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ओशो : हंसने को ध्यान बनाओ

हंसने को ध्यान बनाओ हंसना कुछ उर्जा तुम्हारे अंतकेन्द्र से परिधि पर ले आती है। उर्जा हंसने के पीछे छाया की भांति बहने लगती है। तुमने कभी इस पर ध्यान दिया? जब तुम वास्तव में हंसते हो, तो उन थोड़े से क्षणों के लिए तुम एक गहन ध्यानपूर्ण अवस्था में होते हो। विचार प्रक्रिया रूक जाती है। हंसने के साथ-साथ विचार करना असंभव है। वे दोनों बातें बिलकुल विपरीत हैं : या तो तुम हंस सकते हो, या विचार ही कर सकते हो। यदि तुम वास्तव में हंसो तो विचार रूक जाता है। यदि तुम अभी भी विचार कर रहे हो तो तुम्हारा हंसना थोथा और कमजोर होगा। वह हंसी अपंग होगी। जब तुम वास्तव में हंसते हो, तो अचानक मन विलीन हो जाता है। जहां तक मैं जानता हूं, नाचना और हंसना सर्वोत्तम, स्वाभाविक व सुगम द्वार हैं। यदि सच में ही तुम नाचो, तो सोच - विचार रूक जाता है। तुम नाचते जाते हो, घूमते जाते हो और एक भंवर बन जाते हो —सब सीमाएं, सब विभाजन समाप्त हो जाते हैं। तुम्हें इतना भी पता नहीं रहता कि कहां तुम्हारा शरीर समाप्त होता है और अस्तित्व शुरू हो जाता है। तुम अस्तित्व में पिघल जाते हो और अस्तित्व तुममे पिघल आता है, सीमाएं एक - दूसरे में ...

ओशो : एक मित्र ने पूछा है कितने समय में हम ध्यान को उपलब्ध हो सकेंगे?

एक मित्र ने पूछा है कितने समय में हम ध्यान को उपलब्ध हो सकेंगे? कोई सामान्य उत्तर नहीं हो सकता है। क्योंकि ध्यान को कितने समय में उपलब्ध हो सकेंगे, यह मुझ पर नहीं, आप पर निर्भर है। और इसके लिए कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि सभी लोग एक ही समय में उपलब्ध हो सकें। आपकी तीव्रता, आपकी प्यास, आपकी लगन, आपकी अभीप्सा, इस सब पर निर्भर करेगा। एक क्षण में भी उपलब्ध हो सकते हैं, और पूरे जीवन में भी न हों। एक क्षण में भी, तीव्र प्यास का एक क्षण भी, इंटेंसिटी का एक क्षण भी जीवन को बदल सकता है। और नहीं तो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे--कोई तीव्रता नहीं है, कोई सीरियसनेस, कोई गंभीरता नहीं है कि उसे हम प्यास की तरह पकड़ें। एक आदमी प्यासा है तो उसकी पानी की खोज और बात है। और एक आदमी प्यासा नहीं है, उसकी पानी की खोज बिलकुल दूसरी बात है। प्यास तो खोज लेगी पानी को। और जितनी तीव्र होगी, उतनी तीव्रता से खोज लेगी। एक पहाड़ी रास्ते पर एक यात्री जाता था। एक बूढ़े आदमी को बैठा हुआ देखा उसने और कहा, गांव कितनी दूर है और मैं कितने समय में पहुंच जाऊंगा? वह बूढ़ा ऐसे बैठा रहा, जैसे उसने न सुना हो या बहरा हो। वह यात्री हैरान हुआ। उस बूढ़...

