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ओशो : काम उर्जा को समाधि में कैसे रूपांतरित किया जा सकता है ?

पांचवा प्रश्न– काम उर्जा को समाधि में कैसे रूपांतरित किया जा सकता है ? तंत्र और योग के पास मनुष्य के भीतर का एक विशिष्ठ मानचित्र है। अच्छा हो यदि तुम इस मानचित्र को समझ लो—यह तुम्हारी मदद करेगा, यह तुम्हारी बड़ी सहायता करेगा। तंत्र और योग कहते है कि मनुष्य के शरीर में सात केंद्र हैं—सूक्ष्म शरीर में, देह में नहीं। सच तो यह है कि ये रूपक हैं। पर आंतरिक मनुष्य के संबंध में कुछ समझने के लिए ये बहुत ही सहायक हो सकते है। ये सात चक्र इस तरह से हैं। पहला और सर्वाधिक मूलभूत है मूलाधार—इसीलिए इसे मूलाधार कहते है। मूलाधार का अर्थ है आधारभूत, तुम्हारी जड़ों वाला। मूलाधार चक्र वह केंद्र है जहां काम-उर्जा ठीक अभी उपलब्ध है, परंतु समाज ने उस चक्र को बहुत बिगाड़ दिया है। इस मूलाधार चक्र के तीन कोण हैं: पहला है मौखिक, मुंह, दूसरा है गुद्दा, और तीसरा है जाननेन्द्रिक। ये मूलाधार के तीन कोण हैं। बच्चा अपना जीवन मौखिक से प्रारंभ करता है, और गलत लालन-पालन के कारण बहुत से लोग मौखिक पर ही अटके रह जाते है, वे कभी बढ़ते ही नहीं। यही कारण है कि धूम्रपान, च्यूंगम, निरंतर-भोजन, करना जैसी इतनी धटनाएं घटती है। यह ए...

ओशो : एक सन्यासी के जीवन में दान का क्या महत्व होना चाहिए ?

तीसरा प्रश्न: एक सन्यासी के जीवन में दान का क्या महत्व होना चाहिए  ? प्रश्न एक संन्यासी का नहीं है—प्रश्न फिलिप मार्टिन का है। पहली बात तो यह, फिलिप मार्टिन, कि संन्यासी हो जाओ। तुम्हें दूसरों के विषय में प्रश्न नहीं पूछने चाहिए, यह सज्जनता नहीं है। तुमने अपने बारे में प्रश्न पूछने चाहिए। पहले संन्यासी हो जाओ, फिर पूछो। लेकिन प्रश्न अर्थपूर्ण है, इसलिए उत्तर तो मैं देने जा रहा हूं। और मुझे ऐसा महसूस होता है कि देर-सवेर फिलिप मार्टिन संन्यास हो ही जाएगा। प्रश्न में ही झुकाव दिखाई देता है। पहली बात: दुनिया के सारे धर्मों में चैरिटी पर, दान पर, बहुत जोर दिया गया है। और उसका कारण यह है कि आदमी ने धन के साथ सदा अपराधभाव महसूस किया है। दान का इतना प्रचार इसीलिए किया गया है ताकि मनुष्य कुछ कम अपराधभाव महसूस करे। तुम्हें हैरानी होगी; प्राचीन अंग्रेजी में एक शब्द है गिल्ट जिसका अर्थ है धन। जर्मन भाषा में एक शब्द है गेल्ड जिसका अर्थ धन है। और गोल्ड तो बहुत करीब है ही। गिल्ट, गिल्ट, गोल्ड—किसी ने किसी तरह गहरे में धन के साथ अपराधभाव जुड़ा है। जब कभी भी तुम्हारे पास धन होता है तुम अपराधीर अनुभ...

ओशो : सम्यक श्रम

सम्यक श्रम सम्यक श्रम भी मनुष्य की चेतना और ऊर्जा को जगाने के लिए अनिवार्य हिस्सा है। अब्राहम लिंकन एक दिन सुबह-सुबह अपने घर बैठा अपने जूतों पर पॉलिश करता था। उसका एक मित्र आया और उस मित्र ने कहा: लिंकन, यह क्या करते हो? तुम खुद ही अपने जूतों पर पॉलिश करते हो? लिंकन ने कहा: तुमने मुझे हैरानी में डाल दिया। तुम क्या दूसरों के जूतों पर पॉलिश करते हो? मैं अपने ही जूतों पर पॉलिश कर रहा हूं। तुम क्या दूसरों के जूतों पर पॉलिश करते हो? उसने कहा कि नहीं-नहीं, मैं तो दूसरों से करवाता हूं। लिंकन ने कहा: दूसरों के जूतों पर पॉलिश करने से भी बुरी बात यह है कि तुम किसी आदमी से जूते पर पॉलिश करवाओ। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है कि जीवन से सीधे संबंध हम खो रहे हैं। जीवन के साथ हमारे सीधे संबंध श्रम के संबंध हैं। प्रकृति के साथ हमारे सीधे संबंध हमारे श्रम के संबंध हैं। कनफ्यूशियस के जमाने में--कोई तीन हजार वर्ष पहले--कनफ्यूशियस एक गांव में घूमने गया था। उसने एक बगीचे में एक माली को देखा। एक बूढ़ा माली कुएं से पानी खींच रहा है। बूढ़े माली का कुएं से पानी खींचना बड़ा कष्टपूर्ण है। वह बुड्ढा लगा हुआ है प...

