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ओशो : प्राकृतिक

प्राकृतिक स्वयं को धूप का स्पर्श हो जाने दो, जिससे तुम्हारे अंदर ऊर्जा की अनुभूति होगी । हवा केवल तुमसे होकर न गुजरे, बल्कि तुम्हारे माध्यम से बहनी चाहिए,  तब फिर यह तुम्हारे हृदय को निर्मल बनाती जाती है ।              दुनिया के बारे में कम सोचो, और अपनी चेतना के बारे में अधिक सोचो।                                          ओशो

ओशो : प्रार्थना

" दीवानापन न हो तो प्रार्थना कैसी ? " अकबर एक सांझ जंगल में शिकार खेलने गया था। लौट रहा था, सांझ हो गयी, नमाज पढ़ने बैठा। जब नमाज पढ़ रहा था, अपना दस्तरखान बिछा कर, एक युवती भागती हुई निकली। अल्हड़ युवती रही होगी। थी युवती कि मुझे मिल जाती तो मेरी संन्यासिनी होती। एक धक्का मार दिया अकबर को। वे बेचारे बैठे थे अपना नमाज पढ़ने, धक्का खा कर गिर पड़े। मगर नमाज में बीच में बोलना ठीक भी नहीं। बीच में बोलना तो बहुत चाहा, दिल तो हुआ कि गर्दन पकड़ कर दबा दें इस औरत की, कि गर्दन उतार दें, मगर नमाज बीच में तोड़ी नहीं जा सकती। इसलिए पी गए जहर का घूंट। और युवती जब लौट रही थी तो नमाज तो खत्म हो गयी, अकबर राह देख रहा था उसकी। जब वह लौटी तो अकबर ने कहा कि रूक बदतमीज! तुझे इतनी भी तमीज नहीं कि कोई नमाज पढ़ता हो तो उसे धक्का मारना चाहिए? फिर तुझे यह भी नहीं दिखाई पड़ता कि मैं सम्राट हूं! साधारण आदमी को भी नमाज पढ़ने में धक्का नहीं मारना चाहिए, सम्राट को धक्का मारा!  युवती ने कहा: ‘क्षमा करें, अगर आप को धक्का लगा हो! मुझे कुछ याद नहीं। बहुत दिनों बाद मेरा प्रेमी आ रहा था। मैं तो उसका स्वागत करने भागी...

ओशो : माया:एक विस्तीर्ण स्वप्न है।

माया:एक विस्तीर्ण स्वप्न है। जीवन के यथार्थ को समझने में बड़ी सरलता हो सकती थी यदि दो ही रूप होते अस्तित्व के--सत् और असत्। हम कह सकते किसी चीज को कि है, और कह सकते कि नहीं है, ऐसे दो स्पष्ट विभाजन होते जीवन के, अस्तित्व के, तो कठिनाई जरा भी नहीं थी। लेकिन एक और कोटि भी है अस्तित्व की, जिसे हम कह नहीं सकते कि है, और यह भी नहीं कह सकते कि नहीं है, उससे ही सारा उलझाव पैदा होता है। इसलिए भारत ने एक नये शब्द का आविष्कार किया, वह है : 'माया।' माया न तो सत् है, न असत्; माया दोनों के मध्य में है। वह एक अर्थ में नहीं है और एक अर्थ में है। माया उसे नाम दिया है इसीलिए, क्योंकि माया का अर्थ वस्तुत: होता है : जैसे एक जादूगर एक वृक्ष को बड़ा करता है। आंखों के सामने, हजारों आंखों  के सामने वृक्ष बड़ा होने लगता है। हजारों आंखों  के सामने क्षण भर में ही उसमें फल लगने लगते हैं, फल बड़े हो जाते हैं। जो देख रहे हैं वे सभी जानते हैं यह हो नहीं सकता; यह है नहीं। और फिर भी दिखाई तो पड़ता है! माया का मौलिक अर्थ है : भ्रांति की कला। माया का मौलिक अर्थ है : जादू मैजिक। उसका अर्थ है कि जो नहीं है ...

