ओशो : जिंदा परमात्मा को पूजो
जिंदा परमात्मा को पूजो
तुम अगर गौर से देखोगे तो तुम परमात्मा को हर जगह गत्यात्मक पाओगे। लेकिन तुमने झूठे परमात्मा खड़े किए हैं। मंदिरों में पत्थरों की मूर्तियां बना ली हैं, वे ठहरी हैं वहीं की वहीं। उनसे तो तुम्हीं थोड़े ज्यादा परमात्मा हो। चलते तो हो;उठते-डोलते तो हो; तुम्हारे जीवन में कुछ गीत तो है--सुबह कहीं, सांझ कहीं! मंदिर का तुम्हारा भगवान तो वहीं का वहीं पड़ा है।
अच्छा हो कि तुम फूलों को पूजो! लेकिन तुम उलटे आदमी हो। तुम जिंदा फूलों को तोड़कर मुर्दा परमात्माओं के चरणों में रख आते हो। इससे तो अच्छा होता कि अपने मुर्दा परमात्मा को उठा कर फूलों के चरणों में रख देते।
गति को पूजो, अगति को नहीं!
अगति जड़ता है।
प्रवाह को पूजो, पत्थरों को नहीं!
लेकिन पत्थर से तुम्हारा रास बैठ जाता है, क्योंकि तुम जड़ हो। तुमने अकारण ही पत्थर के भगवान नहीं बना लिए हैं; वे तुम्हारी जड़ता के सूचक हैं, सबूत हैं। तुमने अपनी ही छवि में उनको ढाल लिया है। तुमने अपनी ही प्रतिमाएं गढ़ ली हैं--तुमसे भी ज्यादा मुर्दा!
थोड़ा पहचानो! थोड़ा जागो!
गत्यात्मक को पूजो!
देखो! चांद चलता है, सूरज चलता है, तारे चलते हैं। कुछ ठहरा हुआ नहीं है!
इस जीवन को अगर तुम गौर से देखोगे तो कुछ ठहरी हुई कोई भी चीज न पाओगे। यहां सब चल रहा है।
तुम इतनी जल्दी में क्यों हो ठहर जाने की?
यह ठहर जाने की आकांक्षा आत्मघाती है, सुसाइड है। तुम मरना चाहते हो।
जियो! हिम्मत करो जीने की! और जितनी तुम्हारी हिम्मत बढ़ेगी जीने की उतना बड़ा जीवन तुम्हें उपलब्ध होगा--उसका अर्थ है, उतनी बड़ी चुनौती आएगी; उतनी पीड़ा उतरेगी; उतने बड़े पहाड़ों को चढ़ने का अवसर मिलेगा।
और यह अवसर कभी समाप्त नहीं होता। यह समाप्त हो जाता तो दुर्भाग्य था।
ओशो
भक्ति सूत्र
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