ओशो : जीवन एक रहस्य है
जीवन एक रहस्य है ।
तुम जितना अधिक उसे समझते हो, वह उतना ही अधिक रहस्यमय बन जाता है।
तुम उसे जितना अधिक जानते हो, तुम्हें उतना ही कम-
यह अनुभव होता है कि तुम उसे जानते हो।
तुम उसकी गहराई और अनंत गहराई के प्रति जितने अधिक होशपूर्ण होते
हो, उतना ही अधिक उसके बारे में कुछ भी कहना लगभग असम्भव हो जाता है।
इसलिए अनुभव करने वाला मौन हो जाता है।
एक व्यक्ति, जो उसे जान लेता है, वह आदरयुक्त भय से विस्मय विमूढ हो जाता है।
ऐसे अनंत अद्भुत आश्चर्य का अनुभव कर, उसकी सांस तक रुक जाती है।
जीवन के रहस्य का साक्षात्कार कर वह पूरी तरह से मिट ही जाता है।
लेकिन इस बारे में समस्याएं भी हैं,
और जीवन के रहस्य के साथ पहली समस्या तो हमेशा-
ऐसे ढोंगियों की सम्भावना को लेकर है,
जो दूसरों को धोखा दे सकते हैं, लोगों को ठग सकते हैं।
विज्ञान के संसार में तो ऐसा करना असम्भव है
विज्ञान एक समतल भूमि पर अनंत सावधानी से फूंक-फूंक कर कदम रखता है-
वह तर्क पूर्ण और विचारशील है।
यदि तुम कुछ भी व्यर्थ की बात कहते हो, तो तुम तुरंत पकड़ लिए जाओगे,
क्योंकि तुम जो कुछ भी कहते हो, उसकी प्रामाणिकता का सत्यापन किया जा सकता है।
विज्ञान पदार्थगत है और उसके बाबत दिए गए किसी वक्तव्य को
प्रयोगशालाओं में प्रयोगों के द्वारा परखा जा सकता है।
धर्म के साथ प्रत्येक चीज अन्दर से संबंधित, वैयक्तिक और रहस्यपूर्ण है,
और उसका मार्ग समतल मैदान होकर नहीं जाता, वह पहाड़ी मार्ग है।
उसमें बहुत उतार-चढ़ाव हैं और वह मार्ग सर्पिल और घुमाव भरा है।
तुम चलते-चलते बार-बार उसी स्थान पर आ जाते हो,
भले ही वह स्थान थोड़ी अधिक ऊंचाई पर होता है।
और इस बारे में तुम जो कुछ भी कहो, उसका सत्यापन नहीं किया जा
सकता,
उसके जांचने का कोई मापदण्ड ही नहीं है।
क्योंकि वह आंतरिक और रहस्यमय है, इसलिए किसी भी प्रयोग से
उसे सिद्ध या असिद्ध नहीं किया जा सकता,
और किसी भी तर्क पूर्ण निष्पत्ति से यह निर्णय नहीं लिया जा सकता
कि 'यह' मार्ग ठीक है अथवा 'वह' मार्ग?
यही कारण है कि विज्ञान एक है,
लेकिन यहां इस संसार में लगभग तीन हजार धर्म हैं।
तुम किसी भी धर्म को झूठा सिद्ध नहीं कर सकते,
और न तुम किसी दूसरे धर्म को सच्चा और प्रामाणिक सिद्ध कर सकते हो।
ऐसा करना सम्भव नहीं है, क्योंकि निरीक्षण और प्रयोगों के द्वारा
उसका परीक्षण करना सम्भव ही नहीं है।
जब बुद्ध कहते हैं कि अन्दर कोई भी आत्मा नहीं है
तुम इसे कैसे सिद्ध करोगे, अथवा तुम इसे कैसे झूठा सिद्ध करोगे?
यदि कोई व्यक्ति यह कहता है: ''मैंने परमात्मा को देखा है''
और वह ईमानदार भी दिखाई देता है, तो क्या किया जाए?
लेकिन वह एक धोखेबाज पागल भी हो सकता है,
हो सकता है उसे विभ्रम हो गया हो,
अथवा हो सकता है उसने वास्तव में प्रामाणिक सत्य का साक्षात्कार किया हो?
लेकिन कैसे इसे सत्य या असत्य सिद्ध किया जाए?
