ओशो : काम उर्जा को समाधि में कैसे रूपांतरित किया जा सकता है ?
पांचवा प्रश्न– काम उर्जा को समाधि में कैसे रूपांतरित किया जा सकता है?
तंत्र और योग के पास मनुष्य के भीतर का एक विशिष्ठ मानचित्र है। अच्छा हो यदि तुम इस मानचित्र को समझ लो—यह तुम्हारी मदद करेगा, यह तुम्हारी बड़ी सहायता करेगा।
तंत्र और योग कहते है कि मनुष्य के शरीर में सात केंद्र हैं—सूक्ष्म शरीर में, देह में नहीं। सच तो यह है कि ये रूपक हैं। पर आंतरिक मनुष्य के संबंध में कुछ समझने के लिए ये बहुत ही सहायक हो सकते है। ये सात चक्र इस तरह से हैं।
पहला और सर्वाधिक मूलभूत है मूलाधार—इसीलिए इसे मूलाधार कहते है। मूलाधार का अर्थ है आधारभूत, तुम्हारी जड़ों वाला। मूलाधार चक्र वह केंद्र है जहां काम-उर्जा ठीक अभी उपलब्ध है, परंतु समाज ने उस चक्र को बहुत बिगाड़ दिया है।
इस मूलाधार चक्र के तीन कोण हैं: पहला है मौखिक, मुंह, दूसरा है गुद्दा, और तीसरा है जाननेन्द्रिक। ये मूलाधार के तीन कोण हैं। बच्चा अपना जीवन मौखिक से प्रारंभ करता है, और गलत लालन-पालन के कारण बहुत से लोग मौखिक पर ही अटके रह जाते है, वे कभी बढ़ते ही नहीं। यही कारण है कि धूम्रपान, च्यूंगम, निरंतर-भोजन, करना जैसी इतनी धटनाएं घटती है। यह एक मौखिक स्थिरण है—वह केवल मुंह तक ही सिमित हो कर रह जाते है।
बहुत से ऐसे आदिम समाज है जिनमें चुम्बन नहीं लेते। सच तो यह है कि यदि बच्चा सही ढंग से बड़ा हुआ है, उसका पालन पौषण सही हुआ है तो वहा चुम्बन अद्दश्य हो जाता है। चुम्बर हमें दर्शाता है कि मनुष्य मौखिक ही रहा है। जब पहली बार आदिम समाजों को सभ्य मनुष्य के चुम्बन के विषय में पता चला, वे हंसे, उन्होंने सोचा यह तो हास्यस्पद बात है। दो आदमियों का एक दूसरे को चूमना: यह अस्वास्थ्यकर भी जान पड़ता है; हर तरह के रोग को, संक्रमण को एक दूसरे मे स्थानांतरित कर देना। और वे कर क्या रहे है? और ये सब किस लिए? परंतु मनुष्य मौखिक ही रह गया है।
बच्चा मौखिक रूप से अतृप्त रहता है। मां उसे अपना स्तन इतना अधिक नहीं देती जितना कि उसकी आवश्यकता होती है। इसलिए बच्चे सिगरेट पियेगे। बड़ा चुम्बन लेने वाला बनेगा, च्यूंगगम चबाएगा। या अधिक खाने वाला होगा। निरंतर उसे खाने की लत लगी ही रहेगी। यदि मांऐं अपने बच्चों को उनकी आवश्यकतानुसार स्तन देती रहें, तब मूलाधार क्षति-ग्रस्त नहीं होता।