ओशो : प्रार्थना

 बुद्ध के पास एक दिन सुबह-सुबह एक आदमी आया और उनके ऊपर थूक दिया। बुद्ध ने चादर से अपना मुंह पोंछ लिया और उस आदमी से कहा, और कुछ कहना है? कोई आदमी आपके ऊपर थूके, तो आप यह कहेंगे कि कुछ और कहना है? पास बैठे भिक्षु तो क्रोध से भर गए। उन्होंने कहा, यह क्या आप पूछ रहे हैं? कुछ और कहना है? बुद्ध ने कहा, जहां तक मैं जानता हूं, इस आदमी के मन में इतना क्रोध है, कि शब्दों से नहीं कह सका, थूक कर कहा है। लेकिन मैं समझ गया। इसे कुछ कहना है। क्रोध इतना ज्यादा है कि शब्द से नहीं कह पाता है। थूक कर कहता है।प्रेम ज्यादा होता है आदमी शब्द से नहीं कहता, किसी को गले लगा कर कहता है। इसने थूक कर जो कहा है हम समझ गए। अब और भी कुछ कहना है कि बात खत्म हो गई। वह आदमी तो हैरान हो गया। क्योंकि यह तो सोचा ही नहीं था कि थूकने का यह उत्तर मिलेगा। उठ कर चला गया। रात भर सो नहीं सका।  दूसरे दिन क्षमा मांगने आया। बुद्ध के पैर पड़ गया, आंसू गिराने लगा।जब उठा तो बुद्ध ने कहा, और कुछ कहना है?तो आस-पास के भिक्षुओं ने कहा, आप क्या कहते हैं? उन्होंने कहा, देखो न मैंने तुमसे कल कहा था, अब यह आदमी आज भी कुछ कहना चाहता ह...

ओशो : प्रश्न:आप साफ-साफ क्यों नहीं बताते कि हम क्या करें ?

 प्रश्न:आप साफ-साफ क्यों नहीं बताते कि हम क्या करें ? _मैंने सुना है, दीवाल से कान लगाए खड़े एक गधे ने दूसरे गधे से पूछा: "यहां क्यों खड़े हो?  यहां क्या कर रहे हो?" पहले गधे ने जवाब दिया: "मेरा बच्चा खो गया है। इस घर से लड़ने की आवाज आ रही है।  एक कहता है तू गधे का बच्चा है। और दूसरा कहता है तू गधे का बच्चा है।  सोचता हूं, कब लड़ाई खत्म हो, मेरा बच्चा घर से बाहर निकले, तो लेकर जाऊं! गधा अपने बच्चे की तलाश में है। उसे क्या पता कि यह आदमी, जो एक-दूसरे को गधा कह रहे हैं, गधा नहीं हैं।  उसे क्या पता कि इनको गधे कहने का अर्थ बड़ा और है।  उसे क्या पता कि ये सिर्फ गालियां दे रहे हैं। ये किसी तथ्य की घोषणा नहीं कर रहे हैं।  मगर गधे को कैसे पता चले? गधा तो अपने बच्चे की तलाश में निकला है। वह सोचा है कि यह भी खूब रही, इस घर के भीतर मेरा बच्चा है, अब निकल आए तो ठीक है,ले जाऊं। झगड़ा खत्म हो तो मैं ले जाऊं। मैं जब तुमसे बोल रहा हूं तो निरंतर ऐसा होगा। मैं कहूंगा कुछ, तुम समझोगे कुछ। मैंने कहा तुम जो भी करोगे, गलत होगा, क्योंकि तुम गलत हो, क्योंकि तुम्हारा होना ही गलती ...

ओशो : मुझे कब और कितनी बार ध्यान करना चाहिए ?

 मुझे कब और कितनी बार ध्यान करना चाहिए ? यहां तक ​​कि अगर आपको भोजन करना छोड़ना पड़े, तो छोड़ दें ... लेकिन ध्यान करना न छोड़ें। आप जितने अधिक नियमित होंगे ध्यान करने में, उतनी अधिक गहराई आप प्राप्त करेंगे।  ध्यान ऐसी नाजुक चीज है कि इसे बढ़ने के लिए महीनों लगते हैं लेकिन सिर्फ एक या दो दिन में कुम्हला जाती है। एक नाजुक चीज़ को बहुत नियमितता, निरंतरता की आवश्यकता होती है। ध्यान उच्चतम है; सब कुछ निम्नतम है। एक दिन नींद नहीं ली तो आप ज्यादा कुछ नहीं खोते है। बगैर नींद के कोई भी पांच से सात दिन तक रह सकता है। अगर आप भोजन करना छोड़ते है तो भी ठीक है; आदमी तीन महीने तक भोजन के बिना जीवित रह सकता है। आप एक दिन के लिए पीने के पानी के बिना जी सकते हैं; आपकी मौत नहीं होगी। लेकिन आम तौर पर लोग इस तरह की शुद्र चीजों को ज्यादा महत्व देते हैं और सोचते हैं कि एक या दो दिन तक वे वास्तव में महत्वपूर्ण चीजों के बिना रह सकते हैं। लेकिन यह याद रखें, कि यदि आप अपने दिनचर्या की छोटी चीजों को पूरा नहीं करेंगे तो कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। आप उन्हें करने से कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे; और न ही उन्हें न करने ...