वह अपने अनुभव में किसी अन्य व्यक्ति को सहभागी भी नहीं बना सकता, क्योंकि वह उसका आंतरिक अनुभव है।
ओशो
मौन का सद्गुरु—(प्रवचन पांचवां)
ऋतु आये फल होय--The Gras grow by Itself--ओशो
(ज़ेन पर ओशो द्वारा दिनांक 25 फरवरी 1975 में अंग्रेजी में दिये गये अमृत प्रवचनों का हिन्दी में अनुवाद)
तुम जितना अधिक उसे समझते हो, वह उतना ही अधिक रहस्यमय बन जाता है।
तुम उसे जितना अधिक जानते हो, तुम्हें उतना ही कम-
यह अनुभव होता है कि तुम उसे जानते हो।
तुम उसकी गहराई और अनंत गहराई के प्रति जितने अधिक होशपूर्ण होते
हो, उतना ही अधिक उसके बारे में कुछ भी कहना लगभग असम्भव हो जाता है।
इसलिए अनुभव करने वाला मौन हो जाता है।
एक व्यक्ति, जो उसे जान लेता है, वह आदरयुक्त भय से विस्मय विमूढ हो जाता है।
ऐसे अनंत अद्भुत आश्चर्य का अनुभव कर, उसकी सांस तक रुक जाती है।
जीवन के रहस्य का साक्षात्कार कर वह पूरी तरह से मिट ही जाता है।
लेकिन इस बारे में समस्याएं भी हैं,
और जीवन के रहस्य के साथ पहली समस्या तो हमेशा-
ऐसे ढोंगियों की सम्भावना को लेकर है,
जो दूसरों को धोखा दे सकते हैं, लोगों को ठग सकते हैं।
विज्ञान के संसार में तो ऐसा करना असम्भव है
विज्ञान एक समतल भूमि पर अनंत सावधानी से फूंक-फूंक कर कदम रखता है-
वह तर्क पूर्ण और विचारशील है।
यदि तुम कुछ भी व्यर्थ की बात कहते हो, तो तुम तुरंत पकड़ लिए जाओगे,
क्योंकि तुम जो कुछ भी कहते हो, उसकी प्रामाणिकता का सत्यापन किया जा सकता है।
विज्ञान पदार्थगत है और उसके बाबत दिए गए किसी वक्तव्य को
प्रयोगशालाओं में प्रयोगों के द्वारा परखा जा सकता है।
धर्म के साथ प्रत्येक चीज अन्दर से संबंधित, वैयक्तिक और रहस्यपूर्ण है,
और उसका मार्ग समतल मैदान होकर नहीं जाता, वह पहाड़ी मार्ग है।
उसमें बहुत उतार-चढ़ाव हैं और वह मार्ग सर्पिल और घुमाव भरा है।
तुम चलते-चलते बार-बार उसी स्थान पर आ जाते हो,
भले ही वह स्थान थोड़ी अधिक ऊंचाई पर होता है।
और इस बारे में तुम जो कुछ भी कहो, उसका सत्यापन नहीं किया जा
सकता,
उसके जांचने का कोई मापदण्ड ही नहीं है।
क्योंकि वह आंतरिक और रहस्यमय है, इसलिए किसी भी प्रयोग से
उसे सिद्ध या असिद्ध नहीं किया जा सकता,
और किसी भी तर्क पूर्ण निष्पत्ति से यह निर्णय नहीं लिया जा सकता
कि 'यह' मार्ग ठीक है अथवा 'वह' मार्ग?
यही कारण है कि विज्ञान एक है,
लेकिन यहां इस संसार में लगभग तीन हजार धर्म हैं।
तुम किसी भी धर्म को झूठा सिद्ध नहीं कर सकते,
और न तुम किसी दूसरे धर्म को सच्चा और प्रामाणिक सिद्ध कर सकते हो।
ऐसा करना सम्भव नहीं है, क्योंकि निरीक्षण और प्रयोगों के द्वारा
उसका परीक्षण करना सम्भव ही नहीं है।
जब बुद्ध कहते हैं कि अन्दर कोई भी आत्मा नहीं है
तुम इसे कैसे सिद्ध करोगे, अथवा तुम इसे कैसे झूठा सिद्ध करोगे?
यदि कोई व्यक्ति यह कहता है: ''मैंने परमात्मा को देखा है''
और वह ईमानदार भी दिखाई देता है, तो क्या किया जाए?
लेकिन वह एक धोखेबाज पागल भी हो सकता है,
हो सकता है उसे विभ्रम हो गया हो,
अथवा हो सकता है उसने वास्तव में प्रामाणिक सत्य का साक्षात्कार किया हो?
लेकिन कैसे इसे सत्य या असत्य सिद्ध किया जाए?
वह अपने अनुभव में किसी अन्य व्यक्ति को सहभागी भी नहीं बना सकता, क्योंकि वह उसका आंतरिक अनुभव है।
ओशो
मौन का सद्गुरु—(प्रवचन पांचवां)
ऋतु आये फल होय--The Gras grow by Itself--ओशो
(ज़ेन पर ओशो द्वारा दिनांक 25 फरवरी 1975 में अंग्रेजी में दिये गये अमृत प्रवचनों का हिन्दी में अनुवाद)
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