ओशो : मन

मन वेश्या की तरह है। किसी का नहीं है मन। आज यहां, कल वहां; आज इसका, कल उसका। मन की कोई मालकियत नहीं है। और मन की कोई ईमानदारी नहीं है। मन बहुत बेईमान है। वह वेश्या की तरह है। वह किसी एक का होकर नहीं रह सकता। और जब तक तुम एक के न हो सको, तब तक तुम एक को कैसे खोज पाओगे? न तो प्रेम में मन एक का हो सकता है; न श्रद्धा में मन एक का हो सकता है—और एक के हुए बिना तुम एक को न पा सकोगे। तो कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा—एक के होने का। इसी कारण पूरब के मुल्कों ने एक पत्नीव्रत को या एक पतिव्रत को बड़ा बहुमूल्य स्थान दिया। उसका कारण है। उसका कारण सांसारिक व्यवस्था नहीं है। उसका कारण एक गहन समझ है। वह समझ यह है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही स्त्री को प्रेम करे, और एक ही स्त्री का हो जाए, तो शिक्षण हो रहा है एक के होने का। एक स्त्री अगर एक ही पुरुष को प्रेम करे और समग्र—भाव से उसकी हो रहे कि दूसरे का विचार भी न उठे, तो प्रशिक्षण हो रहा है; तो घर मंदिर के लिए शिक्षा दे रहा है; तो गृहस्थी में संन्यास की दीक्षा चल रही है। अगर कोई व्यक्त्ति एक स्त्री का न हो सके, एक पुरुष का न हो सके, फिर एक गुरु का भी न हो सक...

ओशो : परमात्मा

एक परमात्मा को माननेवाले ने दूसरे परमात्मा की मूर्तियां तोड़ दी हैं। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। सदा से ही ऐसा होता रहा है। मनुष्य ही एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं है, उनके परमात्मा भी हैं। असल में मनुष्य जिन परमात्माओं का सृजन करता है, वे स्वयंं उससे बहुत भिन्न नहीं हो सकते हैं। एक मंदिर दूसरे मंदिर के विरोध में खड़ा है, क्योंकि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के विरोध में है। एक शास्त्र दूसरे शास्त्र का शत्रु है, क्योंकि मनुष्य, मनुष्य का शत्रु है। मनुष्य जैसा होता है, वैसा ही उसका धर्म होता है। मनुष्य मैत्री लाने के बजाए शत्रुता के गढ़ बन गए हैं और जगत को प्रेम से भरने के बजाए उन्होनें बैर-वैमनस्य के विष से भर दिया है। -ओशो (मिट्टी के दीये)

ओशो : " उत्पत्ति और विनाश से रहित नित्य चैतन्य को ज्ञान कहते हैं। ''

" उत्पत्ति और विनाश से रहित नित्य चैतन्य को ज्ञान कहते हैं। '' संबंध तो उत्पन्न होता है और विनष्ट होता है, सिर्फ स्वभाव उत्पन्न नहीं होता और विनष्ट नहीं होता। मैं आपको प्रेम करता हूं कल नहीं करता था, आज करता हूं। जन्मा प्रेम। और बड़ा पागलपन तब पैदा होता है जब हम किसी जन्मी हुई चीज को शाश्वत बनाना चाहते हैं। तब पागलपन हो जाता है। जन्मी चीज तो मरेगी ही.. जिस दिन जन्मी उसी दिन जान लेना था कि मरेगी। जिस दिन हम जन्म के बैंड-बाजे बजाते हैं, उसी दिन अरथी उठने की तैयारी हो जाती है। समय का फासला थोड़ा लगेगा। फूल खिल रहा है.. तभी उसके गिरने की शुरुआत हो गई; झड्ने की शुरुआत हो गई। जन्म के साथ तो मृत्यु बंधी है; जन्म है एक छोर, मृत्यु है दूसरा छोर। तो जो प्रेम जन्मता है वह मरेगा भी; और जिसकी उत्पत्ति होगी उसका विनाश भी हो जाएगा। जो ज्ञान पैदा होता है... और जान पैदा होता है। आख खोली, सामने फूल खिला हुआ दिखाई पड़ा--ज्ञान हुआ कि फूल है, सुंदर है, सुगंधित है--यह जन्म हुआ। यह ज्ञान भी मरेगा। यह फूल भी मरेगा, यह ज्ञान भी मरेगा। ब्रह्म तो ऐसा ज्ञान होगा, जो न जन्मता है और न मरता है। इस...

ओशो : प्रकृति से शुरू करो ।

 प्रकृति से शुरू करो ।     प्रश्न  :- आपकी बातें सुनता हूं , तो प्रभु खोज के विचार उठते हैं । लेकिन समझ नहीं पड़ता कि कहां से शुरु करुं ? ओशो : अगर तुम मेरी सलाह मानना चाहते हो तो मैं कहूंगाः प्रकृति से शुरु करो । क्योंकि प्रकृति मे ही परमात्मा छिपा है । वृक्षों-फूलों को देखो ; चांद-तारों को देखो ; नदी सागरों को देखो । परमात्मा इन सब में छिपा है । यहीं तलाशो । तो पहला परमात्मा का कदम प्रकृति से उठाओ । प्रकृति में दिख जाये , तो फिर सब जगह दिखाई पड़ने लगेगा । अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि टेनीसन ने कहा है .... एक फूल को देखा खिला हुआ । एक पत्थरों की दीवाल में ,जरा-सी पत्थरों के बीच में संध थी , उसमें से फूल निकल आया था । चौंककर खड़े हो गये टेनीसन और उन्होंने अपनी डायरी में लिखाः अगर मैं इस एक फूल को समझ लूं पूरा-पूरा तो मुझे सारा अस्तित्व समझ में आ जायेगा । और परमात्मा की सारी लीला भी । एक फूल में सब छिपा है । एक फूल में । हम इस प्रकृति के हिस्से हैं । हम भी एक पौधें है । हमारी भी यहां जड़ें हैं । यह जमीन जितनी वृक्षों की है , उतनीहमारी है । ये वृक्ष जैसे ...

