ओशो : मै तुम्हारा मित्र हूं , गुरु नहीं ।

"मैं तुम्हारा मित्र हूँ, गुरु नही। क्योकि गुरु के नाम पर बहुत पाखंड हो गया है ! मै तुम्हे चरणों में नहीं, हृदय में बैठाना चाहता हूँ ! मैं तुम से बड़ा नहीं, जो तुम हो, वही मैं हूँ ! मैं तुम्हारे अंदर भी आनन्द देखना चाहता हूँ। जो मुझे मिल रहा है, मैं तुम्हे भी वह अनुभूति देना चाहता हूँ ! मैं कुछ भी शेष नही रखूंगा। जो मुझे मिला वह सब कुछ बांटना चाहता हूँ ! ऐसा नही कि मैं तुम्हारे उपर कोई अहसान कर रहा हूं! मैं स्वयम् आजाद हूँ और तुम्हें भी आजादी देता हूँ ! तुम्हे वह स्वतंत्रता देना चाहता जो किसी धर्म ने तुम्हे नही दी है। तुम चाहो तो धन्यवाद भी मत देना। तुम मेरे मन्दिर मत बनाना ! मेरा कोई धर्म मत बनाना! मेरे प्रवचनों को शास्त्र मत बनाना ! तुम सब अपने-अपने गुरु बन जाना! तुम्हारा गुरु बनने में मेरा कोई रस नही है ! लेकिन तुम्हारी गुरु मानने की यह आदत जन्मों से जुडी हुई है! हम सब एक ही माला के मोती हैं। जो तुम हो वही मैं हूं, और जो मैं हूँ वही तुम हो !" ओशो

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