ओशो : तथाता

तथाता  तुम क्या कह रहे हो? तुम अपनी चिंता के द्वारा क्या कह रहे हो? तुम कह रहे हो कि यह जो हो रहा है, तुम स्वीकार नहीं कर सकते, यह ऐसा नहीं होना चाहिए। तुम ठीक इससे अन्यथा की आशा कर रहे थे ठीक इसके विपरीत? तुम चाहते थे कि यह पत्नी सदा- सदा के लिए तुम्हारी रहे और वह छोड़ कर जा रही है। लेकिन तुम क्या कर सकते हो? जब प्रेम नहीं रहता तुम क्या कर सकते हो? कोई उपाय नहीं है तुम प्रेम के लिए जोर जबरदस्ती नहीं कर सकते हो। तुम इस पत्नी को अपने साथ रहने के लिए विवश नहीं कर सकते हो। हां, तुम जोर जबरदस्ती कर सकते हो- यही सब लोग कर रहे हैं- तुम जबरदस्ती कर सकते हो। वहां मृत शरीर होगा लेकिन जीवित आत्मा जा चुकी होगी। फिर वह तुम्हारे लिए तनाव बन जाएगी। प्रकृति के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता है। प्रेम एक फूल की खिलावट थी, अब फूल मुर्झा गया है। एक हवा का झोंका तुम्हारे घर आया था, अब वह दूसरे घर में चला गया है। वस्तुओं की प्रकृति ऐसी ही है, वे आगे बढ़ती रहती हैं और परिवर्तित होती रहती हैं। वस्तुओं का जगत परिवर्तनशील है वहां कुछ भी स्थायी नहीं है। आशा मत करो! अगर तुम इस संसार में जहां सब अस्थायी है स्था...

ओशो : जलालुद्दीन रूमी की बड़ी प्रसिद्ध कविता है, मुझे बड़ी प्यारी है...

जलालुद्दीन रूमी की बड़ी प्रसिद्ध कविता है, मुझे बड़ी प्यारी है। एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के द्वार पर दस्तक देता है। भीतर से आवाज आती है, "कौन है?'' "प्रेमी कहता है, "मैं हूं तेरा प्रेमी। पहचाना नहीं? मेरी पगध्वनि विस्मृत हो गयी! मेरी आवाज पहचान से उतर गयी।'' लेकिन भीतर से आवाज आयी, "अभी तुम इस योग्य नहीं कि द्वार खुलें। अभी तुम अधिकारी नहीं।'' प्रेमी बड़ा हैरान हुआ। क्योंकि प्रेमी तो सदा सोचता है कि अधिकारी है ही। हर व्यक्ति की यही भूल है कि हर व्यक्ति जन्म से ही समझता है कि वह प्रेम का अधिकारी है। इसलिए प्रेम को कोई सीखता ही नहीं, बिना सीखे ही प्रेम करने लगते हैं। और इसलिए फिर प्रेम में इतनी भूलें होती हैं और प्रेम में इतना उपद्रव होता है, सारा जीवन बर्बाद हो जाता है। प्रेम संभावना है, सत्य नहीं। प्रेम को प्रगटना है; वह प्रगट नहीं है। प्रेम कोई मिली हुई संपदा नहीं है; खोजनी है; सृजन करना है उसका। प्रेमी लौट गया; वर्षों भटकता रहा; प्रेम की खोज करता रहा; प्रेम का अर्थ समझने की चेष्टा करता रहा; ध्यान किया, प्रार्थना की--धीरे-धीरे प्रेम का आविर्भाव ह...

ओशो : राम कृष्‍ण अपनी पत्‍नी को मां बोलते थे...

राम कृष्‍ण अपनी पत्‍नी को मां बोलते थे... और यूं नहीं कि बाद में कहने लगे थे... रामकृष्‍ण जब चौदह साल के थे, तब उनको पहली समाधि हुई। आ रहे थे अपने खेत से वापस। झाल के पास से गांव में से गुजरते थे। सुंदर गांव की झील, सांझ का समय, सूरज का डूबना, बस डूबा-डूबा। सूरज की डूबती हुई किरणों ने, आकाश में फैली छोटी-छोटी बदलियों पर बड़े रंग फैला रखे है। वर्षा के दिन करीब आ रहे है। काली बदलियां भी छा गई है। घनघोर, जल्‍दी रामकृष्‍ण लोट रहे है। तभी बगुलों की एक पंक्‍ति झील से उड़ी और काली बदलियों को पार करती हुई निकल गई। काली बदलियों से सफेद बगुलों की पंक्‍ति का निकल जाना, जैसे बिजली कौंध गई। यह सौंदर्य का ऐसा क्षण था कि रामकृष्‍ण वहीं गर पड़े। घर उन्‍हें लोग बेहोशी में लाए। लोग समझे बेहोशी है, वह थी मस्‍ती। बामुशिकल से वे होश में लाए जा सके       उनसे पूछा, क्‍या हुआ?       उन्‍होंने कहा, अद्भुत हुआ, बड़ा आनंद हुआ। बार-बार ऐसा ही होना चाहिए। अब मुझे होश में रहने कीजिसको तुम होश कहते हो—उसमें रहने की कोई इच्‍छा नहीं है...   गांव के लोगों ने, घर के लोगों ने सोचा कि लड...