ओशो : आत्मा अमर है

यह सच है कि आत्मा अमर है, ज्ञानस्वरूप है, फिर कैसे अज्ञान में गिरती है? यह सवाल महत्वपूर्ण है और बहुत ऊपर से देखे जाने पर समझ में नहीं आ सकेगा। थोड़े भीतर गहरे झांकने से यह बात स्पष्ट हो सकेगी कि ऐसा क्यों होता है। जैसे, इस कमरे में आप हैं और आप इस कमरे के बाहर कभी भी नहीं गए हैं, कभी गए ही नहीं। इस कमरे में आप हैं, बड़े आनंद में हैं, बड़ी शांति में हैं, बड़े सुरक्षित। न कोई भय, न कोई अंधकार, न कोई दुख; लेकिन इस कमरे के बाहर आप कभी नहीं गए हैं। तो इस कमरे में रहने की दो शर्तें हो सकती हैं एक तो यह कि आपको कमरे के बाहर जाने की कोई स्वतंत्रता नहीं है। यानी आप जाना भी चाहें तो आप नहीं जा सकते हैं। आप परतंत्र हैं इस कमरे में रहने को–एक तो शर्त यह हो सकती है। दूसरी शर्त यह हो सकती है कि आप स्वतंत्र पूरे हैं बाहर जाने को, लेकिन आप अपनी समझ के कारण बाहर नहीं जाते हैं। क्योंकि बाहर दुख है, क्योंकि बाहर पीड़ा है, बाहर भटक जाना है, बाहर अशांति है। ये दो शर्तें हो सकती हैं। अगर आप परतंत्र हैं बाहर जाने के लिए, तो आपका सुख, आपकी शांति, आपकी सुरक्षा, सभी थोड़े दिनों में आपको कष्टदायी हो जाएंगी,...

ओशो : मै तुम्हारा मित्र हूं , गुरु नहीं ।

"मैं तुम्हारा मित्र हूँ, गुरु नही। क्योकि गुरु के नाम पर बहुत पाखंड हो गया है ! मै तुम्हे चरणों में नहीं, हृदय में बैठाना चाहता हूँ ! मैं तुम से बड़ा नहीं, जो तुम हो, वही मैं हूँ ! मैं तुम्हारे अंदर भी आनन्द देखना चाहता हूँ। जो मुझे मिल रहा है, मैं तुम्हे भी वह अनुभूति देना चाहता हूँ ! मैं कुछ भी शेष नही रखूंगा। जो मुझे मिला वह सब कुछ बांटना चाहता हूँ ! ऐसा नही कि मैं तुम्हारे उपर कोई अहसान कर रहा हूं! मैं स्वयम् आजाद हूँ और तुम्हें भी आजादी देता हूँ ! तुम्हे वह स्वतंत्रता देना चाहता जो किसी धर्म ने तुम्हे नही दी है। तुम चाहो तो धन्यवाद भी मत देना। तुम मेरे मन्दिर मत बनाना ! मेरा कोई धर्म मत बनाना! मेरे प्रवचनों को शास्त्र मत बनाना ! तुम सब अपने-अपने गुरु बन जाना! तुम्हारा गुरु बनने में मेरा कोई रस नही है ! लेकिन तुम्हारी गुरु मानने की यह आदत जन्मों से जुडी हुई है! हम सब एक ही माला के मोती हैं। जो तुम हो वही मैं हूं, और जो मैं हूँ वही तुम हो !" ओशो

