ओशो : साक्षी से भी परे कुछ और है


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साक्षी से भी परे कुछ और है

साक्षी पर परमात्मा रुक गया होता तो जगत में इतना नृत्य नहीं हो सकता था इस रासलीला को देखते हो?

चांद नाच रहा, सूरज नाच रहे, पृथ्वी नाच रही, तारे नाच रहे, पूरा ब्रह्मांड नाच रहा है

किसी गहन अहोभाव में लीन, किसी प्रार्थना में डूबा सारा अस्तित्व नाच रहा है

सुनो इसकी

झनकार, जगत के पैरों में बंधे अर की आवाज सुनो

तो मीरा ठीक कहती है पद घुंघरू बांध नाची

यह चौथी अवस्था हुई

चैतन्य नाचने लगे; मीरा नाचने लगी

बाउल नाचते हैं, पागल हो कर नाचते हैं

भीतर कोई बचा नहीं, भीतर शून्य हो गये

साक्षी तो शून्य पर ले आता है. जब तुम नाचोगे तब पूर्ण होओगे

साक्षी तो तुम्हें कोरा कर देता है, खाली कर देता है

तुम गये

अब परमात्मा उतरेगा तो नाचेगा ध्यान रखना

या फिर परमात्मा को रोकना, उतरने मत देना

इसलिए जैन परमात्मा को इनकार करते हैं

वह लीला से बचने की व्यवस्था है

नहीं तो तुम शून्य हो गये, अब क्या करोगे?

अब परमात्मा उतरेगा, और जैसा कि उसकी आदत है नाचने की, वह नाचेगा

वह गीत गायेगा; वह हजार खेल करेगा

लीला उसका स्वभाव है

वह माया रचेगा

माया उसकी छाया है

तो अगर तुम डर गये तो अटक गये

साक्षीभाव में एक तरह का सूखापन रह जायेगा; रसधार न बहेगी, फूल न खिलेंगे, हरियाली न उगेगी, नये—नये अंकुर न आएंगे, वसंत की ऋतु न आएगी

साक्षी तो एक तरह का पतझड़ है, वह पतझड़ की अवस्था है

फिर वसंत तो आने दो

पतझड़ तो उसी की तैयारी थी; उस पर रुक मत जाना

पतझड़ में भी कभी—कभी वृक्ष सुंदर लगते हैं

नग्न खड़े वृक्ष, आकाश की पृष्ठभूमि में, कभी नग्न वृक्षों के पीछे उगता सूरज, उनकी नंगी शाखायें फैली आकाश में, कभी सुंदर लगती हैं

माना, उनका भी अपना सौंदर्य है

लेकिन वह सौंदर्य रुकने जैसा नहीं है


आने दो पत्ते, उगने दो नये पल्लव, फिर गाने दो पक्षियों को, बनाने दो घोंसलों को, लेकिन अब बड़े और ढंग से बनेगी बात

अब कोई चिंता न होगी, अब कोई तनाव न होगा.......



ओशो 

अष्‍टावक्र: महागीता–(भाग–4) प्रवचन–48 



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