ओशो : इस रूसी कथा का नाम है—जीवन।

एक प्राचीन रूसी कथा है।  एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे।  नीचे वाला खुली हवा में सांस लेने के लिए  अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है।  सब भूख—प्यास से व्याकुल हैं।  इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है,  एक—एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर वापस काटकर फेंकता जाता है।  कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है।  भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने— अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते हैं।  इनकी जिंदा चोंचों की छीना—झपटी में  मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता—लुढ़कता है।  कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है।  टोकरे के भीतर हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती जाती है।  इस खुशी में बाकी बचे मुर्गों के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है।  अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गों से भर जाता है।  चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है। इस रूसी कथा का नाम है—जीवन। ऐसा जीवन है।  सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में हैं।  प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती...

ओशो : जीवन को कुछ सुंदर करो। उठाओ तूलिका, जीवन को थोड़े रंग दो! उठाओ वीणा, जीवन को थोड़े स्वर दो!

मेरे देखे, अगर तुम परमात्मा के निकट आना चाहते हो तो सत्यनारायण की कथा तुम्हें उसके निकट नहीं लाएगी। क्योंकि तुम्हारी सत्यनारायण की कथा में न तो सत्य है और न नारायण है; वह तो पंडित-पुरोहित का व्यवसाय है। यज्ञ-हवन, आग में फेंका गया घी, गेहूं, चावल-पागलपन है, विक्षिप्तता है, अपराध है। देश भूखा मरता हो और हजारों मनों का अनाज, सैकड़ों पीपे घी प्रतिवर्ष बहाया जाता है अग्नि में। तुम पागल हो! यह धर्म नहीं है। जलानी है अपने भीतर की मशाल। और उसके जलाने का सुगमतम जो उपाय है, वह है सृजनात्मक हो जाओ। जीवन को वैसा ही मत छोड़ो जैसा तुमने पाया था। जीवन को कुछ सुंदर करो। उठाओ तूलिका, जीवन को थोड़े रंग दो! उठाओ वीणा, जीवन को थोड़े स्वर दो! पैरों में बांधो घूंघर, जीवन को थोड़ा नृत्य दो! प्रेम दो! प्रीति दो! तोड़ो उदासी। जीवन को थोड़ा उत्सव से भरो! और तुम जितने सृजनात्मक हो जाओगे उतना ही तुम पाओगे, तुम परमात्मा के करीब आने लगे। क्योंकि परमात्मा अर्थात सृजनात्मकता। उसके करीब आने का एक ही उपाय है: सृजन। इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि तुम्हारे पंडित-पुजारी से तो कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, अभिनेता कहीं ज्यादा करीब होता...

ओशो : जवानी - बुढ़ापे का भ्रम

जवानी - बुढ़ापे का भ्रम रामकृष्ण के पास एक भक्त आता था। और वह भक्त जब काली के दिन आते, तो कई बकरे कटवाता था। बड़ा समारोह मचाता था। उसकी बड़ी गणना थी भक्तों में, बड़े भक्तों में। फिर अचानक उसने पूजा— भक्ति सब छोड़ दी, बकरे कटने बंद हो गए। तो एक दिन रामकृष्ण ने उससे पूछा कि क्या हुआ? क्या भक्ति— भाव जाता रहा? क्या अब काली में श्रद्धा न रही? उसने कहा, नहीं, यह बात नहीं। आप देखते नहीं, दांत ही सब गिर गए। वह आदमी बड़ा ईमानदार रहा होगा। वह बकरे वगैरह काली ? के लिए कोई काटता है! काली तो बहाना है, तरकीब है। बकरे तो अपने ही दांतों के लिए काटे जाते हैं। लेकिन उसने कहा कि दांत ही न रहे, दांत ही गिर गए, अब क्या काटना और क्या नहीं काटना! किसके लिए काटना? लेकिन वह आदमी ईमानदार रहा होगा। उसने एक बात तो कम से कम समझी कि यह सब दांतों के लिए चल रहा था। बुढ़ापे में लोग शीलवान हो जाते हैं। बुढ़ापे में लोग सच्चरित्रता की बात करने लगते हैं। बुढ़ापे में दूसरे लोगों को समझाने लगते हैं कि जवानी सब रोग है। जब वे जवान थे, तो उनके घर के बड़े—बूढ़े भी उन्हें यही समझा रहे थे कि जवानी सब रोग है। उन्होंने उनकी नहीं सुनी। उनके ब...

