण्ड अस्तित्व भी है।
यदि तुम सत्य की ओर देखो, तो देखोगे कि उसमें सभी विपरीताएं मिल रही
हैं। सत्य विरोधाभासी है, और तर्क है संगत।
तर्क है सीधा सपाट और स्पष्ट, और सत्य है बहुत जटिल।

अथवा वह गणित की कोई समस्या नहीं है-उसके बहुत से आयाम हैं।
और वे सभी अंतर्संबंधित हैं, उसमें सभी विरोधाभास एक साथ हैं
दिन, रात में बदल रहा है, रात फिर दिन में बदल रही है।
सुबह और कुछ भी नहीं, बल्कि शाम के आने का संकेत है।
युवावस्था, वृद्धावस्था में बदल रही है। सुंदरता, कुरूपता में परिवर्तित हो रही
है। प्रत्येक वस्तु बदल रही है, और बदल कर ठीक उससे विपरीत बन रही है।
इसे बहुत गहराई से समझ लेना है,
क्योंकि दर्शनशास्त्र और धर्म के मध्य यही मौलिक अंतर है।
दर्शनशास्त्र तर्कप्रधान है, जब कि धर्म ऐसा नहीं है।
दर्शनशास्त्र, तार्किक निष्पत्ति है, जब कि धर्म सत्य है, एक वास्तविकता है।
दर्शनशास्त्र को समझना कठिन नहीं है जब कि धर्म को समझना लगभग
असम्भव है।

ओशो

ऋतु आये फल होय-(प्रवचन-07)
मैं अभी मरा नहीं हूं—(प्रवचन-सातवां) 
ऋतु आये फल होय--The Gras grow by Itself--
 (ज़ेन पर ओशो द्वारा दिनांक 27 फरवरी 1975 में अंग्रेजी में दिये गये अमृत प्रवचनों का हिन्दी में अनुवाद)

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