ओशो : क्या तंत्र अतिभोग का ही एक मार्ग नहीं है ?
चोथा प्रश्न : क्या तंत्र अतिभोग का ही एक मार्ग नहीं है ?
रीको, ने एक बार नानसेन से बोतल में बत्तख की पुरानी पहेली की व्याख्या करने को कहा।
‘यदि कोई व्यक्ति बतख के नवजात शिशु को एक बोतल में रख दे, और उसे तब तक भोजन देता रहे जब तक कि वह बच्चा बड़ा होकर पूरी बोतल ही न बन जाएं, कैसे वह व्यक्ति बतख को बोतल से उसे बाहर निकाल सकता है। कि न तो बतख ही मरे और न ही बोतल टूटे।’
नानसेन ने जोर से अपने हाथों से ताली बजाई और चिल्लाया, ‘रीको!’
‘हां, गुरुजी,’ रीको ने चौंक कर कहा।
‘देख’, नानसेन ने कहा, ‘बतख बाहर है।’
…….
नहीं! यह तो अति भोग से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग है। यह तो कामुकता से बाहर आने का एकमात्र उपाय है। और कोई भी उपाय कभी भी मनुष्य के लिए सहायक नहीं हुआ है, बाकि और उपायों ने तो मनुष्य को अधिक से अधिक कामुक बना दिया है।
काम विलीन तो नहीं हुआ है। धर्मों ने बस इसे और अधिक विषैला बना दिया है। यह अभी भी है–एक जहरीले रूप में। हां, अपराध भाव तो मनुष्य में पैदा हो गया है, परंतु काम अदृश्य नहीं हुआ है। यह अदृश्य हो सकता भी नहीं क्योंकि यह एक जैविक वास्तविकता है। यह अस्तित्वगत है; इसका दमन करने मात्र से यह अदृश्य नहीं हो सकता। यह केवल तभी अदृश्य हो सकता है, जब तुम इतने सजग हो जाओ कि कामुकता में संपुरित ऊर्जा को तुम मुक्त कर सको–यह ऊर्जा दमन से नहीं बल्कि समझ से मुक्त होती है। और एक बार ऊर्जा मुक्त हो जाए, कीचड़ से कमल…कमल को कीचड़ से उठना ही होगा, इसे ऊपर जाना ही होगा, और दमन तो इसे कीचड़ में और गहरा ले जाता है। यह उसे नीचे दबाये जाता है।
तुम्हारे, सारे समाज ने, अब तक जो किया है, वह है काम को अचेतना के कीचड़ में देबा देना। इसे दबाए चले जाओ, इसके ऊपर चढ़कर बैठ जाओ, इसे हिलने-डुलने मत दो, इसे मार ड़ालो, उपवास द्वारा, अनुशासन द्वारा, हिमालय की किसी गुफा में चले जाने के द्वारा, किसी ऐसे मठ में चले जाने के द्वारा जहां स्त्री को जाने की अनुमति न दी जाती हो। ऐसे मठ हैं जहां सैंकड़ों वर्षो सेकिसी स्त्री ने प्रवेश नहीं किया है। ऐसे मठ हैं जहां केवल साध्वीयां ही रहती है। जहां कभी किसी पुरुष ने प्रवेश नहीं किया है। ये दमन के उपाय हैं। और ये (उपाय) निर्मित करते हैं अधिक से अधिक कामुकता और अतिभोग के अधिक से अधिक स्वप्न।
नहीं, तंत्र अति भोग का मार्ग नहीं है। यह तो स्वतंत्रता का एक मात्र मार्ग है। तंत्र कहता है: जो भी है उसे समझ जाना है–और समझ से परिवर्तन स्वतः घटित होते है।
इसलिए मुझे सुनकर या सरहा को सुनकर यह सोचना प्रारंभ मत कर देना कि सरहा तुम्हारे अतिभोग का समर्थन कर रहा है। यह कहानी, सुनो:
मार्टिन नाम का एक प्रौढ़ व्यक्ति डॉक्टर के पास अपनी जांच करवाने गया। ‘मैं चाहता हूं कि आप बाताएं कि मेरे साथ क्या गड़बड़ी है, डॉक्टर। मुझे यहा दर्द होता है, वहा दर्द होता है और यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मैंने एक बड़ी साफ सुथरी जिंदगी जी है–न धूम्रपान किसा, न कभी शराब पी,न कभी इधर-इधर दौड़ा। मैं प्रत्येक रात नो बजे बिस्तर में चला जाता हूं, अकेला। फिर मुझे क्यों यह हो रहा, ये सब नहीं होना चाहिए?’