ओशो : शून्य का अर्थ है अहंकार से शून्य हो जाना..

शून्य का अर्थ है अहंकार से शून्य हो जाना..इसलिए दुनिया में धन के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता घर के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता पद के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता..क्योंकि ये सब त्याग होकर भी यह हो सकता है कि जिस चीज की ये पूर्ति करते थे उसी की पूर्ति इनका त्याग भी करता हो सिर्फ एक चीज के त्याग को मैं त्याग कहता हूं और वह अहमता है और किसी चीज के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता सिर्फ अहमता के त्याग को मैं त्याग कहता हूं..सिर्फ अहमता के न हो जाने को मैं त्याग कहता हूं लेकिन क्या करेंगे? समझ में यह बात आ जाए कि अहंकार बुरा है कितने दिनों से यह शिक्षा दी गई है कि अहंकार बुरा है और अहंकार पाप है और अहंकार छोड़ना चाहिए..क्या करेंगे? अगर यह समझ में भी आ जाए कि अहंकार बुरा है तो क्या करेंगे? आप छोड़ने में लग जाएंगे कि मैं अहंकार को छोडू.. यह बड़ा पागलपन हो जाएगा कौन अहंकार को छोड़ेगा? अहंकार ही न, वही मैं..तो आप उस भूल में पड़ जाएंगे जैसे एक कुत्ता अपनी पूंछ को पकड़ने की कोशिश में लगा हो वह उचकता है और पूंछ उचक जाती है वह फिर उचकता है फिर वह बड़ा हैरान हो जाता है कि मैं अपनी पूंछ को नहीं पकड़ पाता, क्या...

ओशो : ज्योतिष - एक वैज्ञानिक चिंतन

ज्योतिष - एक वैज्ञानिक चिंतन  हजारों-लाखों पक्षी हर साल यात्रा करते हैं हजारों मील की। सर्दियां आने वाली हैं, बर्फ पड़ेगी, तो बर्फ के इलाके से पक्षी उड़ना शुरू हो जाएंगे। हजारों मील दूर किसी दूसरी जगह वे पड़ाव डालेंगे। वहां तक पहुंचने में अभी उन्हें दो महीने लगेंगे, महीना भर लगेगा। अभी बर्फ गिरनी शुरू नहीं हुई, महीने भर बाद गिरेगी। ये पक्षी कैसे हिसाब लगाते हैं कि अब महीने भर बाद बर्फ गिरेगी? क्योंकि अभी हमारी मौसम को बताने वाली जो वेधशालाएं हैं वे भी पक्की खबर नहीं दे पाती हैं। मैंने तो सुना है कि कुछ मौसम की खबर देने वाले लोग पहले #ज्योतिषियों से पूछ जाते हैं सड़कों पर बैठे हुए कि आज क्या ख्याल है--पानी गिरेगा कि नहीं?   आदमी ने अभी जो-जो व्यवस्था की है वह बचकानी मालूम पड़ती है। ये पक्षी एक-डेढ़ महीने, दो महीने पहले पता करते हैं कि अब बर्फ कब गिरेगी। और हजारों प्रयोग करके देख लिया गया है कि जिस दिन पक्षी उड़ते हैं, हर पक्षी की जाति का निश्चित दिन है। हर वर्ष बदल जाता है वह निश्चित दिन, क्योंकि बर्फ का कोई ठिकाना नहीं है। लेकिन हर पक्षी का तय है कि वह बर्फ गिरने के एक महीने पहले उड़े...

ओशो : समय रहते जाग जाओ तो ठीक। क्योंकि जो समय हाथ से चला गया उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता।....