यदि तुम धूम्रपानी हो, चुसनी का उपयोग करके देखो, इसने बहुत से लोगों की सहायात की है। मैं इसे बहुत लोगों को देता हूं, यदि कोई मेरे पास आता है और पूछता है कि धूम्रपान कैसे बंद किया जा सकता है। मैं कहता हूं, ‘एक चुसनी ले लो, एक नकली स्तन, और उसे अपने मुंह में रखो। इसे अपने गले में लटता लो और जब कभी भी तुम धूम्रपान करना चाहो, इस चुसनी को अपने मुंह में रख लो और इसका आनंद लो। और तीन सप्ताह के भीतर, तुम हेरान रह जाओगे, धूम्रपान की तलब विलीन हो गए है।’
कहीं न कहीं, स्तन अभी भी आकर्षित करता है। यही कारण है कि आदमी स्त्रीयों के स्तनां पर इतना केंद्रित हो गया है। इसका कोई कारण नहीं जान पड़ता…क्यों? क्यों आदमी स्त्रियों के स्तनों में इतना उत्सुक है? चित्रकला, मुर्तिकला, फिल्म, अश्लील-साहित्य—हर चीज स्तनोन्मुख जान पड़ती है। और स्त्रियां भी निरंतर अपने स्तनों को छिपाने और फिर भी दिखाने की चेष्टा करती रहती है—वर्ना तो ब्रा मूढ़ता है। यह एक तरकीब है एक साथ छिपाने और दिखाने की, यह एक बड़ी विरोधाभासी तरकीब है। और अब अमरीका में जहां हर मूढ़तापूर्ण बात अपने अति पर पहुंचती है, वे इंजक्श्नप द्वारा रसायन पदार्थ, सिलिकान व अन्य वस्तुएं स्त्रियों के स्तनों के अंदर पहूंचा रहे है। वे स्तनों को सिलिकान से भर रहे हे ताकि वे बड़े हो जाए व आकार में आ जाएं—उस आकार में जिसमे अ-प्रौढ़ मनुष्यता उन्हें देखना चाहती है। यह बचकाना विचार है, पर आदमी कैसे न कैसे मौखिक ही रहता है।
यह मूलाधार की सबसे निचली अवस्था है।
फिर थोड़े से लोग मौखिक से बाहर निकल आते है और वे गुद्दे पे अटक जाते है क्योंकि दूसरी बड़ी क्षति शौच-प्रशिक्षण के साथ घटती है। बच्चों को एक निश्चित समय पर शौच जाने के लिए बाध्य किया जाता है। अब बच्चे तो अपने अंत्र-गति पर नियंत्रण रख सकते नहीं, इसमें समय लगता है, इस पर नियंत्रण पाने में तो उन्हें बरसों लग जाते हैं। इसलिए वे क्या करते है? वे बस जोर-जबरदस्ती करते हैं, वे अपने गुदीय-यंत्र को बंद कर लेते हैं, और इसी कारण वे गुद्दीय स्थिरित हो जाते है।
यहीं कारण है कि संसार में इतनी कब्जियत है। ये बीमारी केवल मनुष्य को ही है, बाकि किसी प्राणी को नहीं है। जंगली अवस्था में कोई जानवर कब्ज का शिकार नहीं होता। कब्ज मनौविज्ञानिक अधिक है। यह एक क्षति है मूलाधार को। और इस कब्ज के कारण बहुत सी चीजे मनुष्य के मन में घटने लग जाती है।
