ओशो : प्रेम पथ

प्रेम पथ

सदगुरुओं के प्रेम के नीचे,
शिष्य परमात्मा को उपलब्ध हो गये हैं ।
बिना कुछ किए भी कभी यह घटा है ।
और कभी कभी बहुत कुछ करने पर भी,
अगर सदगुरू की प्रेम छाया ना हो,
तो कुछ भी नही घटा है ।
इसलिए तो समर्पण का कुल इतना ही अर्थ है कि
गुरु के जीवन से जो प्रेम की धारा बह रही है,
उसके लिए तुम दीवाल मत बनो,
दरवाजा बन जाओ।
                           ओशो
          सबै सयाने एक मत, अंश प्रवचन

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