समय रहते जाग जाओ तो ठीक। क्योंकि जो समय हाथ से चला गया उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता।....  जो क्षण बीत गए, वे बीत ही गए; उन्हें फिर से जीने की कोई सुविधा नहीं है। समय कोई ऐसी संपत्ति नहीं है जिसे तुम खोकर फिर पा सकोगे। इस संसार में सभी चीजें खो कर पाई जा सकती हैं, समय नहीं पाया जा सकता।  इसलिए समय इस संसार में सबसे ज्यादा बहुमूल्य हैः गया, तो गया। और उसी के संबंध में हम सबसे ज्यादा लापरवाह हैं। लापरवाह ही नहीं हैं; लोग बैठ कर ताश खेल रहे हैं, शराब पी रहे हैं। पूछो, क्या कर रहे हो; वे कहते हैं, समय काट रहे हैं, समय काटे नहीं कटता। समय तुम्हें काट रहा है, पागलो! तुम समय को न काट सकोगे। समय को तुम क्या काटोगे? तुम समय को कैसे काटोगे? समय पर तो तुम्हारी कोई पकड़ ही नहीं है। समय तुम्हें काट रहा है; तुम सोचते हो तुम समय को काट रहे हो। अखीर में पाओगे, समय तो नहीं कटा, तुम ही कट गए। अखीर में पाओगे, समय तो नहीं मरा, तुम्हीं मर गए। ध्यान रखना, समय नहीं बीत रहा है, तुम ही बीत रहे हो। समय नहीं जा रहा है, तुम ही बहे जा रहे हो। समय तो एक अर्थ में वहीं का वहीं हैः लेकिन तुम आते हो, चले जाते हो...

ओशो : अगर प्रेम से विवाह निकलता हो, तब तो विवाह एक गहरा अर्थ ले लेता है।

अगर प्रेम से विवाह निकलता हो, तब तो विवाह एक गहरा अर्थ ले लेता है। और अगर विवाह दो पंडितों के और दो ज्‍योतिषियों के हिसाब किताब से निकलता हो, और जाति के विचार से निकलता हो और धन के विचार से निकलता हो तो वैसा विवाह कभी भी शरीर से ज्‍यादा गहरा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे विवाह का एक फायदा है। शरीर मन के बजाय ज्‍यादा स्‍थिर चीज है। इसलिए शरीर जिन समाजों में विवाह का आधार है, उन समाजों में विवाह सुस्‍थिर होगा। जीवन भर चल जाएगा। शरीर अस्‍थिर चीज नहीं है। शरीर बहुत स्‍थिर चीज है। उसमें परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे आता है। और पता भी नहीं चलता। शरीर जड़ता का तल है। इसलिए जिन समाजों ने यह समझा कि विवाह को स्‍थिर बनाना जरूरी है—एक ही विवाह पर्याप्‍त हो, बदलाहट की जरूरत न पड़े; उनको प्रेम अलग कर देना पडा। क्‍योंकि प्रेम होता है मन से और मन चंचल है। जो समाज प्रेम के आधार पर विवाह को निर्मित करेंगे, उन समाजों में तलाक अनिवार्य होगा। उन समाजों में विवाह परिवर्तित होगा। विवाह स्‍थायी व्‍यवस्‍था नहीं हो सकती है। क्‍योंकि प्रेम तरल है। मन चंचल है, और शरीर स्‍थिर और जड़ है। आपके घर में एक पत्‍थर पडा हुआ है। सुबह...

ओशो : ध्यान क्या है?

ध्यान क्या है?  तुम जो भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है- ध्यान का अंतरतम और सार तत्व है यह सीखना कि कैसे साक्षी हों।  एक कौआ आवाज दे रहा है... तुम सुन रहे हो। यहां दो है —विषय - वस्तु (आब्जेक्ट) और विषयी (सब्जेक्ट) लेकिन क्या तुम उस दृष्टा को देख सकते हो जो इन दोनों को देख रहा है? —कौआ —सुनने वाला —और फिर एक 'कोई और' जो इन दोनों को देख रहा है। यह एक सीधी - सरल घटना है।  तुम एक वृक्ष को देखते हो —तुम हो और वृक्ष है, लेकिन क्या तुम एक और तत्व को नहीं पाते? —कि तुम वृक्ष को देख रहे हो और फिर एक दृष्टा है जो देख रहा है कि तुम वृक्ष को देख रहे हो।  साक्षी ध्यान है। तुम क्या देखते हो, यह बात गौण है। तुम वृक्ष को देख सकते हो, तुम नदी को देख सकते हो, बादलों को देख सकते हो, तुम बच्चों को आसपास खेलता हुआ देख सकते हो। साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो यह बात नहीं है, विषय-वस्तु की तुम जो कुछात नहीं है।  देखने की गुणवत्ता, होशपूर्ण और सजग होने की गुणवत्ता —ध्यान है।  एक बात ध्यान रखें, ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, य...