Osho about Creation

OSHO ABOUT CREATION Question 2: BELOVED MASTER, THERE IS A QUESTION I HAVE NEVER BEEN ABLE TO GET AN ANSWER TO. IT IS A STUPID QUESTION AND YET I FEEL THAT I WANT SO MUCH TO KNOW THE ANSWER. CAN YOU TELL US WHAT IS THE PURPOSE OF CREATION, WHY LIFE EXISTS, WHY EVERYTHING EXISTS? I DON'T BELIEVE IN ACCIDENTS. Prem Patrick, the question is certainly stupid, you are absolutely right about it. And the question is not answerable. Anybody who answers it will only create a few more questions in you. You have not been able to get any answer because there is none. Life is a mystery - hence this question cannot be answered. You cannot ask "Why?" If the "Why?" is answered, life is no longer a mystery. That's the whole effort of science: to destroy the mystery of life. And the way is to find the answer to every why. And science believes - of course, arrogantly and ignorantly - that one day it will be able to answer all whys. It is not possible. Even if we a...

ओशो : हर चक्र की अपनी नींद |

हर चक्र की अपनी नींद | सहस्‍त्रार को छोड़ कर प्रत्‍येक चक्र की अपनी नींद है। सातवें चक्र में बोध समग्र होता है। यह विशुद्ध जागरण की अवस्‍था है। इसीलिए कृष्‍ण गीता में कहते है कि योगी सोता नहीं। ‘योगी’ का अर्थ है जो अपने अंतिम केंद्र पर पहुंच गया। अपनी परम खिलावट पर जो कमल की भांति खिल गया। वह कभी नहीं सोता। उसका शरीर सोता है। मन सोता है।वह कभी नहीं सोता। बुद्ध जब सो भी रहे होते है तो अंतस में कहीं गहरे में प्रकाश आलोकित रहता है। सातवें चक्र में निद्रा का कोई स्‍थान नहीं होता। बाकी छ: चक्रों में यिन और यैंग, शिव और शक्‍ति, दोनों है। कभी वे जाग्रत होते है और कभी सुषुप्‍ति में—उनके दोनों पहलू है। जब तुम्‍हें भूख लगती है तो भूख का चक्र जाग्रत हो जाता है। यदि आपने कभी उपवास किया तो आप चकित हुए होंगे। शुरू में पहले दो या तीन दिन भूख लगती है। और फिर अचानक भूख खो जाती है। यह फिर लगेगी और फिर समाप्‍त हो जाएगी। फिर लगेगी……ओर तुम कुछ भी नहीं खा रहे हो। इसलिए तुम यह भी नहीं कह सकते हो कि ‘भूख मिट गई। क्‍योंकि मैंने कुछ खा लिया है। तुम उपवास किए हो, कभी-कभी तो भूख जोरों से लगती है। तुम ...

ओशो : ध्यान शून्य लाता है।

ध्यान शून्य लाता है। अगर तुमने जल्दबाजी की तो शून्य को भरने की तृष्णा पैदा होगी। अगर जल्दबाजी न की और तुम शून्य के साथ रहने को राजी हो गए, तुमने उसे स्वीकार कर लिया, तो तुम पाओगे धीरे-धीरे शून्य अपने आप भर दिया गया। क्योंकि प्रकृति शून्य को बरदाश्त नहीं करती; शून्य तुम करो, भर देती है प्रकृति। न परमात्मा शून्य को बरदाश्त करता है। तुम शून्य पैदा करो, परमात्मा भर देता है।* शून्य भर चाहिए, पूर्ण तो उतर आता है। जैसे कहीं गङ्ढा हो, वर्षा हो, तो सारा पानी चारों तरफ से दौड़ कर गङ्ढे में भर जाता है। ऐसे ही तुम जब शून्य होते हो, परमात्मा चारों तरफ से तुम्हारी तरफ दौड़ने लगता है। तुमने गङ्ढा बना दिया, अब भरना उसे है। आधा तुम करते हो, आधा परमात्मा करता है। और तुम्हारा करना कुछ खास नहीं, असली करना तो उसी का है। तुम्हारा करना इतना ही है कि तुम खाली होने को राजी हो जाओ। इसलिए सारे बुद्धपुरुष–भरने की तृष्णा से बचो, बटोरने की तृष्णा से बचो–इसका इतना आग्रह करते हैं। क्योंकि अगर तुमने स्वयं ही भर लिया, तो तुम परमात्मा को भरने का मौका ही नहीं देते हो।* ओशो भज गोविंदम मूढ़ मते

