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ओशो : स्वयं में उत्सुक हो, तभी केवल धर्म का जन्म होता है।

स्वयं में उत्सुक हो, तभी केवल धर्म का जन्म होता है। तुम्हारे पास तार्किक मन है, पश्चिमी ढंग है-सोचने का, यूनानी रुख है और तब खोज है सत्य की-खो है कि क्या सत्य है। तर्क सत्य की खोज करता है, कि सत्य क्या है। हिन्दूओं ने सत्य की कभी इतनी चिन्ता नहीं की। कभी भी नहीं। मोक्ष के लिये आतुर रहे। उन्होंने बार-बारयही पूछा कि मोक्ष क्या है। मुक्ति क्या है? न कि सत्य क्या है। और वे कहते हैं कि यदि कोई सत्य की खोज भी कर रहा है, तो वह भी मुक्ति के लिये ही, तब वह भी साधन की तरह है। परन्तु खोज सत्य के लिये नहीं है। हिन्दू कहते हैं कि जिससे मुक्ति हो, वही पाने योग्य है। यदि वह सत्य है, तोवह ठीक है। किन्तु बुनियादी रूप से खोज मोक्ष के लिये ही है। तुम इस तरह की खोज यूनानी दर्शन में नहीं पा सकते। उसमें किसी का रस नहीं है-न प्लेटो का और न ही अरस्तु का, कोई भी मोक्ष में उत्सुक नहीं है। उनका रस इस बात के जान लेने में है कि सत्य क्या है? बुद्ध से पूछें, महावीर से पूछें, कृष्ण से पूछें, वस्तुतः वे सत्य में उत्सुक नहीं हैं, उनका संबंध मुक्ति से है-कि मनुष्य चेतना किस तरह पूर्ण मुक्ति को प्राप्त हो जाये। यह फर्क ...

ओशो : आध्यात्मिक खिलौने।

आध्यात्मिक खिलौने। मेरे पास बहुत लोग आते हैं और वे कहते हैं कि अब मुझे नीला प्रकाश दिखलाई पड़ रहा है, तो इस चिन्ह का क्या अर्थ है? मैं कितने आगे बढ़ा? नीले प्रकाश से कुछ भी न होगा क्योंकि तुम्हारा क्रोध लाल रोशनी प्रकट कर रहा है। मूलभूत मनोवैज्ञानिक परिवर्तन अर्थपूर्ण है। अतः खिलौनों से राजी मत हो जाना। ये सिर्फ खिलौने हैं-आध्यात्मिक खिलौने। तुम्हें नीला प्रकाश दिखाई पड़े तो तुम कोई परमहंस नहीं हो जाओगे। ये सब चीजें साध्य नहीं हैं। संबंधों में देखें कि क्या हो रहा है। अब तुम अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हो? इसे देखो। क्या उसमें कुछ परिवर्तन आया? वह परिवर्तन ही अर्थपूर्ण है। तुम अपने नौकर के साथ कैसा बर्ताव करते हो? क्या उसमें बदलाहट हुई? वह बदलाहट ही महत्वपूर्ण है। यदि उसमें कोई परिवर्तन नहीं है, तो फेंको अपने नीले प्रकाश को। उससे कुछ भी न होगा। तुम धोखा दे रहे हो, और तुम धोखा देते रह सकते हो। इन चालाकियों को तो आसानी से पाया जा सकता है। इसीलिए तथाकथित धार्मिक आदमी अपने को धार्मिक समझने लगता है। क्योंकि अब वह यह और वह देखने लगता है, और वह स्वयं जैसा था वैसा ही रहता है। यहाँ तक कि...

ओशो : यह जीवन सपना है ...

यह जीवन सपना है,  यह टूटेगा,  इसके टूटने में ही कल्याण है !  इसके टूटने में सौभाग्य है ,  वरदान है !   क्योंकि यह सपना टूटे , तो परमात्मा से मिलन हो !  यह विराग जगे संसार से , तो परमात्मा में राग जगे ! ओशो

