ओशो : बुद्ध हो जाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है
बुद्ध हो जाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है
वास्तव में, एक यंत्र की भांति जीना आपको सुविधापूर्ण लगता है। सचमुच एक यंत्र की भांति जीना आरामदेह है आप एक यांत्रिक प्रक्रिया में जीते हैं। आपको अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आपका शरीर, आपका मन एक मशीन की तरह काम करता है और इसमें वह कुशल भी है। और यह सजग न होना काफी सुविधापूर्ण है, क्योंकि जो वस्तुएं आपके चारों ओर फैली हैं, उनके प्रति सजग होना एक ऐसी संवेदनशीलता प्रदान करता है कि वह आपको बड़ी दुःख पूर्ण लगेगी।
बुद्ध हो जाना केवल आनंदपूर्ण हो जाना ही नहीं हैं, जहां तक बुद्ध का अपना संबंध है, वे आनंदपूर्ण हैं। वे आनंद के उच्चतम अनुभव कोप्राप्त करते हैं। किंतु साथ ही उन्हें इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है, क्योंकि अब वे इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि उनके चारों तरफ जो चीजें फैली हैं, वे उन्हें दुःख देती हैं। वे दूसरों के दुःख से पीड़ित होने लगते है। एक भिखारी आपको मिलता है। आप उसे बिना जाने ही निकल जाते हैं, कोई समस्या नहीं है। यह बिल्कुल सुविधापूर्ण है। यदि आज सजग हो जाते हैं, तब यह इतना आसान नहीं होगा। तब आपको ऐसा अनुभव होगा ही कि इसमें आपका भी हाथ है। आप भी इस कुरूप संसार के एक हिस्से हैं। जो कुछ हो रहा है उसके लिए आप भी जिम्मेवार हैं; चाहे कि फिर वह वियतनाम का युद्ध हो, और चाहे हिंदू-मुसलमान का झगड़ा अथवा गरीबी हो। यदि आप सजग हो जाते हैं तो जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए आप भी जिम्मेवार हो जाते हैं। अब उससे बचना मुश्किल है। यह कीमत है जो कि चुकानी ही पड़ती है।
इसलिए ऐसा कभी न सोचें कि बुद्ध सिर्फ एक आनंदमय स्थिति में ही रहते हैं। कोई भी नहीं हो सकता। प्रत्येक को कीमत चुकानी ही पड़ती है, और जितना बड़ा अनुभव होता है, उतनी ही बड़ी कीमत भी देनी पड़ती है। एक बुद्ध अपने में शांतिपूर्ण हैं। वे इस आनंद को पहुंचते हैं, क्योंकि वे इतने चैतन्य को उपलब्ध हुए। परंतु साथ ही, इतने चैतन्य के कारण ही, वे इतने संवेदनशील भी हो जाते हैं कि चीज के कारण जो कि उनके चारों तरफ होती है, वे दुःख पाते हैं।
इसलिए यह सुविधापूर्ण है कि हम अचेतन, बिना जागे हुए लोगों की तरह ही जिए। हम जीते चले जाते हैं, हम इस निद्रा को लंबी करते चले जाते हैं। यह एक गहरी नींद में चलना है। गहरी नींद में सोए हुए ही हम चले जाते हैं और काम करते चले जाते हैं। हमको कुछ भी नहीं छूता। हम पूर्णतः संवेदनहीन हैं। संवेदनशीलता सजगता पर निर्भर करती है। जितने अधिक आप सजग होते जाते हैं, उतने ही अधिक आप संवेदनशील होते चले जाते हैं। संवेदनशील होना खतरनाक है और असंवेदनशील होना सुविधापूर्ण है। इसलिए आप एक मत बोझ भी तरह चलते रह सकते हैं। आपको कोईचिंता की जरूरत नहीं रहती।
इस सुविधा के कारण ही हम बीज के बीज ही रह जाते हैं। मेरे लिए इस सुविधा को खोना, इसे फेंकना ही एकमात्र त्याग है। वास्तव में इस आराम को, इस सुविधा को ही फेंकना है-न कि घर को, कुटुंब को। घर-कुटुंब तो कुछ भी नहीं हैं। इस सुविधा-केंद्रित चित्त को ही फेंकना है। आप को भी, संवेदना-शील होना पड़ेगा उसके प्रति जो कुछ भी चारों ओर है। तभी केवल आप सजग हो सकते हैं।
ओशो
आत्म पूजा उपनिषद-(प्रवचन-17)
प्रवचन-सत्रहरवां
चेतना की पूरी खिलावट
बंबई, रात्रि, दिनांक 5 जून, 1972
चिदाषितः पुष्पम।
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