ओशो : जगत अनित्य है ।

जगत अनित्य है । अनित्य का अर्थ होता है, जो है भी और प्रतिक्षण नहीं भी होता रहता है। अनित्य का अर्थ नहीं होता कि जो नहीं है। जगत है, भलीभांति है। उसके होने में कोई संदेह नहीं है। क्योंकि यदि वह न हो, तो उसके मोह में, उसके भ्रम में भी पड़ जाने की कोई संभावना नहीं। और अगर वह न हो, तो उससे मुक्त होने का कोई उपाय नहीं। जगत है। उसका होना वास्तविक है। लेकिन जगत नित्य नहीं है, अनित्य है। अनित्य का अर्थ है, प्रतिपल बदल जाने वाला है। अभी जो था, क्षणभर बाद वही नहीं होगा। क्षणभर भी कुछ ठहरा हुआ नहीं है। नित्य कहते हैं उसे, जो है, सदा है। जिसमें कोई परिवर्तन कभी नहीं, जिसमें कोई रूपांतरण नहीं होता। जो वैसा ही है, जैसा सदा था और वैसा ही रहेगा। निश्चित ही, जगत ऐसा नहीं है। जगत है अनित्य। लगता है कि है, और बदला जा रहा है, भागा जा रहा है। जगत एक दौड़ है—एक गत्यात्मकता, एक क्षणभंगुरता। लेकिन भ्रांति बहुत पैदा होती है। भ्रांति बहुत पैदा होती है, सभी चीजें लगती हैं, है। शरीर लगता है, है। वह भी एक धारा है, प्रवाह है। अगर वैज्ञानिक से पूछें, तो वह कहता है, सात साल में आपके शरीर में एक टुकड़ा भी नहीं ब...

ओशो : ध्यान

ध्यान के दौरान खुजली व दर्द जैसी बाधा डालने वाली भावनाओं से कैसे निबटा जाए ? ध्यान में, ज्यादातर शारीरिक दर्द बाधा डालते हैं। क्या आप बताएंगे कि जब दर्द हो रहा है तब उस पर ध्यान कैसे किया जाए ? ओशो - यह वही है जिसकी मैं बात कर रहा था। *यदि तुम दर्द महसूस करते हो तो इसके बारे में सतर्क रहो, कुछ करो नहीं*। ध्यान बहुत बड़ी तलवार है। तुम सिर्फ दर्द पर ध्यान दो।* उदाहरण के लिए, तुम ध्यान के आखिरी चरण में शांति से बैठे हो, बिना हिले-डुले, और तुम बहुत सी परेशानियां शरीर में महसूस करोगे।* तुम महसूस करोगे कि पैर मरते जा रहे हैं, सिर में भी खुजली हो रही है, तुम महसूस करोगे कि शरीर पर चींटियां रेंग रही हैं और तुमने बहुत बार देखा – वहां चींटियां नहीं हैं। रेंगना अन्दर महसूस हो रहा है, बाहर नहीं*। तुम क्या करोगे? तुम महसूस करते हो पैर मरने जा रहे हैं – इस पर ध्यान करो, इसको सिर्फ सम्पूर्ण ध्यान दो। खुजली महसूस करो – खुजलाना मत, क्योंकि वह मदद नहीं करेगा। सिर्फ ध्यान दो। अपनी आंखें भी मत खोलो। सिर्फ अंदर से ध्यान दो और सिर्फ इंतजार करो और देखो, और कुछ क्षणों में खुजली गायब हो जाएगी*। चाहे ...