ओशो : जीवन की ऊर्जा या तो प्रेम बनती है, या भय बन जाती है।

जीवन की ऊर्जा या तो प्रेम बनती है, या भय बन जाती है।  दुनिया के धर्मगुरुओं ने आदमी को भय के माध्यम से परमात्मा की तरफ लाने की चेष्टा की है। पर भय से भी कहीं कोई आना हुआ है? भय से भी कहीं कोई संबंध बनता है? भय से घृणा हो सकती है, भय से प्रतिरोध हो सकता है; लेकिन भय से मुक्ति नहीं हो सकती। भय तो जहर है, फिर परमात्मा का ही क्यों न हो। और इसीलिए दुनिया में धर्मगुरु तो बहुत हुए, लेकिन धर्म नहीं आ पाया। इसका कारण यही नहीं है कि लोग धार्मिक नहीं होना चाहते। धर्मगुरुओं ने जो मार्ग बताया, वह मार्ग ही धार्मिक होने का नहीं है। आश्चर्य है कि इक्के-दुक्के लोग धार्मिक हो गए; कैसे धर्मगुरुओं से बच गए, यह आश्चर्य है! कोई बुद्ध, कोई क्राइस्ट धर्मगुरुओं से बचकर भी धार्मिक हो गया। अन्यथा धर्मगुरुओं के माध्यम से सारी दुनिया अधार्मिक बनी रही है। भय अधर्म है। और धर्मगुरु ने सिखाया कि इस संसार से घृणा करो, और परमात्मा से भय करो। मेरे देखे दोनों बातें ही खतरनाक हैं। दोनों ही तुम्हारे जीवन को विकृत कर देंगी। मैं तुमसे कहता हूं, इस संसार से भी प्रेम करो, और उस परमात्मा से भी प्रेम करो। और मेरे कहने के पीछे ...

ओशो : मनुष्य की उलझनें

मनुष्य की उलझनें जितना ही तुम शक्तिशाली होना चाहोगे उतनी ही तुम्हारी अशक्ति का तुम्हें पता चलेगा। क्योंकि जगह-जगह तुम्हारी शक्ति की सीमा आ जाएगी... इस सदी के एक बहुत बड़े मनसविद अल्फ्रेड एडलर ने मनुष्य के जीवन की सारी उलझनों का मूल स्रोत हीनता की ग्रंथि में पाया जाता है। हीनता की ग्रंथि का अर्थ है कि जीवन में तुम कहीं भी रहो, कैसे भी रहो, सदा ही मन में यह पीड़ा बनी रहती है कि कोई तुमसे आगे है, कोई तुमसे ज्यादा है, कोई तुमसे ऊपर है। और इसकी चोट पड़ती रहती है। इसकी चोट भीतर के प्राणों को घाव बना देती है। फिर तुम जीवन के आस्वाद को भोग नहीं सकते; फिर तुम सिर्फ जीवन से पीड़ित, दुखी और संत्रस्त होते हो। हीनता की ग्रंथि, इनफीरियारिटी कांप्लेक्स, अगर एक ही होती तो भी ठीक था। तो शायद कोई हम रास्ता भी बना लेते। अल्फ्रेड एडलर ने तो हीनता की ग्रंथि शब्द का प्रयोग किया है; मैं तो बहुवचन का प्रयोग करना पसंद करता हूँ हीनताओं की ग्रंथियां। क्योंकि कोई तुमसे ज्यादा सुंदर है। और किसी की वाणी में कोयल है, और तुम्हारी वाणी में नहीं। और कोई तुमसे ज्यादा लंबा है; कोई तुमसे ज्यादा स्वस्थ है। किसी के पास ज्यादा ध...

ओशो : सत्य को जानना

सत्य को जानना मनुष्य सत्य के प्रति अनजान और अज्ञानी है। और सत्य को जानना भी कठिन है, क्योंकि सत्य को जानने के लिए पहले तुम्हें प्रामाणिक और सच्चा बनना होगा। केवल समान ही समान को जान सकता है। मनुष्य झूठा और नकली है, वह गहरे में छली और बहानेबाज है। वह स्वयं अपने लिए ही प्रामाणिक नहीं है। उसका मौलिक चेहरा पूरी तरह से मिट चुका है। उसके पास कई चेहरे हैं, वह अनेक चेहरों का प्रयोग करता है.,, लेकिन वह स्वयं अपने ही मौलिक चेहरे के प्रति सचेत नहीं है। मनुष्य अनुकरण करने वाला एक प्राणी है। वह दूसरों का अनुकरण किए चले जाता है, और धीमे- धीमे वह यह भूल ही जाता है कि उसके अपने स्वयं के पास एक अद्वितीय और अनूठा अस्तित्व है। सत्य को केवल तभी जाना जा सकता है जब तुम सच्चे और प्रामाणिक बनो। इसके लिए अत्यधिक प्रयास करना होगा, पहाड़ पर चढ़ने जैसा इसका पथ दुर्गम है, इसलिए मनुष्य चालाकी करने की कोशिश करता है। वह सत्य के सम्बन्ध में विचार करना शुरू कर देता है।  सत्य के बारे में, दार्शनिकता से विचार करना, बौद्धिक और सैद्धांतिक व्यवस्थाएं निर्मित करना,  यही है सब कुछ दर्शन शास्त्र:..,. एक व्यक्ति द्वारा स...

ओशो : सुरति का दीया ..