ओशो : स्वयं के साथ होना ध्यान है ।

स्वयं के साथ होना ध्यान है जब तुम एक बार भीतर प्रवेश करते हो, ध्यान शुरू हो जाता है। ध्यान मतलब अकेले में आनंदित रहने की क्षमता । स्वयं के साथ खुश रहने की क्षमता । स्वयं के साथ रहने की क्षमता है। स्वयं के साथ रहना ध्यान है। ध्यान में किसी दूसरे की कोई आवश्यकता नहीं है । ध्यान, अकेलेपन का आनंद है । अकेलेपन का दुख नहीं... पूरब का ध्यान वह नहीं है । जो पश्चिम में समझा जाता है । पश्चिम में ध्यान का मतलब चिंतन है । भगवान पर ध्यान लगाना, सत्य पर ध्यान लगाना, प्रेम पर ध्यान लगाना... पूरब में ध्यान का अर्थ पूरी तरह से अलग है, पश्चिमी अर्थ के विपरीत। पूरब में ध्यान का अर्थ मन में कोई तस्वीर नहीं है । मन में कोई भी बात नहीं है । किसी बात पर ध्यान नहीं देना है । बल्कि सब-कुछ छोड़ देना है । नेति-नेति, न यह न वह। ध्यान स्वयं को सभी बातों से खाली करना है। जब तुम्हारे भीतर कोई विचार नहीं घूमता है । तो स्थिरता होती है; वह स्थिरता ध्यान है । तुम्हारी चेतना की झील में भी एक लहर नहीं उठती, जैसे शांत झील, बिल्कुल स्थिर, वह ध्यान है। और उस ध्यान में तुम्हें पता चलेगा...

ओशो : "इसलिए संत बिना इधर-उधर भागे ही जानते हैं, बिना देखे ही समझते हैं, और बिना कर्म किए सब कुछ संपन्न करते हैं।"

"इसलिए संत बिना इधर-उधर भागे ही जानते हैं, बिना देखे ही समझते हैं, और बिना कर्म किए सब कुछ संपन्न करते हैं।" बिना देखे ही समझते हैं! जो भी देखा जा सकता है वह पराया होगा, वह बाहर होगा। आत्मा को देखा नहीं जा सकता। यद्यपि हमारे पास शब्द हैं: आत्म-दर्शन, आत्म-साक्षात्कार, आत्म-ज्ञान। ये सभी शब्द गलत हैं। क्योंकि इन शब्दों से भ्रांति हो सकती है। मैं आपको तो देख सकता हूं, क्योंकि आप मुझसे अलग हैं, मैं स्वयं को कैसे देखूंगा? कौन देखेगा और किसको देखेगा? वहां एक ही है, देखने के लिए दो की जरूरत है। अगर मैं स्वयं को देखूं तो जिसको मैं देखूंगा वह मैं नहीं हूं; जो देख रहा है वह मैं हूं। मैं सदा ही देखने वाला रहूंगा। मैं दृश्य नहीं बन सकता, मैं सदा द्रष्टा ही रहूंगा। इसलिए लाओत्से कहता है, "बिना देखे समझते हैं।" वहां देखने का कोई उपाय नहीं है। आप अपने को कैसे देख सकते हैं? देखने के लिए बंटना जरूरी है: कोई देखे, कोई दिखाई पड़े; कोई दृश्य हो, कोई द्रष्टा हो; कोई आब्जेक्ट, कोई सब्जेक्ट। और आप? आप सदा ही देखने वाले हैं। इसलिए आत्म-दर्शन नहीं हो सकता, आत्म-ज्ञान नहीं हो ...

ओशो: लाओत्से के अनुसार अयोग्यता गहनतम योग्यता का नाम है। वह आलस्य नहीं है, विश्राम की परम दशा है। वह तमस भी नहीं है, ऊर्जा की अत्यंत प्रज्वलित स्थिति है।

पहला प्रश्न: प्रथम दिन की चर्चा में आपने समझाया कि अयोग्यता ताओ चिंतना का कीमती शब्द है, तथा उसका बहुत आध्यात्मिक मूल्य है। इस संदर्भ में ऐसा लगता है कि तामसी व आलसी लोग तो अयोग्यता के गुण से संपन्न होते ही हैं, लेकिन फिर भी उनका आध्यात्मिक विकास होता दिखाई नहीं पड़ता। इस विषय में आपकी क्या दृष्टि है? ओशो: लाओत्से के अनुसार अयोग्यता गहनतम योग्यता का नाम है। वह आलस्य नहीं है, विश्राम की परम दशा है। वह तमस भी नहीं है, ऊर्जा की अत्यंत प्रज्वलित स्थिति है। फर्क को ठीक से समझ लें। भ्रांति स्वाभाविक है, क्योंकि जो व्यक्ति भी निष्क्रिय बैठा है, हमें लगेगा, आलसी है। सभी निष्क्रिय बैठे हुए व्यक्ति आलसी नहीं होते। जिसे हम आलसी कहते हैं, खाली तो वह भी नहीं बैठता; मन का काम जारी रहता है। शायद आलसी आदमी शरीर से कुछ न करता हो, मन से तो पूरी तरह करता है। और जहां शरीर की गति वाले लोग दौड़ रहे हैं वहां वह भी अपनी कामना और वासना से दौड़ता है। उसके मन के संबंध में कोई फर्क नहीं है। हमें आलसी दिखाई पड़ता है, क्योंकि हमारे जैसा नहीं दौड़ रहा है। लेकिन दौड़ तो वह भी रहा है। अगर आलस्य परम हो जाए, जिसको लाओत्से कह ...

