ओशो : प्रार्थना

" दीवानापन न हो तो प्रार्थना कैसी ? "

अकबर एक सांझ जंगल में शिकार खेलने गया था। लौट रहा था, सांझ हो गयी, नमाज पढ़ने बैठा। जब नमाज पढ़ रहा था, अपना दस्तरखान बिछा कर, एक युवती भागती हुई निकली। अल्हड़ युवती रही होगी। थी युवती कि मुझे मिल जाती तो मेरी संन्यासिनी होती। एक धक्का मार दिया अकबर को। वे बेचारे बैठे थे अपना नमाज पढ़ने, धक्का खा कर गिर पड़े। मगर नमाज में बीच में बोलना ठीक भी नहीं। बीच में बोलना तो बहुत चाहा, दिल तो हुआ कि गर्दन पकड़ कर दबा दें इस औरत की, कि गर्दन उतार दें, मगर नमाज बीच में तोड़ी नहीं जा सकती। इसलिए पी गए जहर का घूंट। और युवती जब लौट रही थी तो नमाज तो खत्म हो गयी, अकबर राह देख रहा था उसकी। जब वह लौटी तो अकबर ने कहा कि रूक बदतमीज! तुझे इतनी भी तमीज नहीं कि कोई नमाज पढ़ता हो तो उसे धक्का मारना चाहिए? फिर तुझे यह भी नहीं दिखाई पड़ता कि मैं सम्राट हूं! साधारण आदमी को भी नमाज पढ़ने में धक्का नहीं मारना चाहिए, सम्राट को धक्का मारा!

 युवती ने कहा: ‘क्षमा करें, अगर आप को धक्का लगा हो! मुझे कुछ याद नहीं। बहुत दिनों बाद मेरा प्रेमी आ रहा था। मैं तो उसका स्वागत करने भागी चली जा रही थी। मुझे कुछ ओर दिखाई पड़ नहीं रहा था सिवाए उसके। मुझे याद भी नहीं। आप कहते हैं तो जरूर धक्का लगा होगा। हालांकि जब आपको धक्का लगा तो मुझको भी लगा होगा, क्योंकि हम दोनों टकराए होंगे; मगर मुझे कुछ याद नहीं। मुझे क्षमा कर दें, या जो दंड देना हो दे दें। मैं दीवानी हूं! मैं प्रेमी के पागलपन में चली जा रही थी भागी, मुझे पता नहीं कौन नमाज पढ़ रहा था, कौन नहीं पढ़ रहा था, कौन रास्तें में था, कौन नहीं था, किससे टकरायी, किससे नहीं टकरायी। लेकिन एक बात आपसे पूछती हूं, सजा जो देनी हो दे दें, एक बात का जवाब मुझे जरूर दे दें। मैं अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी और इतनी दीवानी थी और आप परमात्मा से मिलने गए हुए थे और मेरा धक्का आपको याद आ गया! और मेरा धक्का आपको दिखाई पड़ गया! और मेरे धक्के का आपको पता चल गया! मैं तो अपने साधारण से प्रेमी से मिलने जा रही थी-एक साधारण भौतिक-सी बात; और आप तो आध्यात्मिक नमाज में थे, प्रार्थना में थे; पूजा में थे, ध्यान में थे! आप तो परमात्मा से मिलन कर रहे थे! आपको मेरा धक्का पता चल गया! यह बात मेरी समझ में नहीं आती।’

 कहते हैं अकबर का सिर झुक गया शर्म से। उसने अपने जीवन में उल्लेख करवाया है कि उस युवती ने मुझे पहली दफा बताया कि मेरी नमाज सब थोथी है, औपचारिक है। बस करता हूं, क्योंकि करनी चाहिए। उस युवती से मैंने पहली दफा जाना कि नमाज में एक दीवानापन होना चाहिए, एक मस्ती होनी चाहिए। अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी तो कैसी मस्त थी, कैसी अल्हड़ थी! और मैं परमात्मा से मिलने जा रहा था, क्या खाक मिलने कहीं गए थे! वहीं बैठे थे, नाहक आंखें बंद किए।

ओशो

उड़ियो पंख पसार
(प्रवचन-03)

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