ओशो : अहोभाव

अहोभाव अहोभाव की इस दशा को थिर रखना , इससे बड़ी कोइ प्रार्थना नही है ! अहोभाव से बड़ा कोई सेतु नही है परमात्मा से जोड़ने वाला ! जो कृतज्ञ है वह धन्यभागी है ! और जितने तुम कृतज्ञ होते चले जाओगे उतनी ही वर्षा सघन होगी अमृत की ! इस गणित को ठीक से हृदय मे सम्हाल कर रख लेना जितना धन्यवाद दें सकोगे उतना पाओगे ! शिकायत भूलकर ना करना ! और ऐसा नही है की शिकायत करने के अवसर न आयेंगे ! मन की अपेक्षाये बड़ी है , तो हर पल हर क़दम पर शिकायतें उठती आती है ; ऐसा होना था , नही हुआ ! जब भी ऐसा लगे ऐसा होना था नही हुआ , तभी स्मरण करना की भूल होती है क्योंकि शिकायत अवरोध बन जाती है ! शिकायत का अर्थ हुआ तुम परमात्मा पर अपनी आकांक्षा आरोपित करना चाहते हो ! और ऐसा मत सोचना शिकायत तुमसे न होगी , जीसस जैसे परम पुरुष से भी शिकायत हो गयी थी ! आखिरी घड़ी मे सूली मे लटके हुए एक क्षण को निकल गयी थी पुकार , आकाश की तरफ़ सिर उठाकर जीसस ने कहा था : हे प्रभू , यह तू क्या दिखला रहा है ? सोचा नही होगा की सूली लगेगी ! सोचा नही होगा की परमात्मा इस तरह से असहाय छोड़ देगा ! पर त...

ओशो : जीवन एक रहस्य है

जीवन एक रहस्य है । तुम जितना अधिक उसे समझते हो, वह उतना ही अधिक रहस्यमय बन जाता है। तुम उसे जितना अधिक जानते हो, तुम्हें उतना ही कम- यह अनुभव होता है कि तुम उसे जानते हो। तुम उसकी गहराई और अनंत गहराई के प्रति जितने अधिक होशपूर्ण होते हो, उतना ही अधिक उसके बारे में कुछ भी कहना लगभग असम्भव हो जाता है। इसलिए अनुभव करने वाला मौन हो जाता है। एक व्यक्ति, जो उसे जान लेता है, वह आदरयुक्त भय से विस्मय विमूढ हो जाता है। ऐसे अनंत अद्‌भुत आश्चर्य का अनुभव कर, उसकी सांस तक रुक जाती है। जीवन के रहस्य का साक्षात्कार कर वह पूरी तरह से मिट ही जाता है। लेकिन इस बारे में समस्याएं भी हैं, और जीवन के रहस्य के साथ पहली समस्या तो हमेशा- ऐसे ढोंगियों की सम्भावना को लेकर है, जो दूसरों को धोखा दे सकते हैं, लोगों को ठग सकते हैं। विज्ञान के संसार में तो ऐसा करना असम्भव है विज्ञान एक समतल भूमि पर अनंत सावधानी से फूंक-फूंक कर कदम रखता है- वह तर्क पूर्ण और विचारशील है। यदि तुम कुछ भी व्यर्थ की बात कहते हो, तो तुम तुरंत पकड़ लिए जाओगे, क्योंकि तुम जो कुछ भी कहते हो, उसकी प्रामाणिकता का सत्यापन किय...

OSHO : Chakra Breathing Meditation

OSHO chakra breathing meditation  chakra breathing meditation can help you to become aware of and  experience each of the seven chakras. this meditation is active and uses deep rapid breathing and body movement, accompanied by musical sounds to open and bring awareness and vitality to the chakras. first stage: 45 minutes stand with your feet shoulder width apart. let your body be loose and relaxed. close your eyes and with mouth open breathe deeply and rapidly into the first chakra. imagine the inhalation travelling to the pelvic  region of the body, where the first chakra is located. exhale rapidly. breathe into the first chakra until you hear a bell, which indicates to start breathing into the second chakra. each time you hear a bell, move this deep rapid breathing up to the  next chakra. as you breathe up from chakra to chakra, your breathing should become  more rapid and more gentle, so that you are taking about twice as many breaths  in th...

Osho : We are the World

We Are the World The more I move into meditation, the more I feel responsible for myself and for the situation in the whole world. How is that possible? OSHO: The more you become yourself, the more you will feel responsible for the world because the more you are becoming part of the world – you are not separate from it. Your being authentically yourself means a tremendous responsibility, but it is not a burden. *It is a rejoicing that you can do something for existence.* Existence has done so much for you, there is no way to pay it back. But we can do something.  It will be very small compared to what existence has done for us, *but it will show our gratitude.* It is not a question of whether it is big or small; the question is that it is our prayer, our gratitude, and our totality is involved in it. Yes, it will happen: the more you become yourself, the more you will start feeling responsibilities which you had never felt before. I am reminded.... In the life of M...