‘आपकी उम्र कितनी है?’ डॉक्टर ने पूछा।
‘अपने अगले जन्मदिन पर मैं चौहतर वर्ष का हो जाऊंगा।’ मार्टिन ने कहा।
डॉक्टर ने उतर दिया, ‘आखिरकार अब आप उस उम्र में पहुंच गए हैं, जबकि आपको ऐसी चीजों की आशा करनी ही होगी। पर आपके पास अभी भी काफी समय पड़ा है। बस इसे शांति से लीजिए और चिंता मत कीजिये। मैं सुझाव दूंगा कि आप हॉट-स्प्रिंग्स चले जाएं।
इसलिए मार्टिन हॉट-स्प्रिंग्स चला गया। वहां उसकी भेट एक और व्यक्ति से हुई जो इतना बूढ़ा और जर्जर दिखाई दे रहा था कि उसकी तुलना में मार्टिन को कुछ हिम्मत महसूस हुई। ‘भाई’ मार्टिन कहता है: ‘तुमने निश्चय ही अपनी अच्छी देखभाल कि होगी, तभी तो तुम ऐसी परिपकव आयु तक पहुंच पाए हो। मैंने भी एक शांत और अच्छा जीवन जिया है, परंतु मैं शर्त लगता हूं कि तुम्हारे जैसा नहीं। इस परिपकवता तक, इस वृद्धावस्था तक पहुंच पाने का तुम्हारा सूत्र क्या है?
तब वह झुर्रीदार बूढ़ा कहता है, बात बिलकुल उलटी है, महोदय! जब मैं सत्रह वर्ष का था, मेरे पिता ने मुझसे कहा, ‘बेटा जाओ और जिंदगी का मजा लूटो। जी भर कर खाओ पियो और मस्त रहो। जीवन को पूरा जियो। एक स्त्री से विवाह करने के स्थान पर कवांरे रहो और दस को भोगो। अपना पैसा पत्नी और बच्चों पर खर्च करने के स्थान पर मौज-मस्ती पर और अपने ऊपर खर्च करो।’ हां, शराब, स्त्री और गीत-संगीत, जीवन को पूरी तरह से जीना। यहीं मेरे सारे जीवन कि नीति रही है, मेरे भाई!’
‘बात तो तुम्हारी जमती है’, मार्टिन ने कहा। ‘तुम्हारी उम्र कितनी है?’