एक आदमी संग्रहकर्ता हो जाता है—संग्रहकर्ता ज्ञान का, संग्रहकर्ता धन का, संग्रहकर्ता पुण्य का—वह संग्रहकर्ता हो जाता है, और कंजूसी उसके रग-रग में समा जाती है। वह कोई चीज छोड़ ही नहीं सकता। जिस किसी चीज पर भी उसका हाथ पड़ता है, वह उसी को पकड़ लेता है। और इस गुद्दीय-प्रमुखता के कारण, मूलाधार को बड़ी क्षति पहुंचती है क्योंकि जाना तो पुरूष या स्त्री को जननेन्द्रिक तक है। यदि वे मौखिक या गुद्दीय पर स्थिर हो जाएं, तो वे जननेन्द्रिक तक कभी नहीं पहुंच पाते—यही कारण है कि समाज तुम्हें कभी भी पूरी तरह कामुक नहीं होने देता। इसी तरकिब का उपयोग कर रहा है।
तब गुद्दीय स्थिरीकरण इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि जननेन्द्रियां कम महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इसी कारण इतनी समयौनता है। समयौनता संसार से तब तक विलीन नहीं होगी जब ते कि गुदोन्मुखता विलीन नहीं हो जाती। शौचप्रक्षिण एक बड़ा खतरनाक प्रशिक्षण है।
और फिर कुछ व्यक्ति यदि जननेन्द्रिक हो भी जाए, किसी न किसी तरह वे मौखिक व गुदीय पर स्थिर न रहें और जननेन्द्रिक हो जाए, तब मनुष्यता में काम के प्रित बड़ा अपराध-भाव निर्मित कर दिया जाता है। सेक्स को अर्थ पाप हो जाता है।
ईसाइयत ने काम को इतना बड़ा पाप माना है कि वे एक मूढ़ता पूर्ण बात को प्रस्तावित करते रहते हैं, दिखाते रहते है और उसे सिद्ध करने की चेष्टा करते रहते हैं, कि ईसा का जन्म एक चमत्कार से हुआ था, कि वह स्त्री-पुरूष के संबंध से पैदा ही नहीं हुए थे। कि मेरी कुंवारी थी। सेक्स इतन बड़ा पाप है कि जीससे की मां भला कैसे सेक्स में उतर सकती है? साधारण जन के लिए तो यह ठीक है पर जीसिस की मां का सेक्स में संलग्न हो जाना और उसी बीच जीसस का जन्म, इतना पवित्र व्यक्ति, सेक्स के द्वारा कैसे पैदा हो सकता है?
मैं पढ़ रहा था:
एक नवयुवती थी जिसकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी, इसलिए उसकी मां उसे एक डॉक्टर के पास ले गई, सारी बातचीत मां ने ही की—वह इसी किस्म की स्त्री थी।
‘वह गर्भवती है,’ डॉक्टर ने कहा।
‘डॉक्टर, मैं तो कहूंगी कि तुम मूर्ख हो। मेरी बेटी ने तो कभी किसी पुरूष का चुंबन तक नहीं लिया है! क्या तुमने ऐसा किया है, डार्लिंग?’ लड़की की मां ने लड़की की और मुड कर पुछा।
‘नहीं मम्मी, मैंने तो कभी किसी पुरूष का हाथ तक नहीं पकड़ा है।’
डॉक्टर अपनी कुर्सी से उठा, और खिड़की तक गया, फिर आकाश में ताकने लगा। एक लम्बे मौन के बाद, मां ने पूछा, ‘क्या वहां कुछ गड़बड है, डॉक्टर?’