सुरति का दीया ... बुद्ध ने यही कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें?  तो बुद्ध ने कहा है, होश से चले, होश से बैठे, होश से उठे। बुद्ध का एक भिक्षु आनंद पूछने लगा; वह एक यात्रा पर जा रहा था और उसने पूछा कि भगवान, कुछ मुझे पूछना है।  स्त्रियों के संबंध में मन में अभी भी काम-वासना उठती है; तो स्त्रियां मिल जाएं तो उनसे कैसा व्यवहार करना? तो बुद्ध ने कहा, “स्त्रियां अगर मिल जाएं तो बचकर चलना। दूरसे निकल जाना।”आनंद ने कहा, “और अगर ऐसी स्थिति आ जाए कि बचकर न निकल सकें?तो बुद्ध ने कहा, ” आंख नीची झुकाकर निकल जाना। आनंद ने कहा, और यह भी हो सकता है कि ऐसी स्थिति आ जाए कि आंख भी झुकाना संभव न हो। समझो, कि कोई स्त्री गिर पड़ी हो और उसे उठाना पड़े। या कोई स्त्री कुएं में गिर पड़ी हो और जाकर उसको सहारा देना पड़े; या कोई स्त्री बीमार हो; ऐसी स्थिति आ जाए कि आंख बचाकर भी चलना मुश्किल हो जाए?तो बुद्ध ने कहा, “छूना मत।”और आनंद ने कहा, “अगर ऐसी अवस्था आ जाए कि छूना भी पड़े? तो बुद्ध ने कहा, कि जो मैं इन सारी बातों से कह रहा हूं, उसका सार कहे देता हूं : छू...

ओशो : जिन लोगों से काम लेना हो उनके भीतर जो सोया है उसे जगाना जरूरी है ।

एक अमरीकी अभिनेत्री ग्रेटागार्बो का नाम आपने सुना होगा। वह यूरोप के एक छोटे से देश में एक गरीब घर में पैदा हुई। और एक बाल बनाने के सैलून में दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम करती रही जब तक उन्नीस वर्ष की थी। दो पैसे में दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम नाई की दुकान में करती रही। एक अमरीकी यात्री ने--वह उसकी दाढ़ी पर साबुन लगा रही थी--और आईने में उसका चेहरा देखा और कहा कि बहुत सुंदर है! बहुत सुंदर है! ग्रेटा ने उससे कहा, क्या कहते हैं आप? मुझे आज छह वर्ष हो गए लोगों की दाढ़ी पर साबुन लगाते, किसी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि मैं सुंदर हूं। आप कहते क्या हैं? मैं सुंदर हूं? उस अमरीकन ने कहा, बहुत सुंदर! मैंने बहुत कम इतनी सुंदर स्त्रियां देखी हैं। ग्रेटागार्बो ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: मैं उसी दिन पहली दफा सुंदर हो गई। एक आदमी ने मुझे सुंदर कहा था। मुझे खुद भी खयाल नहीं था। मैं उस दिन घर लौटी और आईने के सामने खड़ी हुई और मुझे पता लगा कि मैं दूसरी औरत हो गई हूं! वह लड़की जो उन्नीस साल की उम्र तक केवल साबुन लगाने का काम करती रही थी, वह अमरीका की बाद में श्रेष्ठतम अभिनेत्री साबित हुई। और उसने जो धन्य...

ओशो : ध्यान कैसे करे ?

ध्यान  करो  ध्यान  करो :  सब  ज्ञानी  जन  कहते  है  :  परमात्मा :- निराकार  है , अमूर्त  है |  जब  परमात्मा  निराकार  है  ,  अमूर्त  है ;  तो  कैसे  करें  ? मुझसे  आकर  लोग  पूछते  हैं :  आकार  का  तो  ध्यान  हो  सकता  है , निराकार  का  ध्यान  कैसे  हो ?     ठीक  है  उनका  प्रश्न , सम्यक  है | राम  का  ध्यान  कर  सकते  हो -- धनुधाॅरी  राम । कृष्ण  का  ध्यान  कर  सकते  हो - बांसुरी  वाले  कृष्ण | कि  क्राइस्ट  का  ध्यान  कर  सकते  हो सूली  पर  चढ़े  | कि  बुद्ध  का  , कि  महावीर  का  | लेकिन  निराकार  का  ध्यान  ?     तुम्हें  थोड़ी  ध्यान  की  प्रक्रिया  समझनी  हो...

ओशो : जनक के जीवन में एक अपूर्व प्रसंग है—भूमि से प्राप्त सीता और सीता के आसपास जन्मी रामलीला का। कृपा करके रामलीला को आज हमें समझाएं।

