ओशो : मझधार में डुबो
मझधार में डुबो
प्रेम
रहस्य हैं जीवन .
पहेली नहीं जो सुलझ जाए
सुलझाअो उसे जितना उतना ही उलझता हैं
और सुलझाओ नहीं तो सुलझा ही हुआ है
जीवन समझने को नही जीने को है
समझने मे पडा तो वह जी तो पाता ही नहीं समझ भी नहीं पाता है
और जीया जिसने गहरे में जीवन को वह जीता तो है ही समझ भी पाता हैं .
जीओ जीवन को
पीओ जीवन को
तट पर रुक कर सोचने में न पड़ो
मझधार में डूबो ...
ओशो
प्रेम
रहस्य हैं जीवन .
पहेली नहीं जो सुलझ जाए
सुलझाअो उसे जितना उतना ही उलझता हैं
और सुलझाओ नहीं तो सुलझा ही हुआ है
जीवन समझने को नही जीने को है
समझने मे पडा तो वह जी तो पाता ही नहीं समझ भी नहीं पाता है
और जीया जिसने गहरे में जीवन को वह जीता तो है ही समझ भी पाता हैं .
जीओ जीवन को
पीओ जीवन को
तट पर रुक कर सोचने में न पड़ो
मझधार में डूबो ...
ओशो
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