ओशो : शून्य का अर्थ

 *शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामर्थ्य.*......



शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामथ्र्य।

एक व्यक्ति एक मंदिर में किसी दूर देश में हाथ जोड़कर बैठा हुआ है। परदेशी यात्री ने भीतर आकर उससे पूछा, क्या आप प्रार्थना कर रहे हैं? उस व्यक्ति ने कहाः कैसी प्रार्थना, किसकी प्रार्थना? परदेशी हैरान हुआ होगा। पूछा, भगवान की प्रार्थना करते होंगे। उसने कहाः मैं इतना छोटा हूं कि मुझे भगवान का कोई पता नहीं। किसी चीज को मांगने के लिए प्रार्थना करते होंगे? उसने कहाः कितना ही मांगें और कितना ही इकट्ठा करें, मौत सब छीन लेती है, इसलिए मांगने का मोह चला गया। क्या मांगें? जब सब छिन ही जाता है तो मांगने में कोई अर्थ न रहा। उस आदमी ने कहाः फिर भी आप प्रार्थना तो कर ही रहे हैं? उस आदमी ने कहाः कैसे कहूं कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं? अब तक बहुत अपने भीतर खोजा, किसी मैं को तो पा ही नहीं सका।

 *यह जो क्षण है, ऐसा चित्त की दशा का। न कोई परमात्मा का ख्याल है, न कुछ मांगने का, न अपना। यह शून्य, खाली, यह नॉन-बीइंग की अवस्था है, यह नथिंगनेस। जीवन में स्वतंत्रता आए, सरलता आए तो शून्यता आनी कठिन नहीं है। कुछ घड़ी को तो चित्त बिल्कुल मौन ही हो जाना चाहिए।* अर्थ यह नहीं है कि आप जबरदस्ती मौन कर दें। जबरदस्ती दबा कर बैठ जाएं अपनी श्वास को रोक कर, तो वैसी शून्यता सच्ची नहीं है। नहीं, आने दें, ग्रोथ होने दें, शून्यता को आने दें।

 *कैसे आएगी शून्यता? दो तो मैंने बातें कहीं..स्वतंत्र चित्त ही तो बहुत खाली हो जाए, क्योंकि जब भराव दूसरे का है। सरल चित्त हो तो बहुत विगलित हो जाएगा क्योंकि सारी कठोरता भरे हुए है, यह विलीन हो जाएगी। उसके बाद शून्य, जीवन को देखें। क्या मांगने योग्य लगता है? परमात्मा को जानते नहीं है, स्वयं को खोजें, मैं का कोई पता नहीं चलता? फिर क्या होगा? तो फिर मौन रह जाएंगे। मौन, एक साइलेंस, एक सन्नाटा पकड़ना शुरू होगा। यह चेष्टित सन्नाटा न होगा। यह घेर लेगा अचानक। यह किसी अज्ञात क्षण में, किसी बिल्कुल अननोन मूवमेंट में, जब कि हम ख्याल में भी न थे, अचानक पकड़ लेना। अगर स्वतंत्र और सरल होने की विकसित अवस्था बनी तो शून्य का भाव किसी क्षण में अचानक पकड़ लेगा। आपको पता लगेगा कि मैं तो हूं ही नहीं, मैं तो हवा-पानी हो गया, मैं तो कुछ हूं ही नहीं, सुखा पत्ता हो गया। पानी पर बहता हुआ एक लकड़ी का टुकड़ा हो गया।* एक पानी पर एक लकड़ी का टुकड़ा बहता हो, एक आदमी तैरता है पानी में। तैरना शून्य नहीं होता है। फिर एक आदमी बहता है पानी में, तैरता नहीं, बहा जाता है सब छोड़ दिया है उसने और बहा जाता है। तैरना भरा होना है और बहे जाना शून्य हो जाना है।

तो जीवन में थोड़ा बहें। तैरने का बहुत ख्याल छोड़ दें। तैरने से ही दंभ पैदा होता है। तैरने से अहंकार पैदा होता है। तैरने का ही भाव कि मैं तैरूंगा और जीतूंगा और पहुंचूंगा, इसमें सबमें मैं खड़ा हुआ है। कठोर मैं नहीं, बहें, छोड़ दें, बह जाए। आप भी एक हिस्से में सारे जगत के अलग नहीं। एक पत्ता है वृक्ष का, अलग थोड़ी है। पीछे जुड़ा है शाखाओं से, पीछे जुड़ा है पेड़ से; और पीछे जुड़ा है जड़ों से। और जड़ें, जुड़ी है सूरज से, समुद्र से, पृथ्वी से, सारे पांच तत्वों से। एक छोटा सा पत्ता सारे जगत से जुड़ा है, अलग नहीं है। कोई अलग नहीं है। देखें जीवन को, पहचानें और प्रवेश करें। आपको पता लगेगा कि मैं तो हूं ही नहीं। शून्यता फलित होनी शुरू हो जाएगी। चित्त धीरे-धीरे मौन होता जाएगा। चित्त बहने लगेगा, तैरना बंद कर देगा। तैरना अधार्मिक आदमी का लक्षण है। बहना, बह जाना, सागर में बह जाना धार्मिक चित्त का लक्षण है। *वह जो रिलीजस माइंड है, वह तैरता नहीं, बहता है। सब छोड़ देता है और बह जाता है।* और जिस वक्त आप सब छोड़ देंगे, सब रिलैक्स कर देंगे और बहने लगेंगे तो आप पाएंगे, आप परमात्मा के साथ एक हो गए हैं। आप पाएंगे, अब आपको अपनी शक्ति खर्च नहीं करनी पड़ती है, नदी की शक्ति आपको बहाए ले जा रही है। अब आपको सागर नहीं पहुंचना है, आप सागर पहुंच गए। अब आपको कहीं खोजने नहीं जाना है, आपने अपने को खो दिया सब पा लिया। क्राइस्ट का वचन है, जो अपने को बचाते हैं वे नष्ट हो जाते हैं और जो अपने को खो देते हैं वे उपलब्ध हो जाते हैं। जो अपने को छोड़ देता है, छोड़ देने का नाम शून्यता है। जो अपने को सब भांति छोड़ देता है वह उसी क्षण परमात्मा को उपलब्ध हो जाता है।



ओशो 

आंखों देखी सांच-(प्रवचन-06)

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