उस व्यक्ति ने उतर दिया, ‘चौबीस वर्ष।’
अति भोग आत्म-हत्या है–वैसे ही जैसे दमन। ये वे दो अतियां है जिनसे बचने को बुद्ध कहते हैं। एक अति है दमन, दूसरी अति है अति भोग। बस बीच में रहो; न दमन रत रहो, न अतिभोग में डूबों। बस मध्य में रहो, चौकने, सजग, जागरूक। यह तुम्हारा जीवन है। न तो इसका दमन करना है, न ही इसे बर्बाद करना है–इसे तो समझा जाना है।
यह तुम्हारा जीवन है–इसका ख्याल रखो! इसे प्रेम करो! इससे दोस्ती करो! यदि तुम अपने जीवन से दोस्ती कर सको, यह बहुत से रहस्य तुम पर खोल देगा, यह तुम्हें परमात्मा के द्वार तक ले जाएगा।
लेकिन तंत्र अतिभोग बिलकुल नहीं है। दमनकारी लोगों ने सदा यह सोचा हैं कि तंत्र अतिभोग है, उनके मन इतने पूर्वा ग्रह से भरे है। उदाहरण के लिए: एक व्यक्ति जो किसी मठ में जाता है, और बिना कभी किसी स्त्री को देखे वहां रहता है, वह कैसे यह विश्वास कर सकता है कि ‘सरहा’ जब वह किसी स्त्री के साथ रहता है, अतिभोग ग्रस्त नहीं है? न वह केवल साथ रहता है, बल्कि वह अजीब-अजीब हरकतें भी करता है: वह स्त्री के समक्ष नग्न बैठता है, स्त्री भी नग्न होती है, और वह स्त्री को देखता चला जाता है, या स्त्री से संभोग करते समय भी वह साक्षी रहता है।
अब उसके साक्षीभाव को तो तुम देख नहीं सकते, तुम तो बस इतना ही देख सकते हो कि वह स्त्री से संभोग कर रहा है। और अगर तुम दमकारी हो, तुम्हारी सारी दमि कामुकता फूट पड़ेगी। तुम पागल हो जाने लगोगे। और जिस किसी चीज का भी तुमने अपने भीतर दमन किया है, उस सबको सरहा के ऊपर प्रक्षेपित कर लोगे–और सहरा तो वैसा तो कुछ कर ही नहीं रहा था, वह तो एक भिन्न ही आयाम में गति कर रहा है। सच में तो देह में तो उसकी रूचि है ही नहीं, वह तो यह देखना चाहता है कि यह कामुकता है क्या, वह तो यह जानना चाहता है कि कामोंमाद का आकर्षण है क्या; वह उस ऊर्ध्व क्षण में ध्यान पूर्ण होना चाहता है, ताकि उसे सूत्र ओर कुंजी मिल सके…शायद समाधि का द्वार खोलने की कुंजी वहां हो। सच में तो, कुंजी वहां है।
परमात्मा ने कुंजी को तुम्हारी कामुकता में छिपा दिया है। एक और तो तुम्हारे काम के द्वारा जीवन चलता रहता है; यह तो तुम्हारी काम ऊर्जा का एक आंशिक उपयोग है। दूसरी और, यदि तुम पूर्ण जागरुकता के साथ अपनी काम ऊर्जा में गति करो, तुम पाओगे कि तुम्हारे हाथ एक ऐसी कुंजी लग गई जो कि शाश्वत जीवन में प्रवेश हेतु तुम्हारी सहायता कर सकती है। काम का एक छोटा सा अंग तो यह है कि तुम्हारे बच्चे जिएंगें। दूसरा अंग एक बड़ा अंग यह है-कि तुम शाश्वतता में जी सकते हो। काम-ऊर्जा, जीवन-ऊर्जा है। साधारणतः तो हम बरामड़े से आगे बढ़ते ही नहीं, महल में तो हम कभी जाते ही नहीं। सरहा महल में जाने का प्रयास कर रहा है। अब वे लोग जो राजा के पास आए वे दमित लोग रहे होंगे, जैसे कि सब लोग दमित लोग हैं।