ओशो : स्वर्णिम प्रकाश ध्यान

ध्यान विधि     स्वर्णिम प्रकाश ध्यान श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो, क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण-पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है। वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा। वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा। यह पुरुष ऊर्जा है... इसे दिन में कम से कम दो बार करो-सबसे अच्छा समय सुबह-सुबह का है, ठीक तुम्हारे बिस्तर से उठने से पहले। जिस क्षण तुम्हें लगे कि तुम जाग गए, इसे कम से कम बीस मिनट के लिए करो। सुबह सबसे पहला यही काम करो!-बिस्तर से मत उठो। वहीं, उसी समय, तत्क्षण इस विधि को करो, क्योंकि जब तुम नींद से जग रहे होते हो तब बहुत नाजुक और संवेदनशील होते हो। जब तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो तब बहुत ताजे होते हो और इस विधि का प्रभाव बहुत गहरा जाएगा। जिस समय तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो तो उस समय सदा की अपेक्षा तुम बुद्धि में कम होते हो। तो कुछ अंतराल हैं जिनके माध्यम से यह विधि तुम्हारे अंतर्तम सत्व में प्रवेश कर जाएगी। और सुबह-सुबह, जब तुम जाग रहे होते हो और पूरी पृथ्वी जाग रही होती है, उस समय पूरे विश्व में जाग रही ऊर्...

ओशो : मन

मन हम जो भी करते हैं, वह मन का पोषण है। मन को हम बढ़ाते हैं, मजबूत करते हैं। हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है। बूढ़ा देखें, बूढ़ा आदमी कहता है, मुझे सत्तर साल का अनुभव है। मतलब ?  उनके पास सत्तर साल पुराना मजबूत मन है। और जैसे शराब पुरानी अच्छी होती है, लोग सोचते हैं, पुराना मन भी अच्छा होता है। वैसे शराब और मन में कुछ तादात्म्य है, एकरसता है। जैसे शराब और नशीली हो जाती है, वैसे ही मन जितना पुराना होता है, उतना नशीला हो जाता है। चेतना नहीं बदलती, चेतना तो वही बनी रहती है। मन की पर्त चारों तरफ घिर जाती है। मांग वही बनी रहती है, वासना वही बनी रहती है। शरीर सूख जाता, वासना हरी ही बनी रहती है। नहीं, अनुभव वगैरह से कुछ नहीं। जिसको संसार का अनुभव कहते हैं, वह मन का पोषण है सिर्फ। संन्यासी अ-मन की तरफ चलता। गृहस्थ मन की तरफ चलता।  सभी लोग मन लेकर पैदा होते हैं, लेकिन धन्य हैं वे, जो मन के बिना मर जाते हैं। सभी लोग मन लेकर जन्मते हैं, लेकिन अभागे हैं वे, जो मन को लेकर ही मर जाते हैं। फिर जीवन में कोई फायदा न हुआ। फिर यह यात्रा बे...

ओशो : जिंदगी लूटती है--देती कुछ भी नहीं।

जिंदगी लूटती है--देती कुछ भी नहीं। इस जिंदगी की पूरी अंधेरी रात का एक ही परिणाम है--दुख। बस एक ही संपत्ति है--आंसू! यहां कुछ आदमी पाता नहीं, कुछ गंवाता जरूर है। हम जितने खाली हाथ आते हंै संसार में, उससे कहीं ज्यादा खाली हाथ जाते हैं। हम कुछ गंवा कर जाते हैं। आते तो खाली हैं ही, लेकिन कम से कम मुट्ठी बंद होती है। बच्चा पैदा होता है, तो मुट्ठी बंद होती है। हालांकि खाली--पर कम से कम बंद होती है। और जब जाता है, तब भी खाली होती है। लेकिन तब खुली होती है। सब लुट गया। जिंदगी लूटती है--देती कुछ भी नहीं। और जिंदगी लूट लेती है इस तरकीब से कि पता भी नहीं चलता। और तुम तो इसी खयाल में रहते हो कि कमा रहे हो; तुम तो इसी भ्रम में रहते हो कि कमा लिया है। और कमाए जा रहे हो। यह अपना हो गया; वह अपना हो गया; इतनी जमीन इतनी जायदाद, इतना नाम, इतनी प्रतिष्ठा! इसी कमाने के धोखे में तुम सब गंवा देते हो। धनी से ज्यादा गरीब आदमी खोजना कठिन है। और जो बड़े पदोें पर बैठे हैं, उनसे ज्यादा रिक्त आत्माएं खोजनी कठिन हैं। भिखमंगे हैं; भ्रांति भर है कि भिखमंगे नहीं हंै। सौभाग्यशाली है वह, जिसे यह समझ में आ जाए कि जिंदगी लू...