ओशो : मंत्र तो मन का ही खेल है।

मंत्र तो मन का ही खेल है।  मंत्र शब्द का भी यहीं अर्थ है, मन का जाल, मन का फैलाव। मंत्र से मुक्त होना है, क्योंकि मन से मुक्त होना है। मन न रहेगा तो मंत्र को सम्हालोगे कहां? और अगर मंत्र को सम्हालना है तो मन को बचाये रखना होगा। निश्चय ही मैंने तुम्हें कोई मंत्र नहीं दिया। नहीं चाहता कि तुम्हारा मन बचे। तुमसे मंत्र छीन रहा हूं। तुम्हारे पास वैसे ही मंत्र बहुत हैं। तुम्हारे पास मंत्रों का तो बड़ा संग्रह है। वही तो तुम्हारा सारा अतीत है। बहुत तुमने सीखा। बहुत तुमने ज्ञान अर्जित किया। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई जैन है, कोई ईसाई है। किसी का मंत्र कुरान में है, किसी का मंत्र वेद में है। कोई ऐसा मानता, कोई वैसा मानता। मेरी सारी चेष्टा इतनी ही है कि तुम्हारी सारी मान्यताओं से तुम्हारी मुक्ति हो जाए। तुम न हिंदू रहो, न मुसलमान, न ईसाई। न वेद पर तुम्हारी पकड़ रहे, न कुरान पर। तुम्हारे हाथ खाली हो जायें। तुम्हारे खाली हाथ में ही परमात्मा बरसेगा। रिक्त, शून्य चित्त में ही आगमन होता परम का; द्वार खुलते हैं। तुम मंदिर हो। तुम खाली भर हो जाओ तो प्रभु आ जाए। उसे जगह दो। थोड़ा स्थान बना...

ओशो : डायनेमिक मेडिटेशन

ओशो : डायनेमिक मेडिटेशन यह ध्यान शरीर और मन के भीतर पुराने गहरे हुए ढाँचे को तोड़ने के लिए है जो व्यक्ति को अतीत के कारागृह में बंद रखते हैं; और साथ ही उन कारागृहों की दीवालों के पीछे छिपी हुई स्वतंत्रता, साक्षीभाव, मौन और शांति को अनुभव करने का यह तीव्र, सघन और गहन मार्ग है। इस ध्यान को सुबह-सुबह करना है, जब "पूरी प्रकृति जीवंत हो उठी है, रात जा चुकी है, सूरज उग आया है, और सब-कुछ चेतन और सजग हो गया है।" इस ध्यान को आप अकेले कर सकते हैं लेकिन शुरुआत में इसे समूह में करना मददगार हो सकता है। यह एक व्यक्तिगत अनुभव है, इसलिए अपने आस-पास के अन्य लोगों के प्रति बेखबर बने रहें। ढीले और आरामदेह वस्त्र पहनें। यह एक घंटे का ध्यान है और इसमें पांच चरण हैं। पूरे समय अपनी आंखें बंद रखें। यदि आवश्यक हो तो आंखों पर पट्टी का उपयोग कर सकते हैं। यह एक ऐसा ध्यान है जिसमें आपको सतत जागरूक, सचेत और होशपूर्ण रहना है, चाहे आप जो भी करें। साक्षी बने रहें। और जब--चौथे चरण में आप पूर्णतः निष्क्रिय हो जाएं, जैसे जम गए हों, तब यह जागरूकता अपने चरम शिखर पर पहुंचेगी। प्रथम चरण : 10 मिनट ...

ओशो : साक्षी

साक्षी साक्षी का प्रयोग शुरु करना होता है शरीर को चलते हुए, बैठे हुए, बिस्तर पर जाते हुए, या खाते हुए देखने से! स्थूलतम चीजों से व्यक्ति को शुरु करना चाहिए, क्योंकि यह सरल है। और फिर उसे सूक्ष्म अनुभवों की ओर जाना चाहिए -- विचारों को देखना शुरु करना चाहिए। और जब व्यक्ति विचारों को देखने में कुशल हो जाता है, तो उसे अनुभूतियों को देखना शुरु करना चाहिए। जब तुम्हें लगे कि तुम अपनी अनुभूतियों को भी देख सकते हो, तो फिर अपनी भाव-दशाओं को देखना शुरु करो, जो कि अनुभूतियों से अधिक सूक्ष्म भी हैं, और स्पष्ट भी। द्रष्टा होने का चमत्कार यह है कि जब तुम शरीर को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा अधिक मजबूत होता है। जब तुम अपने विचारों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा और भी मजबूत होता है। और जब अनुभूतियों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा फिर और मजबूत होता है। जब तुम अपनी भाव-दशाओं को देखते हो, तो द्रष्टा इतना मजबूत हो जाता है कि स्वयं बना रह सकता है -- स्वयं को देखता हुआ, जैसे कि अंधेरी रात में जलता हुआ एक दीया न केवल अपने आस-पास प्रकाश करता है, बल्कि स्वयं को भी प्रकाशित करता है! लेकिन लोग बस ...