 प्रश्न : जनक के जीवन में एक अपूर्व प्रसंग है—भूमि से प्राप्त सीता और सीता के आसपास जन्मी रामलीला का। कृपा करके रामलीला को आज हमें समझाएं। अ ष्टावक्र के संदर्भ में और उस सबके संदर्भ में जो मैं तुमसे कह रहा हूं उस कथा का अर्थ बहुत सीधा—साफ है। सीता है पृथ्वी , राम हैं आकाश। उन दोनों का मिलन ही रामलीला है—पृथ्वी और आकाश का मिलन। और रामलीला प्रत्येक के भीतर घट रही है। तुम्हारी देह सीता है ,  तुम्हारी आत्मा ,  राम। तुम्हारे भीतर दोनों का मिलन हुआ है—पृथ्वी और आकाश का ,  मर्त्य का और अमृत का। तुम्हारे भीतर दोनों का मिलन हुआ है। और उस सब में जो भी घट रहा है ,  सभी रामलीला है। राम—कथा को अपने भीतर पढ़ो। और जिस दिन तुम यह पहचान लोगे कि तुम न तो राम हो और न तुम सीता हो ,  तुम तो रामलीला के साक्षी हो ,  द्रष्टा हो—उसी दिन रामलीला बंद हो जाती है। जाना है सीता और राम के ऊपर। रामलीला लोग देखने जाते हैं ,  वहां क्या खाक मिलेगा ?  भीतर रामलीला चल रही है ,  वहीं बैठ कर देखो—तुम देखने वाले बन जाओ। रामलीला देखने से कहते हैं बड़ा लाभ होता ,...

ओशो : न मैं अनुयायियों को मानता हूं, न गुरुओं को...

न मैं अनुयायियों को मानता हूं, न गुरुओं को। न मैं किसी से प्रभावित हूं, न किसी को प्रभावित करने की इच्छा है। न आपसे आशा करता हूं–कि आप तुलना करें। सुनें। समझें। छोड़ दें–फिर। न मेरे साथ चलने की जरूरत है। न मेरे पीछे चलने की जरूरत है। थोड़ी देर के लिए मिल गए। थोड़ी देर के लिए हंस-बोल लिए। फिर अपना-अपना रास्ता है। कोई किसी के साथ नहीं है। सब अकेले हैं। ओशो प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रवचन-03)

ओशो : एक मित्र ने पूछा है, गीता में कहा है कि जो मनुष्य मरते समय जैसी ही चाह करे, वैसा ही वह दूसरा जन्म पा सकता है। तो यदि एक मनुष्य उसका सारा जीवन पाप करने में ही गंवा दिया हो और मरते समय दूसरे जन्म में महावीर और बुद्ध जैसा बनने की चाह करे, तो क्या वह आदमी दूसरे जन्म में महावीर और बुद्ध जैसा बन सकता है?

एक मित्र ने पूछा है, गीता में कहा है कि जो मनुष्य मरते समय जैसी ही चाह करे, वैसा ही वह दूसरा जन्म पा सकता है। तो यदि एक मनुष्य उसका सारा जीवन पाप करने में ही गंवा दिया हो और मरते समय दूसरे जन्म में महावीर और बुद्ध जैसा बनने की चाह करे, तो क्या वह आदमी दूसरे जन्म में महावीर और बुद्ध जैसा बन सकता है? निश्चित ही, मरते क्षण की अंतिम चाह दूसरे जीवन की प्रथम घटना बन जाती है। जो इस जीवन में अंतिम है, वह दूसरे जीवन में प्रथम बन जाता है। इसे ऐसा समझें। रात आप जब सोते हैं, तो जो रात सोते समय आपका आखिरी विचार होता है, वह सुबह जागते समय आपका पहला विचार बन जाता है। इसे आप प्रयोग करके जान सकते हैं। रात आखिरी विचार, जब आपकी नींद उतर रही हो, जो आपके चित्त पर हो, उसे खयाल कर लें। तो सुबह आपको जैसे ही पता लगेगा कि मैं जाग गया हूं वही विचार पहला विचार होगा। मृत्यु महानिद्रा है, बड़ी नींद है। इसी शरीर में नहीं जागते हैं, फिर दूसरे शरीर में जागते हैं। लेकिन इस जीवन का जो अंतिम विचार, अंतिम वासना है, वही दूसरे जीवन का प्रथम विचार और प्रथम वासना बन जाती है। इसलिए गीता ठीक कहती है कि अंतिम क्षण में जो...

ओशो : जीवन में छोटे — बड़े दुख के कारण कभी — कभी मन अशांत, निराश और बेचैन बन जाता है। तो संसार में ही रहकर मन सदा शांत, प्रसन्न और उत्साहित कैसे रखें ?

जीवन में छोटे — बड़े दुख के कारण कभी — कभी मन अशांत, निराश और बेचैन बन जाता है। तो संसार में ही रहकर मन सदा शांत, प्रसन्न और उत्साहित कैसे रखें ?  नियति की जो बात हम कर रहे हैं, उसे अगर ठीक से समझ लें, तो मन शांत हो जाएगा। और कोई भी उपाय मन को शांत करने का नहीं है। और सब उपाय ऊपरी—ऊपरी हैं, उनसे थोड़ी—बहुत राहत मिल सकती है, लेकिन मन शांत नहीं हो सकता। लेकिन नियति की बात थोड़ी कठिन है, समझ में थोड़ी मुश्किल से पड़ती है। मन अशांत होता है, नियति का विचार कहेगा, उस अशांति को स्वीकार कर लें। उसके विपरीत शांत होने की कोशिश मत करें। मन उदास है, नियति का विचार कहेगा, उदासी को स्वीकार कर लें, प्रफुल्लित होने की चेष्टा न करें। क्योंकि असली अशांति अशांति के कारण नहीं, अशांति को दूर हटाने के विचार से पैदा होती है। असली उदासी उदासी से नहीं, कैसे मैं प्रफुल्लित हो जाऊं, इस धारणा से, इस विचार, इस आकांक्षा से पैदा होती है। उदासी को स्वीकार कर लें, और आप पाएंगे शीघ्र ही कि उदासी विलीन हो गई है। उसकी स्वीकृति में ही उसका अंत है। कैसे दुखी न हों, यह न पूछें। दुखी हैं, दुख को स्वीकार कर लें। वह भा...