ओशो : जहां है वहीं सुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही संन्यासी है ।

जहां है वहीं सुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही संन्यासी है ।      मेरे सारे ध्यान के प्रयोग मौलिक रूप से थकाने के प्रयोग हैं, ताकि इंद्रियां थककर बैठ जाएं। एक रास्ता है जबरदस्ती बिठाने का। मैं उसके पक्ष में नहीं हूं क्योंकि जबरदस्ती कोई भी इंद्रियों को बैठा नहीं सकता। हालत वैसी हो जाती है, जैसे छोटे बच्चे को कह दो कि बैठो शाति से। तो वह बैठ जाता है, लेकिन उसकी सारी ताकत शांति से बैठने में लग रही है। एक एक चीज को खींचे हुए है। तना हुआ है। शिथिल भी नहीं हो पाता। विश्राम भी नहीं कर पाता। तनावग्रस्त है।    बच्चे को कहो कि दौड़ो, एक पच्चीस चक्कर लगाओ। फिर कहने की जरूरत नहीं कि शांत बैठ जाओ। पच्चीस चक्कर के बाद वह खुद ही शांत बैठ जाएगा। वह शांति बड़ी अलग होगी। उस शाति में कोई तनाव नहीं होगा, कोई बेचैनी नहीं होगी। बल्कि शांति में एक सुख होगा, एक राहत होगी, एक झलक होगी विश्राम की। इंद्रियों को थका डालें, इतना थका डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए। जो बाल बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए म...

ओशो : एक पुरानी कथा है। एक खोजी ने विष्णु को खोजते—खोजते एक दिन पा लिया। चरण पकड़ लिए। बड़ा आह्लादित था, आनंदित था। जो चाहिए था, मिल गया था। खूब—खूब धन्यवाद दिए विष्णु को और कहा कि बस एक बात और: मुझसे कुछ थोड़ा सा काम करा लें, कुछ सेवा करा लें।

एक पुरानी कथा है।  एक खोजी ने विष्णु को खोजते—खोजते एक दिन पा लिया। चरण पकड़ लिए। बड़ा आह्लादित था, आनंदित था। जो चाहिए था, मिल गया था। खूब—खूब धन्यवाद दिए विष्णु को और कहा कि बस एक बात और: मुझसे कुछ थोड़ा सा काम करा लें, कुछ सेवा करा लें।  आपने इतना दिया, जीवन दिया, जीवन का परम उत्सव दिया और अब यह परम जीवन भी दिया। मुझसे कुछ थोड़ी सेवा करा लें! मुझे ऐसा न लगे कि मैं आपके लिए कुछ भी न कर पाया, आपने इतना किया! मुझे थोड़ा सा सौभाग्य दे दें! जानता हूं, आपको किसी की जरूरत नहीं, किसी बात की जरूरत नहीं। लेकिन मेरा मन रह जाएगा कि मैं भी प्रभु के लिए कुछ कर सका! विष्णु ने कहा: कर सकोगे? करना बहुत कठिन होगा। मगर भक्त जिद्द अड़ गया। तो कहा: ठीक है, मुझे प्यास लगी है। क्षीरसागर में तैरते हैं विष्णु, वहां कैसी प्यास! पर इस भक्त के लिए कहा कि चल ठीक, मुझे प्यास लगी है। तू जाकर एक प्याली भर पानी ले आ। भक्त भागा। तुम कहोगे क्षीरसागर था, वहीं से भर लेता। लेकिन जो पास है, वह तो किसी को दिखाई नहीं पड़ता। पास तो दिखाई ही नहीं पड़ता। पास के लिए तो हम बिलकुल अंधे हैं। हमें दूर की चीजें दिखाई पड़ती हैं। जित...

ओशो : जिंदा परमात्मा को पूजो

जिंदा परमात्मा को पूजो  तुम अगर गौर से देखोगे तो तुम परमात्मा को हर जगह गत्यात्मक पाओगे। लेकिन तुमने झूठे परमात्मा खड़े किए हैं। मंदिरों में पत्थरों की मूर्तियां बना ली हैं, वे ठहरी हैं वहीं की वहीं। उनसे तो तुम्हीं थोड़े ज्यादा परमात्मा हो। चलते तो हो;उठते-डोलते तो हो; तुम्हारे जीवन में कुछ गीत तो है--सुबह कहीं, सांझ कहीं! मंदिर का तुम्हारा भगवान तो वहीं का वहीं पड़ा है। अच्छा हो कि तुम फूलों को पूजो! लेकिन तुम उलटे आदमी हो। तुम जिंदा फूलों को तोड़कर मुर्दा परमात्माओं के चरणों में रख आते हो। इससे तो अच्छा होता कि अपने मुर्दा परमात्मा को उठा कर फूलों के चरणों में रख देते। गति को पूजो, अगति को नहीं! अगति जड़ता है। प्रवाह को पूजो, पत्थरों को नहीं! लेकिन पत्थर से तुम्हारा रास बैठ जाता है, क्योंकि तुम जड़ हो। तुमने अकारण ही पत्थर के भगवान नहीं बना लिए हैं; वे तुम्हारी जड़ता के सूचक हैं, सबूत हैं। तुमने अपनी ही छवि में उनको ढाल लिया है। तुमने अपनी ही प्रतिमाएं गढ़ ली हैं--तुमसे भी ज्यादा मुर्दा! थोड़ा पहचानो! थोड़ा जागो! गत्यात्मक को पूजो! देखो! चांद चलता है, सूरज चलता है, तारे चलते हैं। कुछ ठहरा...