Osho about Life

Try to understand what I am saying. Try to be! Don’t record it, there is no need. Just forget what I said. If you have really understood, it will follow you like a fragrance. No need to carry it in the memory, it will be part of your being… Life is enough if you understand. And if you feel, you will start changing through your feeling. A mutation happens if you become more and more sensitive towards life. The very sensitivity gives you awareness, alertness. Otherwise, even a Buddha cannot help… Osho No Water, No Moon Talks on Zen Stories Ch# 9 A philosopher asks Buddha

ओशो : धर्म को समझना लगभग असम्भव है

धर्म को समझना लगभग असम्भव है तर्क कहता है: जीवन जीवन है और वह कभी भी मृत्यु नहीं बन सकता। जीवन, मृत्यु कैसे हो सकता है? लेकिन वास्तविक यथार्थ अथवा सत्य यही है- कि जीवन प्रत्येक क्षण मृत्यु की ओर बढ़ रहा है, और जीवन मृत्यु भी है। तर्क कहता है : प्रेम, प्रेम है, और वह कभी भी घृणा नहीं बन सकता लेकिन प्रेम प्रत्येक क्षण गतिशील होकर घृणा बन रहा है और घृणा प्रत्येक क्षण गति करती हुई प्रेम बन रही है। तुम उसी व्यक्ति से प्रेम करते हो, और तुम उसी व्यक्ति से घृणा करते हो। जितना गहरा प्रेम होता है, उतनी ही गहरी घृणा होती है। घृणा और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्या तुम किसी व्यक्ति को प्रेम किए बिना, घृणा कर सकते हो? तुम एक व्यकि्त से बिना प्रेम किए कैसे घृणा कर सकते हो? पहले तुम्हें प्रेम करना होगा, केवल तभी तुम घृणा कर सकते हो। घृणा के पहले कदम के लिए प्रेम जरूरी है। तुम किसी व्यक्ति के साथ यदि कभी मित्र बनकर नहीं रहे हो, तो कैसे उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हो सकते हो? केवल तर्क में ही मित्र और शत्रु अलग होते हैं, वास्तविक सत्य यही है कि वे एक साथ ही होते हैं। यदि तुम गह...

ओशो : चुनाव तुम्हारा है

|| चुनाव तुम्हारा है || परमात्मा तुम्हें दुख नहीं देता, न परमात्मा तुम्हें सुख देता है। सुख और दुख दो विकल्प हैं। चुनने को तुम सदा स्वतंत्र हो। चुनाव तुम्हारे हाथ में है। परमात्मा तुम्हें नर्क में धक्के नहीं देता और न स्वर्ग में तुम्हारा स्वागत करता है। स्वर्ग और नर्क दोनों के द्वार खुले हैं। चुनाव तुम्हारा है। तुम जहां जाना चाहो। और यह उचित है कि द्वार खुले हैं क्योंकि स्वतंत्रता के बिना सत्य की कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। तुम स्वतंत्र हो दुख भोगने को। तुम्हारी स्वतंत्रता परम है। तुम स्वतंत्र हो सुख भोगने को और तुम स्वतंत्र हो मार्ग बदल लेने को। तुम्हारी स्वतंत्रता में कोई भी बाधा नहीं है। इस बात को ठीक से समझ लेना। इसलिए अगर तुम दुख भोगते हो तो यह तुम्हारा चुनाव है। अगर तुम सुख भोगते हो तो यह भी तुम्हारा चुनाव है। अगर तुम जहां हो वहां से नहीं हटते हो, तो भी तुम्हारा चुनाव है। वहां से हटते हो तो भी तुम्हारा चुनाव है। तुम्हारी चेतना पर कोई नियंत्रण नहीं है। जैसे घर में एक चूल्हा जला दिया है, आग जल रही है और दूसरी तरफ वृक्षों में फूल खिले हैं। तुम स्वतंत्र हो; चाहे फूल तोड़कर ...

ओशो : आत्म परिवर्तन के लिए चाहिए मौन और प्रेम !