ओशो : शराब और कामवासना

शराब और कामवासना तो हम तो आपने को एक मादक बिन्‍दु बनाना चाहते है। जिसमें चारों तरफ, जिसके व्‍यक्‍तित्‍व में शराब हो और खींच ले। और महावीर कहते है कि जो दूसरे को खींचने जायेगा, वह पहले ही दूसरों से खिंच चुका है। जो दूसरों के आकर्षण पर जीयेगा वह दूसरों से आकर्षित है। और जो अपने भीतर मादकता भरेगा, बेहोशी भरेगा, लोग उसकी तरफ खीचेंगें जरूर,लेकिन वह अपने को खो रहा है और डूबा रहा है। और एक दिन रिक्‍त हो जायेगा, आरे जीवन के अवसर से चूक जायेगा।       निश्‍चित ही, एक स्‍त्री जो होश पूर्ण हो, कम लोगों को आकर्षित करेगी। एक स्‍त्री जो मदमस्‍त हो, ज्‍यादा लोगों को आकर्षित करेंगी। क्‍योंकि जो मदमस्‍त स्‍त्री.....पशु जैसी हो जायेगी। सारी सभ्‍यता, सारे संस्‍कार, सारा जो ऊपर थ वह सब टूट जायेगा। वह पशुवत हो जायेगी। एक पुरूष भी,जो मदमस्‍त हो, ज्‍यादा लोगों को आकर्षित, ज्‍यादा स्‍त्रियों को आकर्षित कर लेगा, क्‍योंकि वह पशुवत हो जायेगा। उसमें ठीक पशुता जैसी गति आ जायेगी। और सब वासनाएं पशु जैसी हों तो ज्‍यादा रसपूर्ण हो जाती है। इसलिए जिन मुल्‍कों में भी कामवासना प्रगाढ़ हो जायेगी। उन मुल्...

ओशो : रोओ! रोने की कला सीखो!

रोओ! रोने की कला सीखो! रोओ, रोना सज्दा है। कभी रो दिये नाम लेकर तुम्हारा। कभी हमने. राहों में सज्दे बिछाये मगर तुम न आये। अगर रो सको, तो उससे सुंदर फिर कुछ और नहीं है। रोओ! रोने की कला सीखो! कभी—कभी अकारण रोओ। रोने के मजे के लिए ही रोओ। कभी शांत बैठ जाओ और आने दो आंसुओ को। तुम सोचोगे ऐसे कसे आ जाएँगे, कोई कारण तो चाहिए, ऐसे कैसे आ जाएँगे? मैं तुमसे कहता हूँ तुम जरा प्रतीक्षा तो करो किसी दिन बैठकर! तुम चकित होओगे, आते हैं। क्योंकि...... कारण तो जिंदगी भर रहे हैं, तुम आंसू रोक कर बैठे हो। कारण तो कितने आए और चले गये, तुम नहीं रोए हो। और हर बार आँसू भरे थे और निकलना चाहते थे। उनके बाँध तुमने बाँध दिये हैं। बाँध को टूटने दो। बैठो और रोओ। सौंदर्य को देखो परमात्मा के और रोओ। संगीत को सुनो परमात्मा के और रोओ। आह्लाद में रोओ। रोओ और नाचो। नृत्य तुम्हारे शरीर को पवित्र कर जाएगा। आँसू तुम्हारी आँखों को पवित्र कर जाएँगे। रोओ, विरह में रोओ, परमात्मा नहीं मिला है अब तक इसलिए रोओ। और फिर जब मिल जाए तो इसलिए रोना कि परमात्मा मिल गया है। रोना दोनों समय काम आता है। जब नहीं मिला तब भी, और ज...