नहीं बिलकुल नहीं, बिलकुल नहीं। केवल इतना मात्र भेद है, पिछली बार जब ऐसी घटना घटी थी, तब पूरब में एक तारा प्रकट हुआ था—शायद इस बार इससे मैं चूकना नहीं चाहता वहीं देख रहा हूं।
सेक्स की इतनी निंदा की गई है कि तुम इसका आनंद उठा नहीं पाते हो। और यही कारण है कि उर्जा कहीं न कहीं मौखिक, गुद्दीय या जननेन्द्रिय में अटक कर रह जाती है। यह उपर नही जा पाती है।
तंत्र कहता है कि आदमी को मुक्ति दी जानी है, इन तीन चीजों से अनाकृत किया जाना है। इसलिए तंत्र कहता है कि पहला बड़ा काम तो मूलाधार में किया जाना है। मौखिक स्वतंत्रता के लिए: चीखना, हंसना, चिल्लाना, रोना-पीटना बहुत सहायक हो सकता है। इसलिए मैंने एनकाउन्टर, प्राईमल, गेस्टाल्ट और इसी तरह की समूह-चिकित्साओं को चुना है—ये सब मौखिक स्थिनतरण से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकती है। और गुद्दिय स्थिति से तुम्हें छुटकारा दिला सकती है। प्राणायम, त्रीवरश्वास प्रणाली, इसमें बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। क्योंकि यह सीधी गुद्दीय केंद्र पर चोट करती है। और धीर-धीर इस प्रकृयां के द्वारा इस गुदीयकेंद्र से मुक्त हो सकते हो। तब तुम्हारे मन को शरीर को एक विशेष शांति का अनुभव होगा। एक तनाव जो तुम लिए चल रहे हो वह मुक्त होते ही तुम र्निभार महसूस करोगे। इसलिए सक्रिय ध्यान और कुंड़लनी ध्यान को करने के लिए मैं अधिक जोर देता हूं। आज के मनुष्य के लिए यह बहुत अधिक महत्व पुर्ण है।
और फिर काम केंद्र: काम केंद्र को अपराध भाव से, निंदा से मुक्त किया जाना है। तुम्हें इसके विषय में फिर से सीखना प्रारंभ करना है। केवल तभी क्षति-ग्रस्त काम केंद्र स्वस्थ हो सकता है। वह एक स्वास्थ ढंग से कार्य कैसे कर सकता है। तुम्हें इसका आनंद उठाना फिर से सीखना है—बिना किसी अपराध भाव के।
अपराध-भाव की भी हजार किस्में हैं। हिन्दू मन में एक भय है कि वीर्य उर्जा एक महान उर्जा है—यदि एक बूंद भी खो गई तो, तुम भी गए। यह बड़ी खतरनाक कब्जियत वाली दृष्टि है। इसे जमा कर लो! तुम इस बात को जान लो की खोता कुछ भी नहीं, तुम इतना सक्रिय शक्ति हो, तुम उस उर्जा को प्रतिदिन निर्मित करते जाते हो। खोता कुछ भी नहीं है।
हिंदु मन वीर्य से, वीर्य-उर्जा से अत्याधिक ग्रस्त है। एक बूंद भी खोनी नही चाहिए। वे निरंतर भयभीत रहते है। इसलिए जब कभी भी वे संभोग करते है, यदि वे संभोग करे तो, तब वे बड़ी हताशा में पड़ जाते है, वे सोचते है कि हाए इतनी सारी उर्जा बर्बाद हो गई। इसे शरीर किस महनत से तैयार करता है। एक मुढ़ धारणा। तुम्हारे पास उर्जा की एक मृत-मात्रा नहीं है; तुम एक डायनमो हो—तुम उर्जा निर्मित करते हो तुम इसे प्रतिदिन निर्मित करते हो। सच तो यह है कि जितना अधिक तुम इसका उपयोग करते हो, उतना ही अधिक तुम्हारे पास यह होती है। यह ऐसे ही काम करता है। जैसे कि तुम्हारा सारा शरीर। यदि तुम अपने मांस-पेशियों को उपयोग में लाओंगे, वे बढ़ेगी। यदि तुम चलोगे, तुम्हारी टांगें मजबूत होंगी। यदि तुम दौड़ोगे, दौड़ने के लिए तुम्हें और उर्जा मिलेगी। यह मत सोचना कि जो व्यक्ति कभी न दौड़ा हो और अचानक दौड़ने लगे, उसके पास अधिक ऊर्जा होगी—उसके पास उर्जा होगी ही नहीं। उसके पास तो दौड़ने का पेशी-तंत्र ही न होगा।
