ओशो : संगठन और धर्म

संगठन और धर्म
 
धर्म का कोई भी संगठन नहीं होता है ;
न हो सकता है । और धर्म के कोई भी संगठन बनाने का
परिणाम धर्म को नष्ट करना ही होगा ।

धर्म नितांत वैयक्तिक बात है , एक-एक व्यक्ति के जीवन में
घटित होती है ; संगठन और भीड़ से उसका कोई भी संबंध
नहीं है ।

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि और तरह के संगठन
नहीं हो सकते हैं । सामाजिक संगठन हो सकते हैं ,
शैक्षणिक संगठन हो सकते हैं , नैतिक-सांस्कृतिक संगठन
हो सकते हैं , राजनैतिक संगठन हो सकते हैं ।
सिर्फ धार्मिक संगठन नहीं हो सकता है ।

धार्मिक होना दूसरी ही बात है । उसके लिए किसी संगठन
का सदस्य होने की जरूरत नहीं है । बल्कि सच तो यह है
कि जो किसी संगठन का -- धार्मिक संगठन का --- सदस्य
है , वह धार्मिक संगठन की सदस्यता उसके धार्मिक होने में
निश्चित ही बाधा बनेगी । क्योंकि संगठन में होने का अर्थ
संप्रदाय में होना है । संप्रदाय और धर्म विरोधी बातें हैं ।
संप्रदाय तोड़ता है , धर्म जोड़ता है ।

इस समाज में इतनी बीमारियां हैं , इतने रोग हैं , इतना उपद्रव
है , इतनी कुरूपता है कि जो मनुष्य भी धार्मिक है , वह मनुष्य
चुपचाप इस कुरूपता , इस गंदगी , इस समाज की मूर्खता को
सहने को तैयार नहीं हो सकता ।

जो मनुष्य धार्मिक है वह बरदाश्त करने को तैयार नहीं होगा
कि यह कुरूप समाज जिंदा रहे और चलता रहे ।
जिस मनुष्य के जीवन में भी थोडी़ धर्म की किरण आई है
वह इस समाज को आमूल बदल देना चाहेगा ।

जो व्यक्ति भी थोडा़-सा प्रबुद्ध होगा , शांत होगा , जीवन को
देखेगा और समझेगा , यह हिंसा होगी उसकी तरफ से कि
वह इस समाज को जैसा यह है वैसा ही चलने दे । कोई धार्मिक मनुष्य इस समाज की मौजूदा स्थिति को बरदाश्त
नहीं कर सकता है , सिर्फ अधार्मिक लोग ही बरदाश्त कर
सकते हैं । वे , जिनके प्राणों में कोई करुणा नहीं है , वे ही
समाज में चलती हुई कुरूपता को देख सकते हैं । वे , जिनके
जीवन में प्रेम की कोई किरण नहीं है , वे ही घृणा के इतने
अंधकार को सह सकते हैं । वे , जिनके भीतर मनुष्यता मर
गई है , वे ही अपने चारों तरफ मनुष्यता के मरे हुए रूप के
बीच रहने को राजी हो सकते हैं ।

या तो धार्मिक आदमी इस समाज को बदलेगा , बदलने की
कोशिश करेगा , या अपने को मिटा देगा , लेकिन इसी समाज
में रहने की तैयारी उसकी नहीं हो सकती है ।

जिन लोगों के जीवन में भी थोडी़-सी शांति फलित होगी ,
जिनके जीवन में भी प्रभु का थोड़ा-सा प्रकाश आएगा ,
क्या वे समाज को ऐसा ही देखते रहेंगे जैसा कि समाज है ?
यह बरदाश्त के बाहर है । धार्मिक मनुष्य बुनियादी रूप से
विद्रोही होगा । और अगर आज तक दुनिया में धार्मिक मनुष्य
विद्रोही नहीं हुआ तो उसका एक ही कारण है कि वह मनुष्य
धार्मिक ही न रहा होगा । धार्मिक आदमी रिबेलियस होगा
ही । उसके जीवन में क्रांति होगी ही ।

लेकिन क्रांति तो अकेले नहीं हो सकती , क्रांति के लिए तो
संगठन चाहिए ; क्योंकि जब हम क्रांति करने चलते हैं तो
क्रांति को रोकने वाली जो शक्तियां हैं वे संगठित हैं । उनके
खिलाफ एक आदमी का क्या अर्थ है ? क्रांति के विरोध में
जो प्रतिगामी , जो रिएक्शनरी फोर्सेज हैं वे सब संगठित हैं ।
उनके खिलाफ एक आदमी का क्या प्रयोजन है ?
क्या अर्थ है ?