ओशो : क्या मुझे किसी और से प्रेम करने से पहले खुद से प्रेम करना चाहिए?

क्या मुझे किसी और से प्रेम करने से पहले खुद से प्रेम करना चाहिए? “हां, आपको यह समझना होगा कि करुणामय होने के लिए, व्यक्ति को सबसे पहले खुद के प्रति करुणा जगानी होगी। अगर आप खुद से प्रेम नहीं करते हैं, तो आप कभी किसी और से प्रेम नहीं कर पाएंगे। यदि आप स्वयं के प्रति करुणापूर्ण नहीं हैं, तो आप किसी और के प्रति करुणापूर्ण नहीं हो सकते। आपके तथाकथित संत जो खुद पर बहुत कठोर हैं, वे सिर्फ दिखावा करते हैं कि वे दूसरों के प्रति करुणापूर्ण हैं। यह संभव नहीं है। मनोवैज्ञानिक रूप से यह असंभव है। यदि आप स्वयं के प्रति करुणापूर्ण नहीं हैं, तो आप दूसरों के प्रति करुणापूर्ण कैसे हो सकते हैं? “पहला कदम खुद को स्वीकार करना है जैसे आप हैं; सभी आदर्श छोड़ दें। अपने दिल में कोई शर्तें न रखें कि ऐसा ही 'होना चाहिए'। आप कोई और नहीं हैं। आपसे कुछ ऐसा करने की अपेक्षा नहीं की जाती है जो आपसे संबंधित नहीं है। आप सिर्फ अपने होने के लिए हैं। रिलैक्स करें और बस खुद बनें। अपने व्यक्तित्व के प्रति सम्मान रखें और अपने स्वयं के हस्ताक्षर करने का साहस रखें। दूसरों के हस्ताक्षरों की नकल पर मत जाइए। ” ओशो ए सडेन ...

ओशो : बुद्ध हो जाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है

बुद्ध हो जाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है वास्तव में, एक यंत्र की भांति जीना आपको सुविधापूर्ण लगता है। सचमुच एक यंत्र की भांति जीना आरामदेह है आप एक यांत्रिक प्रक्रिया में जीते हैं। आपको अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आपका शरीर, आपका मन एक मशीन की तरह काम करता है और इसमें वह कुशल भी है। और यह सजग न होना काफी सुविधापूर्ण है, क्योंकि जो वस्तुएं आपके चारों ओर फैली हैं, उनके प्रति सजग होना एक ऐसी संवेदनशीलता प्रदान करता है कि वह आपको बड़ी दुःख पूर्ण लगेगी। बुद्ध हो जाना केवल आनंदपूर्ण हो जाना ही नहीं हैं, जहां तक बुद्ध का अपना संबंध है, वे आनंदपूर्ण हैं। वे आनंद के उच्चतम अनुभव कोप्राप्त करते हैं। किंतु साथ ही उन्हें इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है, क्योंकि अब वे इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि उनके चारों तरफ जो चीजें फैली हैं, वे उन्हें दुःख देती हैं। वे दूसरों के दुःख से पीड़ित होने लगते है। एक भिखारी आपको मिलता है। आप उसे बिना जाने ही निकल जाते हैं, कोई समस्या नहीं है। यह बिल्कुल सुविधापूर्ण है। यदि आज सजग हो जाते हैं, तब यह इतना आसान नहीं होगा। तब आपको ऐसा अनुभव होगा ही कि इसमें...

ओशो : जागरण

जागरण तुम्हारे स्वपन में भी सत्य कि छाया पड रही है और तुम्हारी नींद में भी जागरण का बीज पडा़ है । वहीं से अंकुरित होगा । और जीवन ही एकमात्र अवसर है । भागो मत, भागना आसान है । इस जीवन को ही जीओ। और धीरे धीरे समझपूर्वक जीओ : -- कि मैं क्या कर रहा हूँ?  क्यों कर रहा हूँ?  और मुझे इस जीवन से क्‍या मिल रहा है?  अगर सुख मिल रहा है तो खूब जीओ, जी भर कर जीओ! और अगर दुख मिल रहा है, तो जिस जिस चीज से दुख मिल रहा है, उसको विसर्जित करो। काश, तुम जरा चुनाव करने लगो! ओशो रहिमन धागा प्रेम का

ओशो : चौबीस घंटे के लिए सारी वासना छोड़ दो। कुछ पाने की आशा मत रखो। कुछ होने की आशा मत रखो।