ओशो : रहने दो समस्याएं : प्रेम की धारा तो बहने दो ।

रहने दो समस्याएं :  प्रेम की धारा तो बहने दो ?  आदमी है तो समस्याएं खडी़ होंगी । हाँ , तुम न रहोगे , समस्याएं रहेंगी । समस्याएं शाश्वत हैं । तुम अभी हो , अभी नहीं । अभी नहीं थे , अभी फिर नहीं हो जाओगे । तुम इन समस्याओं में अपना समय खराब न करो । और समस्याएं तुम क्या हल कर लोगे ? और समस्याएं हल करने का प्रेम के अतिरिक्त  और क्या उपाय है ? ये समस्याएं ही इसीलिए हैं कि इतनी घृणा है । ये समस्याएं इसीलिए हैं कि इतनी हिंसा है । ये समस्याएं इसीलिए हैं कि इतना द्वेष है ,  इतनी ईर्ष्या है । और तुम प्रेम से ही बच रहे हो ! और तुम कह रहे हो कि प्रेम तो विलास ही होगा न ! माना कि समस्याएं हैं , निश्चित समस्याएं हैं । लेकिन समस्याओं के कारण प्रेम तो नहीं छोडा़ जा सकता । और यह भी सच है कि प्रेम विलास है । इस जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है , सभी विलास है । फूल भी विलास है , और चांद-तारे भी विलास है । लेकिन क्या चाहते हो समस्याएं ही समस्याएं बचें , न फूल बचें , न पक्षी गीत गाएं , न कोयल पुकारे , न पपीहा गीत गाए , न मोर नाचे , न मोर के पंख हों , न आकाश में इंद्रधनुष उगें , न सूर्योदय का आ...

ओशो : छोड़ो फिक्र औरों की, वे जानें, उनका काम जाने। तुम अपनी फिक्र कर लो।

छोड़ो फिक्र औरों की, वे जानें, उनका काम जाने। तुम अपनी फिक्र कर लो। तुम बदलना चाहो तो भी न बदल सकोगे सभी को। यह भी अहंकार ही है कि हम सभी को बदल लेंगे। यह अहंकार अब तक सफल नहीं हुआ, किसी का सफल नहीं हुआ, किसी का सफल होने वाला नहीं है। इतना ही काफी है कि तुम अपने को बदल लो। और जिसने अपने को बदला उसने दूसरों को बदलने के लिए राह सुझाई। वह मील का एक पत्थर बना। वह एक मशाल बना। उसकी जलती ज्योति देख कर दूर-दूर से लोग चले आएंगे--खोजते लोग चले आएंगे।  जिन्हें प्यास है वे सरोवर खोज लेते हैं। जिन्हें रोशनी की प्यास है वे जलते हुए किसी बुद्धत्व को खोज लेते हैं। मैं यहां देश की स्थिति पर विचार करने को नहीं बैठा हूं। हां, तुम्हारे ऊपर जितना विचार हो सके थोड़ा है। तुम कहते हो : "देश की स्थिति रोज-रोज बिगड़ती जाती है। आप इस संबंध में कुछ क्यों नहीं कहते हैं?'  कहने से क्या होगा? मैं कुछ कर रहा हूं, कहने से क्या होगा? हालांकि मेरा करना सूक्ष्म है, क्योंकि मेरा करना आत्मिक है। कहीं अकाल पड़ जाए तो लोग मेरे पास आते हैं; वे कहते हैं, आप कुछ करते क्यों नहीं? मैं कहता हूं : अकाल पड़ते रहे, तुम सदा करते ...

ओशो : मेरे प्रिय आत्मन्! "नारी और क्रांति' इस संबंध में बोलने का सोचता हूं ...