आत्म परिवर्तन के लिए चाहिए मौन और प्रेम ! जो चुप नहीं हो सकता वह जीवन को कभी भी नहीं बदल सकता है। गहरी चुप्पी में ही, गहरे मौन में ही, गहरे साइलेंस में ही मनुष्य के भीतर क्रांति की, आत्म-परिवर्तन की क्षमता के दर्शन होते हैं। इतनी विराट शक्ति का अनुभव होता है कि कुछ भी बदला जा सकता है। इतनी बड़ी आग उपलब्ध हो जाती है कि कचरे को जलाया जा सकता है। उसके पहले तो जिंदगी में कोई क्रांति, कोई ट्रांसफार्मेशन नहीं हो सकता है। इसलिए पहला ध्यान इस तरफ दें। चैबीस घंटे दौड़ते हैं, आधा घंटा न दौड़ें। चैबीस घंटे मन को काम में रखते हैं, आधा घंटा बेकाम छोड़ दें। चैबीस घंटे उलझे हुए हैं, आधा घंटे केवल साक्षी रह जाएं। यह तो पहला सूत्र है। और आज तक जगत में जिन लोगों ने भी कुछ जाना है, इस सूत्र के बिना नहीं जाना है। जो भी सत्य, जो भी सौंदर्य, जो भी श्रेष्ठ अनुभूतियां उपलब्ध हुई हैं, वे मौन में, एकांत में, शांति में, ध्यान में उपलब्ध हुई हैं। तो जिसकी भी आकांक्षा है, जिसके प्राणों में भी प्यास है उसे मौन की दिशा में कदम रखने होंगे। यह पहला सूत्र है। दूसरा सूत्र भी इतना ही महत्वपूर्ण, इतना ही गहरा और इतना ह...

ओशो द्वारा बताई गई बहुत ही कारगर ध्यानविधी

।। ओशो द्वारा बताई गई बहुत ही कारगर ध्यानविधी ।। कभी एकांत में बैठकर एक खाली कागज लेकर सिर्फ लिखते चले जाओ जो भी तुम्हारे मन में उठ रहा हो--जो भी। किसी को बताना तो है नहीं, दरवाजा बंद कर देना, ताला लगा देना, कि कोई झांक न ले; किसी को बताना नहीं है, इसलिए ईमानदारी बरतना; ईमान से लिख डालना, और फिर आग लगाकर जला देना ताकि किसी को पता भी न चले, मगर तुम्हें तो कम से कम साफ हो जाएगा; दस मिनट लिखने बैठोगे और तुम चकित हो जाओगे कि कौन सा कचरा तुम्हारी खोपड़ी में भरा हुआ है। क्या-क्या चल रहा है! और कहां-कहां से चला आ रहा है! संगत-असंगत, प्रासंगिक-अप्रासंगिक; एक कड़ी भजन की आती है, दूसरी कड़ी किसी फिल्मी गीत की आ जाती है; पड़ोस में कुत्ता भौंकता है, उसके भौंकने को सुन कर तुम्हें अपनी प्रेयसी की याद आ जाती है जिसके पास एक कुत्ता था। अब चले! और प्रेयसी की याद आती है तो पत्नी की याद आ जाती है, कि इसी दुष्ट ने तो सब गड़बड़ करवा दिया! अब लगे कोसने अपने को कि किस दुर्दिन में... जरा बैठो दस मिनट और तुम्हारे मन में क्या-क्या आएगा, उसे लिखते जाना। और जैसा आए वैसा ही लिखना, सुधारना मत! बनावट न लाना, पाखंड मत...

ओशो : त्रिनेत्र, नाभि—केंद्र और मध्‍य–मार्ग

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--11 त्रिनेत्र, नाभि—केंद्र और मध्‍य–मार्ग—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)       सूत्र: 15—सिर के सात द्वारों को अपने हाथों से बंद करने पर आंखों के बीच का स्‍थान सर्वग्राही हो जाता है। 16—हे भगवती, जब इंद्रियां ह्रदय में विलीन हों, कमल के केंद्र पर पहुंचो। 17—मन को भूलकर मध्‍य में रहो—जब तक। ऐसा है मानो बिना केंद्र का वर्तुल। उसका जीवन सतही है, उसका जीवन बस परिधि पर है। तुम बाहर—बाहर रहते हो, कभी भीतर नहीं रहते। तुम भीतर नहीं रह सकते, जब तक कि केंद्र उपलब्ध न हो। तुम भीतर नहीं रह सकते हो। सच तो यह है कि केंद्र के बिना अंतस भी नहीं होता है। यही कारण है कि हम अंतस की बात किए जाते हैं कि कैसे भीतर जाएं, कि कैसे अपने को जानें, लेकिन ये बातें कुछ प्रामाणिक अर्थ नहीं रखतीं। शब्दों का अर्थ तो तुम जानते हो, लेकिन भीतर गए बिना उनके अर्थ को अनुभव नहीं कर सकते। और तुम कभी वहां गए नहीं हो। जब तुम अकेले भी होते हो तब भी मन से तुम भीड़ में होते हो। जब बाहर कोई नहीं है तब भी तुम भीतर नहीं होते, तुम दूसरों की ही सोचे जाते हो, तुम बाहर ही गति करते हो। यह...