जिंदगी में जो लोग गलत हैं वे संगठित खडे़ हुए हैं और
अच्छा आदमी यह सोच कर कि संगठन की क्या जरूरत है ,
बुरे आदमियों का साथी और सहयोगी बनता है ।
यह ध्यान रखना चाहिए , चोर और बदमाश सब संगठित हैं ।
राजनीतिज्ञ संगठित हैं । जिंदगी को खराब करने वाले सारे
लोग संगठित हैं । और अच्छा आदमी सोचता है , ........
संगठन की क्या जरूरत है !

तो फिर इसका एक ही फल होगा कि यह अच्छा आदमी भी --
चाहे जानते हुए , चाहे न जानते हुए -- बुरे आदमियों का एजेंट
सिद्ध होगा । क्योंकि बुरे आदमियों के संगठित रूप को बदलने
के लिए अच्छे आदमियों के भी संगठन की अत्यंत अनिवार्य
जरूरत है । पर एक बात ध्यान में रखते हुए कि वह संगठन
धार्मिक नहीं है , उस संगठन का धर्म से सीधा संबंध नहीं है ।
धार्मिक लोग उस संगठन में हो सकते हैं , लेकिन उस संगठन
की सदस्यता से कोई धार्मिक नहीं होता है ।
सामाजिक क्रांति की दृष्टि को ध्यान में लेकर एक संगठन
अत्यन्त जरूरी है ।

लेकिन धार्मिक लोगों का संगठन है सामाजिक परिवर्तन और
क्रांति के लिए । इसकी सदस्यता से कोई धार्मिक नहीं हो
जाएगा ; लेकिन जो लोग चाहते हैं कि समाज को , जीवन को ,
नीति को , चलती हुई व्यवस्था को , परंपरा को बदला जाए ,
वे लोग इस संगठन के सदस्य हो सकते हैं और इस संगठन
को मजबूत बना सकते हैं । यह संगठन सामाजिक क्रांति का
संगठन होगा , धार्मिक नहीं ; सोशल रिफॉर्म के लिए ;
धार्मिक शांति के लिए नहीं , सामाजिक क्रांति के लिए ।

यह हमेशा से दुर्भाग्य रहा है कि बुरे आदमी सदा से संगठित
रहे हैं , अच्छा आदमी हमेशा अकेला खडा़ रहा है ।
और इसीलिए अच्छा आदमी हार गया , अच्छा आदमी जीत
नहीं सका । अच्छा आदमी आगे भी नहीं जीत सकेगा ।
अच्छे आदमी को भी संगठित होना जरूरी है ।
बुराई की ताकतें इकट्ठी हैं । उन ताकतों के खिलाफ उतनी ही
बडी़ ताकतें खडा़ करना आवश्यक है ।

तो मैं धार्मिक संगठन के एकदम विरोध में हूं , लेकिन संगठन
के विरोध में नहीं हूं -- इस भेद को समझ लेना जरूरी है ।

ओशो
एक एक कदम
प्रवचन ४ से संकलन ।
( ७० के दशक में ओशो ने जीवन जागृति केंद्र नामक संगठन
  निर्मित किया था सामाजिक क्रांति के लिए ; उसके कुछ
  प्रमुख अंश संकलित किये हैं मित्रों के लिए )

Comments

Popular posts from this blog

ओशो : आपने कहा कि आपके भीतर सोई हुई उर्जा जब विराट की ऊर्जा से मिलती है तब एक्सप्लोजन, विस्फोट होता है। तो एक्सप्लोजन या समाधि के लिए कुंडलिनी जागरण और ग्रेस का मिलन आवश्यक है या कुंडलिनी का सहस्रार तक विकास और ग्रेस की उपलब्धि एक बात है?

ओशो : समय रहते जाग जाओ तो ठीक। क्योंकि जो समय हाथ से चला गया उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता।

ओशो : यह जीवन सपना है ...