मेरे प्रिय आत्मन्! "नारी और क्रांति' इस संबंध में बोलने का सोचता हूं, तो पहले यही खयाल आता है कि नारी कहां है?नारी का कोई अस्तित्व ही नहीं है, मां का अस्तित्व है, बहन का अस्तित्व है, बेटी का अस्तित्व है, पत्नी का अस्तित्व है, नारी का कोई भी अस्तित्व नहीं है। नारी जैसा कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। नारी की अपनी कोई अलग पहचान नहीं है। नारी का अस्तित्व उतना ही है जिस मात्रा में वह पुरुष से संबंधित होती है। पुरुष का संबंध ही उसका अस्तित्व है उसकी अपनी कोई आत्मा नहीं है। यह बहुत आश्चर्यजनक है, लेकिन यह कड़वा सत्य है कि नारी का अस्तित्व उसी मात्रा और उसी अनुपात में होता है, जिस अनुपात में वह पुरुष से संबंधित होती है। पुरुष से संबंधित नहीं हो, तो ऐसी नारी का कोई अस्तित्व नहीं है। और नारी का अस्तित्व ही न हो, तो क्रांति की क्या बात करनी है? इसलिए पहली बात यह समझ लेनी जरूरी है कि नारी अब तक अपने अस्तित्व को भी, अपने अस्तित्व को स्थापित नहीं कर पाई है। उसका अस्तित्व पुरुष के अस्तित्व में लीन है। पुरुष का एक हिस्सा है उसका अस्तित्व। बर्नार्ड शा ने एक छोटी सी किताब लिखी। उस किताब का नाम बहुत ...

ओशो : बेहोश आदमी ही अपने चारों तरफ दुख पैदा करता है।

बेहोश आदमी ही अपने चारों तरफ दुख पैदा करता है। आत्मा कोई सिद्धांत नहीं है कि तुम शास्त्र में पढ़ो और मान लो। आत्मा कोई, जैसे गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत है, ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है। आत्मा एक अनुभव है, सिद्धांत नहीं। और अनुभव है चैतन्य की तीव्रता का। इसलिए तुम जितने चैतन्य होते जाओगे, उतना ही तुम्हें आत्मा का पता चलेगा। तुम जितने बेहोश होते चले जाओगे, उतना ही तुम्हें अपना पता नहीं चलेगा। और तुम करीब—करीब बेहोश हो। जो आत्मा को जानना चाहता है, उसे किसी दर्शन शाख की जरूरत नहीं है; उसे चैतन्य को जगाने की प्रक्रिया चाहिए उसे विधि चाहिए, जिससे वह ज्यादा चेतन हो जाये। जैसे कि आग को तुम उकसाते हो; राख जम जाती है, तुम उकसा देते हो— राख झड़ जाती है, अंगारे झलकने लगते हैं। ऐसी तुम्हें कोई प्रक्रिया चाहिए, जिससे राख तुम्हारी झड़े, और अंगार चमके; क्योंकि उसी चमक में तुम पहचानोगे कि तुम चैतन्य हो। और जितने तुम चैतन्य हो, उतने ही तुम आत्मवान हो। जिस दिन तुम पाओगे कि मैं परम चैतन्य हूं उस दिन तुम परमात्मा हो। तुम्हारी चेतना की मात्रा ही तुम्हारी आत्मा की मात्रा होगी। लेकिन अभी तुम करीब—करीब बेहोश हो। अभी क...

ओशो : प्रेम क्या है…?

 प्रेम क्या है…? मैनें सुना है, एक बहुत पुराना वृक्ष था. आकाश में सम्राट की तरह उसके हाथ फैले हुए थे. उस पर फूल आते थे तो दूर-दूर से पक्षी सुगंध लेने आते. उस पर फल लगते थे तो तितलियाँ उड़तीं. उसकी छाया, उसके फैले हाथ, हवाओं में उसका वह खड़ा रूप आकाश में बड़ा सुन्दर था. एक छोटा बच्चा उसकी छाया में रोज खेलने आता था. और उस बड़े वृक्ष को उस छोटे बच्चे से प्रेम हो गया. बड़ों को छोटों से प्रेम हो सकता है, अगर बड़ों को पता न हो कि हम बड़े हैं. वृक्ष को कोई पता नहीं था कि मैं बड़ा हूँ…यह पता सिर्फ आदमी को होताहै…इसलिए उसका प्रेम हो गया. अहंकार हमेशा अपने से बड़ों को प्रेम करने की कोशिश करता है. अहंकार हमेशा अपने से बड़ों से संबंध जोड़ता है.प्रेम के लिए कोई बड़ा-छोटा नहीं. जो आ जाए, उसी से संबंध जुड़ जाता है. वह एक छोटा सा बच्चा खेलता था उस वृक्ष के पास; उस वृक्ष का उससे प्रेम हो गया. लेकिन वृक्ष की शाखाएँ ऊपर थीं, बच्चा छोटा था, तो वृक्ष अपनी शाखाएँ उसके लिए नीचे झुकाता, ताकि वह फल तोड़ सके, फूल तोड़ सके. प्रेम हमेशा झुकने को राजी है, अहंकार कभी भी झुकने को राजी नहीं हैं. अहंकार के पास जाएँगे तो अहंकार क...