एक बार जरा क्षण भर को ऐसा सोचो कि चौबीस घंटे के लिए सारी कामना छोड़ दो -सुख की कामना भी छोड़ दो। चौबीस घंटे में कुछ हर्जा नहीं हो जाएगा, कुछ खास नुकसान नहीं हो जाएगा। ऐसे भी इतने दिन वासना कर-कर के क्या मिल गया है? चौबीस घंटे मेरी मानो। चौबीस घंटे के लिए सारी वासना छोड़ दो। कुछ पाने की आशा मत रखो। कुछ होने की आशा मत रखो। एक क्रांति घट जाएगी चौबीस घंटे में। तुम अचानक पाओगे, जो है, परम तृप्तिदायी है। जो भी है। रूखी-सूखी रोटी भी बहुत सुस्वादु है, क्योंकि अब कोई कल्पना न रही। अब किसी कल्पना में इसकी तुलना न रही। जैसा भी है, परम तृप्तिदायी है! यह अस्तित्व आनंद ही आनंद से भरपूर है। पर हम इसके आनंद भोगने के लिए कभी मौका ही नहीं पाते। हम दौड़े-दौड़े हैं, भागे-भागे हैं। हम ठहरते ही नहीं। हम कभी दो घड़ी विश्राम नहीं करते! इस विश्राम का नाम ही ध्यान है। वासना से विश्राम ध्यान है। तृष्णा से विश्राम ध्यान है। अगर तुम एक घंटा रोज सारी तृष्णा छोड़कर बैठ जाओ, कुछ न करो, बस बैठे रहो -- मस्ती आ जाएगी! आनंद छा जाएगा! रस बहने लगेगा! धीरे-धीरे तुम्हें यह बात दिखाई पड़ने लगेगी, जब घंटे भर में रस बहने लगता है, तो फि...

ओशो : आशा रखोगे तो निराशा ही हाथ लगेगी

आशा रखोगे तो निराशा ही हाथ लगेगी जीवन में न तो उदासी है और न निराशा है। उदासी और निराशा होगी–तुममें। जीवन तो बड़ा उत्फुल्ल है। जीवन तो बड़ा उत्सव से भरा है। जीवन जीवन तो सब जगह–नृत्यमय है; नाच रहा है। उदास…? तुमने किसी वृक्ष को उदास देखा? और तुमने किसी पक्षी को निराश देखा? चांदत्तारों में तुमने उदासी देखी? और अगर कभी देखी भी हो, तो खयाल रखना: तुम अपनी ही उदासी को उनके ऊपर आरोपित करते हो। अहंकार है कारण–उदासी और निराशा का। निराशा का क्या अर्थ होता है? निराशा का अर्थ होता है: तुमने आशा बांधी होगी, वह टूट गई। अगर आशा न बांधते, तो निराशा न होती। निराशा आशा छी छाया है। आदमी भर आया बांधता है; और तो कोई आशा बांधता ही नहीं। आदमी ही कल की सोचता है, परसों की सोचता है, भविष्य को सोचता है। सोचता है, आयोजन करता है बड़े कि कैसे विजय करूं, कैसे जीतूं?कैसे दुनिया की दिखा दूं कि मैं कुछ हूं? कैसे सिकंदर बन जाऊं? फिर नहीं होती जीत, तो निराशा हाथ आती है। सिकंदर भी निराश होकर मरता है; रोता हुआ मरता है। जो भी आदमी आशा से जीएगा, वह निराश होगा। आशा का मतलब है: भविष्य में जीना; अहंकार की योजनाएं बनाना; और अहंकार...

ओशो : जन्म दिन पर मृत्यु को भी याद कर लें

जन्म दिन पर मृत्यु को भी याद कर लें   आज जन्म दिन के बहाने हम यहां इकट्ठा हुए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस आदमी के नाम के बहाने से। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आज अ का जन्मदिन है या ब का या स का। असल में समझना यह है कि जन्मदिन को हम उत्सव क्यों बना लेते हैं? उत्सव इसीलिए बना लेते हैं कि जीवन का तो कोई पता नहीं। अगर जीवन का पता हो तो प्रतिपल उत्सव हो जाए, फेस्टिवल हो जाए। लेकिन जीवन तो महोत्सव है। और जन्म उस महोत्सव की शुरुआत भर है। और यदि जो जीवन हम जी रहे हैं, वह आनंदमय नहीं है, तो फिर ऐसे जीवन की शुरुआत आनंद की बात कैसे हो सकती है? जीवन यदि दुखों से भरा हुआ है तो सिर्फ जन्म हो जाना आनंदपूर्ण नहीं हो सकता। लेकिन हम इस सच को झुठलाने में कुशल हैं। जीवन में दुख है, तो हम झूठे सुख कल्पित करते हैं कि जन्मदिन में बड़ा सुख है! क्योंकि अगर कहें कि जीवन में बड़ा सुख है, तो हमारी आंखें कह देंगी कि कहां है? अगर कहें कि जीवन में बड़ा आनंद है, तो हमारे पैर बता देंगे कि कैसे भला, हम तो नहीं नाच-गा रहे हैं। फिर हम सब एक-दूसरे को धोखा देने की योजना बनाते हैं। यह जो हमारी दुनिया है, यह झूठ की...