उस सब को जो परमात्मा ने तुम्हें दिया है, उसका उपयोग करो, उसे उपयोग में लाओ और तुम्हें वह और अधिक मात्रा में मिलने लगेगा।
इसलिए एक हिंदू पागलपन है: जमा करो। यह कब्ज की तरह से है। और अब एक अमरीकन पागलपन है, वह अतिसार की तरह से कि बस फेंकों इसे, बाहर निकालने दो, अर्थपूर्ण हो, अथवा न हो, इस से कुछ लेना देना नहीं है। बस फेंकते जाओ। इसलिए अस्सी वर्ष का आदमी भी बचकाने ढंग से सोचता है। काम शुभ है, काम सुंदर है पर यह अंत नहीं है। यह एल्फा तो है, परंतु ओमेगा नहीं है। व्यक्ति को इसके पार जाना है। पर इसके पार जाना कोई निंदा नहीं है। इसके पार जाने के लिए भी इसी से होकर गुजरना होता है।
तंत्र काम के प्रति सबसे स्वस्थ दृष्टि रखता है। यह कहता है काम शुभ है, काम स्वास्थ है, काम प्राकृतिक है, परंतु मात्र पुनर्उत्पाद के अतिरिक्त काम में और अधिक संभवानएं भी है। और काम में केवल मौज-मस्ती के अलावा और भी अधिक संभावनाएं है। काम अपने में परम का कुछ अंश छिपाए है, समाधि की एक झलक छुपाए है, आनंद का एक उतंग छुपाए है।
मूलाधार चक्र को विश्रांत करना है, विश्रांत कब्जियत से, विश्रांत अतिसार से। मूलाधार चक्र को अपने अधिकतम पर, एक सौ प्रतिशत पर कार्य करना है। तभी ऊर्जा गति करना प्रारंभ करती है।
दूसरा चक्र है स्वाधिस्थान चक्र, हारा, मृत्यु-केंद्र। ये दोनों केंद्र बहुत क्षतिग्रस्त हुए है। क्योंकि मनुष्य काम से भयभीत रहा है और मनुष्य मृत्यु से भी भयभीत रहा है। इसलिए मृत्यु से दूर रहना है: मृत्यु के विषय मे बात मत करो! इसे तो भूल ही जाओ। यह तो घटती ही नहीं। यदि कभी यह घटती हो भी, इस पर कोई ध्यान मत दो। इसको अवधान में लाओ ही मत। यहीं सोचते रहो कि तुम सदा ही जीने वाले हो—मृत्यु से बचो।
तंत्र कहता है: न तो काम से बचो, न ही मृत्यु से बचो। यही कारण है कि सरहा श्मशान में ध्यान करने के लिए गया—मृत्यु से बचने के लिए नहीं। और वह तीर बनाने वाली स्त्री के साथ रहा स्वस्थ काम का, परिपूर्ण काम का, अधिकत्म काम का एक जीवन जीने के लिए। श्मशान भूमि में, एक स्त्री के साथ रहा, उस स्त्री के साथ रहने के कारण उसके क्रेंद्रों को विश्रांति मिली, उसे खिलने में सहयोग मिला, उसके द्वार पुर्णता से खुल गए। मृत्यु और काम। एक बार तुम मृत्यु को स्वीकार कर लो और इससे भयभीत न रहो, एक बार तुम काम को स्वीकार कर लो और इससे भयभीत न रहो, तुम्हारे दोनों निचले केंद्र विश्रांति में हो जाते हैं।