ओशो : प्यारे प्रभु! कल प्रथम बार मैने शिविर में विपस्सना ध्यान किया। इतनी उड़ान अनुभव हुई। कृपया विपस्सना के बारे में और प्रकाश डालें।

प्यारे प्रभु! कल प्रथम बार मैने शिविर में विपस्सना ध्यान किया। इतनी उड़ान अनुभव हुई। कृपया विपस्सना के बारे में और प्रकाश डालें। ईश्वर समर्पण! विपस्सना मनुष्य—जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्यान—प्रयोग है। जितने व्यक्ति विपस्सना से बुद्धत्व को उपलब्ध हुए उतने किसी और विधि से कभी नहीं। विपस्सना अपूर्व है! विपस्सना शब्द का अर्थ होता है : देखना, लौटकर देखना। मार्ग पर चलने के लिए ईश्वर को मानना न मानना, आत्मा को मानना न मानना आवश्यक नहीं है। बुद्ध का धर्म अकेला धर्म है इस पृथ्वी पर जिसमें मान्यता, पूर्वाग्रह, विश्वास इत्यादि की कोई भी आवश्यकता नहीं है। बुद्ध का धर्म अकेला वैज्ञानिक धर्म है। बुद्ध कहते : आओ और देख लो। मानने की जरूरत नहीं है। देखो, फिर मान लेना। और जिसने देख लिया, उसे मानना थोड़े ही पड़ता है, मान ही लेना पड़ता है। और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी, दिखाने की जो प्रक्रिया थी, उसका नाम है विपस्सना। विपस्सना बड़ा सीधी—सरल प्रयोग है। अपनी आती—जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। श्वास जीवन है। श्वास से ही तुम्हारी आत्मा और तुम्हारी देह जुड़ी है। श्वास सेतु है। इस पार दे...

ओशो : क्‍योंकि खोज तुम्‍हें तैयार करती है। ऐसा नहीं है खोज तुम तुम्‍हारे गुरु तक ले जाये। खोजना तुम्‍हें तैयार करता है ताकि तुम उसे देख सको। हो सकता है वह तुम्‍हारे बिलकुल नजदीक हो।

एक सूफी फकीर हुआ जुन्‍नैद वह अपनी जवानी के दिनों में जब गुरु को खोजने चला तो। वह एक बूढ़े फकीर के पास गया। और उससे कहने लगा “मैंने सुना है आप सत्‍य को जानते है।” मुझे कुछ राह दिखाईये। बूढ़े फकीर ने एक बार उसकी और देखा और कहा: तुमने सूना है कि मैं जानता हूं। तुम नहीं जानते की मैं जानता हूं। जुन्‍नैद ने कहा: आपके प्रति मुझे कुछ अनुभूति नहीं हो रही है। लेकिन बस एक बात करें मुझे वह राह दिखायें जहां में अपने गुरु को खोज लूं। आपकी बड़ी कृपा होगी। वह बूढ़ा आदमी हंसा। और कहने लगा। जैसी तुम्‍हारी मर्जी: तब तुम्‍हीं बहुत भटकना और ढूंढना होगा। क्‍या इतना सहसा और धैर्य है तुम में। जुन्‍नैद ने कहा: उस की चिंता आप जरा भी नहीं करे। वो मुझमें हे। मैं एक जनम क्‍या अनेक जन्‍म तक गुरु को खोज सकता हूं। बस आप मुझे वह तरीका बता दे। की गुरु कैसा दिखाता होगा। कैसे कपड़े पहने होगा। फकीर ने कहा: तो तुम सभी तीर्थों पर जाओ मक्‍का, मदीना, काशी गिरनार…वहां तुम प्रत्‍येक साधु को देखा। जिसकी आंखों से प्रकाश झरता होगा। बड़ी-बड़ी उसकी जटाये बहुत लम्‍बी होगी। और एक हाथ वह आसमान की तरफ किये होगा। और वह एक नीम क...

ओशो : महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं—मेरी दृष्टि में—जो सबसे चमकते हुए सितारे हैं?

महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं—मेरी दृष्टि में—जो सबसे चमकते हुए सितारे हैं? मैंने उन्हें यह सूची दी : कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखें बंद कर लीं, सोच में पड़ गये…। सूची बनानी आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत का आकाश बड़े नक्षत्रों से भरा है! किसे छोड़ो, किसे गिनो?.. वे प्यारे व्यक्ति थे—अति कोमल, अति माधुर्यपूर्ण, स्त्रैण…। वृद्धावस्था तक भी उनके चेहरे पर वैसी ही ताजगी बनी रही जैसी बनी रहनी चाहिए। वे सुंदर से सुंदरतर होते गये थे…। मैं उनके चेहरे पर आते—जाते भाव पढ़ने लगा। उन्हें अड़चन भी हुई थी। कुछ नाम, जो स्वभावत: होने चाहिए थे, नहीं थे। राम का नाम नहीं था! उन्होंने आंख खोली और मुझसे कहा : राम का नाम छोड़ दिया है आपने! मैंने कहा : मुझे बारह की ही सुविधा हो चुनने की, तो बहुत नाम छोड़ने पड़े। फिर मैंने बारह नाम ऐसे चुने हैं जिनकी कुछ मौलिक देन है। राम की कोई मौलिक देन नहीं है, कृष्ण की मौलिक देन है। इसलिये हिंदुओं ने भी उन्हें पूर्णावतार नहीं ...