राजनेता और पुरोहित को तो दमन सिखना ही होगा, क्योंकि केवल दमन से ही तो लोगों को विक्षिप्त बनाया जा सकता है। और तुम स्थिरचित लोगों की अपेक्षा विक्षिप्त लोगों पर अधिक आसानी से राज कर सकते हो। और वे लोग अपनी काम ऊर्जा में विक्षिप्त होते है, वे अन्य दिशाओं में चलने लग जाते है–वे चलना शुरू कर देते है, धन कि तरफ, या पद की तरफ, या प्रतिष्ठा की तरफ। उन्हें कहीं न कहीं तो अपनी काम ऊर्जा को दिखाना ही होता है, यह उबल रही होती है–उन्हें किसी न किसी ढंग से तो मुक्त करना ही होता है। इसलिए धन के प्रति पागलपन, या सता का लगाव उनकी ऊर्जा-मुक्ति के तरीके बन जाते है।
सारा समाज काम-ग्रसित है। यदि काम-ग्रस्तिता संसार से अदृश्य हो जाए, लोग धन के पीछे पागल ही न होंगे। तब धन कि परवाह कौन करेगा? और लोग पद की चिंता भी नहीं करेंगे। कोई भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहेगा–किस लिए? अपने साधारणपन में जीवन इतना सुंदर है, अपने साधारणपन में यह इतना श्रेष्ठ है, कि कोई भी कुछ विशिष्ट बनना क्यों चाहगा? कुछ न बनने में यह इतना स्वादपूर्ण है–कुछ भी नहीं है। लेकिन यदि तुम लोगों की कामुकता को नष्ट कर दो और उन्हें दमनकारी बना दो, तब इतने कुछ की कमी हो जाती है। कि वे सदा बेचैन रहते है: कहीं और आनंद होगा, यहां तो है नहीं।
काम प्रकृति और परमात्मा द्वारा प्रदत (रचित) एक ऐसा कृत्य है, जिसमें तुम बार-बार वर्तमान क्षण में फेंक दिये जाते हो। साधारणतः तो तुम वर्तमान में कभी होते ही नहीं, उस समय को छोड़ कर जबकि तुम संभोग में रत होते हो, और वह भी मात्र कुछ क्षणों के लिए।
तंत्र कहता है कि व्यक्ति को काम को समझना है, काम के रहस्य को जानना है। यदि काम इतना महात्वपूर्ण है कि जीवन उससे आता हो तब इसमें कुछ ओर भी चाहिए। वह कुछ और ही कुंजी है, दिव्यता की, परमात्मा की।
पांचवा प्रश्न: मेरे साथ क्या गड़बझ है? जो आप कहते हैं वह मैं समझता हूं, मैं आपकी पुसतकें भी पढ़ता हूं, और उनका बहुत आनंद लेता हूं, पर फिर भी किसी अत्यंत आवश्यक चीज की कमी जान पड़ती है।
वर्डसवर्थ के इन सुंदर शब्दों पर धयान लगाओ:…
….
इसलिए बस मुझे पढ़ने और सुनने से अधिक सहायता न मिलेगी…महसूस करना प्रारंभ करो। सुनते हुए महसूस भी करो, केवल सुनो ही मत। सुनते समय हृदय से सुनो। वही अर्थ है जब सब धर्म कहते हैं कि श्रद्धा का, विश्वास का, उसके लिए एक भरोसे की आवश्यकता पड़ती है। श्रद्धा का अर्थ है सुनने का एक ढंग–हृदय से; संदेह से नहीं, तर्क से नहीं, युक्ति से नहीं, विवादपूर्ण बौद्धिकता से नहीं, बल्कि हृदय से, एक गहन साझेदारी से।
जैसे कि तुम संगीत सुनते हो, मुझे वैसे ही सुनो। मुझे ऐसे मत सुनो जैसे कि तुम किसी दार्शनिक को सुनते हो, मुझे ऐसे सुनो जैसे तुम पक्षियों को सुनते हो। मुझे ऐसे सुनो जैसे तुम किसी झरने को सुनते हो। मुझे ऐसे सुनो जैसे कि तुम चीड़ के वृक्षों से गुजरती हवा को सुनते हो। मुझे विवादग्रस्त मन से नहीं, सहभागी हृदय से सुनो। और फिर उस चीज की कमी, जिसकी कमी तुम्हें निरंतर खल रही है, महसूस नहीं की जाएगी।