और यही दो वे निचले केंद्र है जो समाज द्वारा क्षति-ग्रस्त किए गये है। बुरी तरह से क्षति-ग्रस्त। एक बार ये स्वास्थ हो जाएं…बाकी पांच केंद्र क्षति-ग्रस्त नहीं होते, इन्हें क्षति-ग्रस्त करने की अवश्कता ही नहीं होती क्योंकि इन पांचों क्रेंद्र तक लोग जीते ही नहीं वहां तक पहूंचते ही नहीं। इस लिए समाज इन्हें क्षति-ग्रस्त करने के बारे मे सोचता ही नहीं क्योंकि उसका काम तो निचले दो केंद्र से ही चल जाता है। ये दो केंद्र तो प्राकृतिय रूप में उपलब्ध हैं। जन्म घट चुका है—काम केंद्र मूलाधार। और मृत्यु धटने को है: स्वाधिस्थान—दूसरा केंद्र। ये दो चीजें हर व्यक्ति के जीवन मे हैं, इसलिए समाज ने इन दोनों केंद्र को नष्ट कर दिया है। और इन्हीं दोनों की सहायता से शासन करने की चेष्टा की है।
तंत्र कहता है: ध्यान करो जब तुम संभोग मे उतरो, ध्यान करो जब कोई मरता हो—वहां जाओ, देखो, उस पर अवध्यान करो। मरते हुए व्यक्ति की बगल में कुछ क्षण के लिए बैठ जाओ। उसकी मृत्यु को महसूस करो, उसमे भागीदार बनो। मरते हुए आदमी के साथ गहन ध्यान मे उतरो। और जब कोई आदमी मर रहा होता है तब इस बात की संभावना है कि मृत्यु का स्वाद लिया जा सकता है। क्योंकि इस बात को जरा समझों कि जब कोई व्यक्ति मर रहा होता है, वह स्वाधिस्थान चक्र से बहुत सी ऊर्जा मुक्त करता है…उसे ऊर्जा मुक्त करनी पड़ती है क्योंकि वह मर जो रहा है। बिना इसे मुक्त किय वह मर भी नहीं सकता। क्योंकि स्वाधिस्थान चक्र पर समस्त दबी हुई ऊर्जा मुक्त होगी ही क्योंकि अब वहां उसका काम खत्म हो रहा है, वह मर जो रहा है। इस बात को जरा समझ लो।
इसलिए जब कोई आदमी या कोई स्त्री मरती हो, इस अवसर को चूको मत। यदि तुम किसी मरते हुए व्यक्ति के पास हो, मौन हो, शांत बैठे हो, चुपचाप ध्यान की अवस्था में बैठे हो। उस अवसर का उपयोग करे ध्यान में उतरों और देखों तुम किस सरलता से ध्यान की गहराई में उतर सकते हो। जब भी कोई मरता है तब अचानक एक विस्फोट से ऊर्जा चारों और फैल जाएगी, और तुम मृत्यु का स्वाद ले सकते हो। और उससे तुम्हें बड़ी विश्रांति मिलेगी: हां, मृत्यु घटती है, पर मरता कोई नहीं। हां, मृत्यु घटती है, पर सच तो यह है कि मृत्यु कभी घटती ही नहीं।
संभोग के समय, ध्यान करो ताकि तुम जान सको कि समाधि का कुछ अंश कामुकता में प्रवेश कर जाता है। और मृत्यु पर ध्यान करते समय, इसमे गहरे उतरो ताकि तुम देख सको कि अमर्त्य का कुछ मृत्यु में प्रवेश करता हे। ये दो प्रयोग बहुत सरतला से ऊपर जाने में तुम्हारी सहायता कर सकते है। और मैं कहता हूं की जरूर ही करेंगे।
इस बात भी जरा समझ लो, की संभोग से बाकी पांच केंद्र जो तुम्हारे है वह नष्ट नहीं होते है। वह तो उस समय समंजित होते है, बस इतना भर करना है उससे ऊर्जा को गति करने देनी है, उसे रोकना नहीं है, वे वहां पूर्णत: समंजित होते है—बस ऊर्जा से उन दोनों केंद्रों की सहायता की जाए, ऊर्जा गति करना प्रारंभ कर देती है। इसलिए मृत्यु और प्रेम को अपने ध्यान की दो विषय वस्तु होने दो। उसे सरलता और सहजता से अपने जीवन मे उतरने दो।
ओशो
तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision—(सरहा के गीत)-भाग-पहला
(आठवां—प्रवचन) प्रेम के प्रति सच्चे रहो
दिनांक-28 मार्च 1977 ओशो आश्रम पूना।)
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