ओशो : प्रेम.. शब्द नही, घटना नही, ...

प्रेम.. शब्द नही, घटना नही, दिखता नही, कहा भी नही जाता, सिर्फ महसूस होता है, दिल की गहराइयो में, एकदम गहरे, जिसमे डूबना होता है, फिर कुछ होश ही नही रहता, एक ऐसा आनंद, जिसका वर्णन नही किया जा सकता, जो शब्दों में नही समाता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है। पर शर्त यह है कि प्रेम बेशर्त हो! जिसमे शब्द न हो, अपेक्षा न हो, जो कहा नही सिर्फ किया जाये! आत्मा से, दिल की गहराइयो से, जो निरंतर हो, जिसमे तड़प हो, समर्पण हो, प्यास हो. ओशो

ओशो : "स्त्रियों को जितना हो सके उतना आगे लाने का मेरा प्रयास है"

"स्त्रियों को जितना हो सके उतना आगे लाने का मेरा प्रयास है" स्त्री को संन्यास देने में बुद्ध तक हिचकिचाए—बुद्ध तक। उनके जीवन की सिर्फ यही एक बात मुझे कांटे की तरह खटकती है, और कुछ नहीं। बुद्ध झिझके…क्यों, उन्हें डर था कि स्त्री सन्यासिनियॉं उनके भिक्षुओं को डांवाडोल कर देंगी। क्या बकवास है, एक बुद्ध और डरे। अगर उन मूर्ख भिक्षुओ को ध्यान भंग होता था तो होने देते। महावीर ने कहा कि स्त्री के शरीर से किसी को निर्वाण, परम मुक्ति नहीं हो सकती। अभी भी स्त्रियों को मस्जिद में आने की अनुमति नहीं है। सिनागॉग में भी स्त्रियां गैलरी में अलग बैठती है, पुरूषों के साथ नहीं बैठती। इंदिरा गांधी मुझे बता रही थी कि जब वे इसरायल की यात्रा पर थी और जेरूसलम गई, तो उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ कि इजरायल की प्रधानमंत्री और वे स्वयं, दोनों बालकनी में बैठी हुई थी और सारे पुरूष नीचे मुख्य हॉल में बैठे हुए थे। उसे खयाल नहीं आया कि इजरायल की प्रधानमंत्री भी, स्त्री होने के कारण, मुख्य सिला गॉग में प्रवेश नहीं कर सकती थी। वे केवल बालकनी से देख सकती थी। यह आदरपूर्ण नहीं है, यह अपमानजनक है। मुझे मोहम्म...

ओशो : शांति, परम शांति वह है, जहां कोई उत्तेजना नहीं है–न सुख की, न दुख की। जहां सुख भी नहीं, जहां दुख भी नहीं, ऐसा जहां परम शांत हुआ चित्त, वहीं आनंद फलित होता है, वहीं प्रभु का द्वार खुलता है, वहीं परम सत्य में प्रवेश होता है।

सुना है मैंने, नादिर एक स्त्री को प्रेम करता था। लेकिन उस स्त्री ने नादिर की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। नादिरशाह साधारण आदमी नहीं था, असाधारण आदमी था। हत्यारों में उस जैसा असाधारण दूसरा नहीं है। अभी-अभी हमने कुछ रिकार्ड तोड़े हैं–हिटलर, स्टैलिन के साथ। लेकिन हिटलर और स्टैलिन का जो हत्यारापन है, वह बड़ा परोक्ष है। उन्हें कभी ठीक पता नहीं चलता कि वे मार रहे हैं। नादिरशाह का हत्यारापन सीधा, प्रत्यक्ष था; वही मार रहा था सामने छाती में। नादिरशाह को उस स्त्री ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब नादिरशाह को पता चला कि वह उसके ही एक पहरेदार को, साधारण सिपाही को प्रेम करती है, तो पागल हो गया। अपने बुद्धिमानों को उसने बुलाया और कहा कि सजा बताओ, क्या सजा दूं? बुद्धिमान हैरान हुए, क्योंकि नादिरशाह सजा इनवेंट करने में इतना कुशल था कि वह बुद्धिमानों से पूछे? बुद्धिमान थोड़े हैरान हुए! उन्होंने कहा, आपकी कुशलता हम न पा सकेंगे। आपसे ज्यादा कुशल और कौन है? सताने में आप ऐसी-ऐसी तरकीबें निकालते हैं! आपसे ज्यादा हम कुछ न बता सकेंगे। लेकिन नादिरशाह ने कहा कि नहीं; मैं जो भी सोच सका, सब कम पड़ता है। तुम कुछ ऐसा सोचकर...

ओशो : क्‍या हम अपने अतीत के जन्‍मों को जान सकते है ?