हमारा सिर आवश्यकता से अधिक विशेषज्ञ बन गया है, यह एकदम अति पर ही पहुंच गया है। इसने तुम्हारी समस्त ऊर्जाओं को चूस लिया है। यह तानाशाह बन गया है। निश्चत ही यह काम तो करता है, परंतु चूंकि यह काम करता है, तुमने इस पर बहुत अधिक निर्भर रहना शुरू कर दिया है। और अति पर कोई भी सदा जा सकता है, और मन की तो प्रवृति ही अति पर जाने की है।
नवयुवा वारेन बहुत ही महात्वकांक्षी था, और जब उसे एक ऑफिस बाय की नौकरी मिली, उसने सब कुछ सीख लने का निश्चय किया ताकि वह अपने बॉस पर अपना प्रभाव जमा सके और आगे बढ़ सके। एक दिन बॉस ने उसे बुलवाय और कहा: ‘आतायात विभाग को कहो कि ग्यारह तारीख को छूटने वाले ‘कवीन मेरी जहाज में मेरे लिए एक सीट सुरक्षित करवा दें।’
‘क्षमा करें, श्रीमान’, लड़के ने कहा: ‘परंतु जहाज बारह तारिख को रवाना होगा।’
बॉस ने प्रभावित होते हुए उसकी और देखा। फिर उसने कहा, ‘क्रय-विभाग को कहो कि अल्यूमिनियम के लिए छह महीने की पूर्ति करने का ऑडर दे दें।’
‘क्या मैं सुझाव दे सकता हूं’, वारेन ने कहा: ‘कि ऑर्डर कल भेजा जाए क्योंकि कल दाम और गिर जाएंगे। इसके साथ ही, केवल एक महीने की पूर्ति का ही ऑर्डर दिया जाना चाहिए क्योंकि बाजार कि प्रवृति से यह संकेत मिलता है कि कीमत अभी और कम होगी।’
बहुत अच्छे नौजवान, तुम्हें तरक्की मिलनी ही चाहिए। अब कुमारी केट को भेज दो, मुझे एक पत्र लिखवान है।
‘कुमारी केट आज नहीं आई है’, लड़के ने उतर दिया।
‘क्या बात है, क्या उसकी तबीयत खराब है?’
‘नहीं, श्रीमान, नौ तारीख तक तो नहीं।’
अब यह हुआ आवश्यकता से अधिक जानना, यह हुआ बहुत दूर तक चले जाना। और यही मानव मन के साथ हुआ है, यह जरुरत से ज्यादा दूर चला गया है। इसने अपनी सीमाओं को पार कर लिया है। और इसने उसकी सारी ऊर्जा को सोख लिया है, इस लिए हृदय के लिए कुछ बचा ही नहीं है। हृदय से तो तुम पूरी तरह से बच कर ही गुजर गए हो। हृदय से तो तुम गुजरते ही नहीं। उस राह तो तुम कभी चलते ही नहीं। हृदय तो एक मुर्दा चीज हो गया है। एक मृत-भार। बस यही तो कमी महसूस हो रही है। तुम मुझे सुन सकते हो सिर से, और निश्चय ही जो मैं कह रहा हूं, वह तुम समझ भी लोगे–और फिर भी तुम कुछ नहीं समझ पाओगे, एक शब्द भी नहीं, क्योंकि यह एक ऐसी समझ है जो ज्ञान की अपेक्षा प्रेम के अधिक समीप है।
यदि तुम मेरे प्रेम में हो, केवल तभी…यदि तुमने मुझे महसूस करना शुरु कर दिया है। केवल तभी…यदि मेरे और तुम्हारे बीच में एक स्नेह बढ़ रहा है, यदि यह केवल एक प्रेम-संबंध है केवल तभी।
ओशो
तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision: (सरहा के गीत) भाग-पहला
दूसरा प्रवचन-The goose is out!-(हंस बाहर है)
(दिनांक 22 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।)
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