ओशो : अदभुत सेतू - प्रेम

अदभुत सेतू - प्रेम


तीन शब्द समझ लेना--ओशो


एक हैं : काम !

काम हैं : सुख नीचे की तरफ बहता हुआ !


दूसरा शब्द हैं : प्रेम !

प्रेम हैं : सुख मध्य मैं अटका हुआ :न नीचे जा रहा हैं न ऊपर

जा रहा हैं !

और तीसरा शब्द हैं

प्रार्थना ! प्रार्थना हैं : सुख ऊपर

जाता हुआ !


उर्जा वही हैं काम मे वही उर्जा नीचे जा रही हैं , प्रेम मे वही उर्जा बीच मे थिर हो जाती हैं , प्रार्थना मैं वही उर्जा पंख खोल देती है,

आकाश की तरफ उड़ने लगती हैं !


इसलिए मैंने कहा हैं ,सम्भोग और

समाधि संयुक्त हैं ,एक ही उर्जा है ,एक

ही सीडी है ! नीचे की तरफ जायो तो

सम्भोग ऊपर की तरफ जाओ तो

समाधी : और दोनों के मध्य मैं प्रेम है !

प्रेम द्वार है ! प्रेम दोनों का द्वार है !

प्रेम सम्भोग का भी द्वार है ! 


अगर तुम्हारी उर्जा नीचे की तरफ जा रही

है तो प्रेम सम्भोग का द्वार बन जायेगा ! अगर तुम्हारी उर्जा उपर की तरफ जा रही है तो प्रेम समाधी का द्वार बन जायेगा ! प्रेम बड़ा अद्भुत सेतु है... 


मरो हे जोगी मरो


ओशो


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