ओशो : शत्रुभाव मृत्यु का आमंत्रण है। मैत्री जीवन का बुलावा है।

शत्रुभाव मृत्यु का आमंत्रण है। मैत्री जीवन का बुलावा है। वैर— भाव में जीने वाला सदा भय में जीता है, फियर में जीता है। जो मैत्री को उपलब्ध होते हैं वे ही फियरलेसनेस को, अभय को उपलब्ध होते हैं, क्योंकि फिर मिटने—मिटाने का सवाल न रहा। वे खुद ही मिट गए, अब उन्हें कोई मिटाएगा कैसे? लाओत्सु कहता था: 'धन्य हैं वे लोग जो हारे ही हुए हैं, क्योंकि उन्हें कोई हरा नहीं सकता।’ मैं फिर दोहराता हूं अदभुत है यह पंक्ति। लाओत्सु कहता है धन्य हैं वे लोग जो हारे ही हुए हैं, क्योंकि उन्हें कोई हरा नहीं सकता। धन्य हैं वे लोग जो मिट ही गए, क्योंकि अब उन्हें कोई मिटा नहीं सकता। धन्य हैं वे लोग जो हैं ही नहीं, क्योंकि अब उनकी कोई मृत्यु संभव नहीं है। हम जितना अपने को बचाते हैं, उतना हम अपने को मिटाए जाने के लिए आमंत्रण भेज देते हैं। तूफान आता है हवा का एक। छोटे—छोटे वृक्ष झुक जाते हैं, हवाएं निकल जाती हैं, वे फिर खड़े हो जाते हैं और हंसने लगते हैं। उनमें फूल फिर खिल आते हैं, वे फिर हवाओं में नाचने लगते हैं। बड़े वृक्ष— अहंकार से भरे वृक्ष, ऊंचे वृक्ष—नहीं, झुकने के लिए तैयार नहीं होते। वे टकराते हैं, वे प्रत...

ओशो : भय की ऊर्जा को समझो

भय की ऊर्जा को समझो भय को न मारा जा सकता है न जीता जा सकता है, केवल समझा जा सकता है और केवल समझ ही रूपांतरण लाती है, बाकी कुछ नहीं। अगर तुम अपने भय को जीतने की कोशिश करोगे, तो यह दबा रहेगा, तुम्हारे भीतर गहरे में चला जाएगा। उससे कुछ सुलझेगा नहीं, बल्कि चीजें और उलझ जाएँगी।  जब भय उठे तो तुम उसे दबा सकते हो- भय को जीतने का यही अर्थ है। भय को तुम दबा सकते हो; इतने गहरे में दबा सकते हो कि तुम्हारी चेतना से वह बिलकुल गायब हो जाए। तब तुम्हें कभी उसका पता भी न चलेगा, लेकिन वह बेसमेंट में पड़ा रहेगा और अपना काम जारी रखेगा। वह तब भी तुम पर हावी होगा, तुम पर कब्जा करेगा, लेकिन ऐसे परोक्ष ढंग से कब्जा करेगा कि तुम्हें उसका पता भी न चले। लेकिन तब खतरा और भी गहरा हो जाएगा। अब तुम उसे समझ भी न पाओगे। तो भय को जीतना नहीं है। न ही उसे मारना है। भय को तुम मार नहीं सकते, क्योंकि उसमें एक प्रकार की ऊर्जा होती है और कोई भी ऊर्जा कभी नष्ट नहीं की जा सकती। तुमने कभी देखा भय के समय तुममें एकदम से बड़ी ऊर्जा आ जाती है? ठीक जैसे क्रोध के समय ऊर्जा आ जाती है; वे दोनों एक ही ऊर्जा के दो आयाम हैं। क्रोध आक्राम...