क्‍या हम अपने अतीत के जन्‍मों को जान सकते है ? निश्‍चित ही जान सकते है। लेकिन अभी तो आप इस जन्‍म को भी नहीं जानते है, अतीत के जन्‍मों को जानना तो फिर बहुत कठिन है। निश्‍चित ही मनुष्‍य जान सकता है। अपने पिछले जन्‍मों को। क्‍योंकि जो भी एक बार चित पर स्‍मृति बन गई है, वह नष्‍ट नहीं होती। वह हमारे चित के गहरे तलों में अनकांशस हिस्‍सों में सदा मौजूद रहती है। हम जो भी जान लेते है कभी नहीं भूलते। अगर मैं आपसे पुछूं कि उन्‍नीस सौ पचास में एक जनवरी को आपने क्‍या किया था? तो शायद आप कुछ भी न बता सके, आपको कुछ भी याद न हो। आप कहेंगे की मुझे तो कुछ भी याद नहीं है? एक जनवरी उन्‍नीस सौ पचास, कुछ भी ख्‍याल में नहीं आता। लेकिन अगर आपको सम्‍मोहित किया जा सके, हिप्रोटाइज किया जा सकें और सरलता से किया जा सकता है और आपको बेहोश करके पूछा जाए कि एक जनवरी उन्‍नीस सौ पचास में अपने क्‍या किया? तो आप सुबह से सांझ तक का ब्‍यौरा इस तरह सक बता देंगे जैसे अभी वह एक जनवरी आपके सामने से गुजर रही है। आप यह भी बता देंगे कि एक जनवरी को सुबह जो मैंने चाय पी थी उसमे थोड़ी शक्‍कर कम थी। आप यह भी बता देंगे की जिस आद...

ओशो : प्रश्न : आप का संदेश क्या है ?

प्रश्न : आप का संदेश क्या है ? वही जो सदा से सभी बुद्धों का रहा है: अप्प दीपो भव! अपने दीए खुद बनो। अपने माझी खुद बनो। किसी और के कंधे का सहारा न लेना। खुद खाओगे तो तुम्हारी भूख मिटेगी। खुद पियोगे तो तुम्हारी प्यास मिटेगी। सत्य को स्वयं जानोगे, तो ही, केवल तो ही संतोष की वीणा तुम्हारे भीतर बजेगी! मेरा जाना हुआ सत्य, तुम्हारे किसी काम का नहीं। मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता। मैं तो सिर्फ तुम्हारे भीतर सत्य को पाने की अभीप्सा को प्रज्वलित कर सकता हूं। मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता लेकिन सत्य की ऐसी आग तुम्हारे भीतर पैदा कर सकता हूं कि तुम पतंग बन जाओ, कि तुम सत्य की ज्योति में जल मिटने को तत्पर हो जाओ। कौन कहता है कि मेरी नाव पर माझी नहीं है, आज माझी मैं स्वयं इस नाव का हूं! मैं नहीं स्वीकार करता जलधि की छलनामयी मनुहारमय रंगीन लहरों का निमंत्रण आज तो स्वीकार मैंने की जलधि की अनगिनत विकराल इन उद्दाम लहरों की चुनौती! आज मेरे सधे हाथों में थमी पतवार। लहरें नाव को आकाश तक फेंके भले ही, जाए ले पाताल तक वे साथ अपने, किंतु पाएंगी न इस को लील! उनकी हार निश्चित नाथ लेगी नाग सी व...

ओशो : आसक्ति और प्रेम ‌

आसक्ति और प्रेम ‌ आखिर घृणा क्यों है ? जब तुम्हें घृणा पकड़े है तो उसके कारण की खोज करो। केवल तभी प्रेम का फूल खिल सकता है। तुम्हें घृणा कब महसूस होती है? जब तुम समझते हो कि तुम्हारा अस्तित्व, तुम्हारा जीवन खतरे में है, जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारा अस्तित्व मिट सकता है, तो तुम अचानक घृणा से भर जाते हो। जब तुम्हें लगता है कि तुम्हें मिटाया जा सकता है तो तुम दूसरों को मिटाने में लग जाते हो। वह सुरक्षा का इंतजाम है, तुम्हारा ही एक अंश तब जीवित रहने के लिए संघर्ष करने लगता है। जब भी तुम्हें लगता है कि मेरा अस्तित्व खतरे में है, तुम घृणा से भर जाते हो। इसलिए जब तक तुम्हें यह न लगे कि मेरा अस्तित्व खतरे में नहीं है, कि मुझे मिटाना असंभव है, तब तक तुम्हारे प्राण प्रेम से नहीं भर सकते। जीसस प्रेम कर सकते हैं, क्योंकि वे उसे जानते हैं जो चिन्मय है। तुम प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि तुम उसे ही जानते हो जो मृण्मय है। प्रत्येक क्षण तुम्हारे लिए मृत्यु है। प्रत्येक क्षण तुम भयभीत हो। और जो भयभीत है वह प्रेम कैसे कर सकता है? प्रेम और भय साथ—साथ नहीं चल सकते। और तुम भयभीत हो! इसलिए तुम केवल प्रेम...