ओशो : ध्यान के लिए समय कहां !

ध्यान के लिए समय कहां !

मेरे पास लोग आते हैं। कहते हैं : मन अशांत है, शांति चाहिए। अगर मैं उन्हें कहूं ध्यान करो, वे कहते हैं : समय कहां! अशांत होने को समय है, अशांत होने में चौबीस घंटे लगाते हैं-शांत होने को समय कहां!

मैं उनसे पूछता हूं : ‘कभी फिल्म देखते है?’

‘हां -हां, कभी जाना पड़ता है। बच्चे हैं, पत्नी है, मित्र हैं। ‘

‘रोटरी क्लब जाते हैं?’

‘जाना ही पड़ता है; सदस्य हूं। ‘ रोटरी क्लब भी जा सकते हैं, फिल्म भी देख सकते हैं, क्रिकेट मैच भी देखते हैं, रेडियो भी सुनते हैं, टेलीविजन भी देखते हैं, अखबार भी पढ़ते हैं-कचरा अखबार! जिसमें सिवाय कचरे के और कुछ भी नहीं होता। और वही कचरा दोहरता रहता है रोज। सबके लिए समय है और ध्यान की बात उठती है तो बस एकदम से समय कहां है! और ये वे ही लोग हैं जिनको तुम ताश खेलते देखोगे और अगर पूछो कि क्या कर रहे हो, तो कहते हैं : समय नहीं कटता, समय काट रहे हैं! एक तरफ समय नहीं कटता, ताश के पत्ते खेलते हैं, ताश के राजा-रानी उनसे उलझते हैं। समय नहीं कटता, शतरंज बिछाते हैं। लकड़ी के हाथी- घोड़े, उनको दौड़ाते हैं। कहो ध्यान; समय कहां है।

और जब वे कहते हैं समय कहां है, तो ऐसा मत सोचना कि वे जानकर धोखा दे रहे हैं। वे मानते हैं कि समय कहां है। उनकी आखों से बिलकुल ईमानदारी मालूम पड़ती है। वे कोई ऐसा नहीं कह रहे कि आपको धोखा दे रहे हैं। नहीं, उनको पक्का भरोसा है कि समय है ही कहां। सोने को समय है। सब कामों के लिए समय है। लड़ने -झगडने को समय है। गपशप करने को समय है। सिर्फ ध्यान के लिए समय नहीं है!

तुम परमात्मा के लिए एक घंटा भी नहीं देना चाहते, तो चूकोगे, बहुत बुरी तरह चूकोगे, बहुत पछताओगे! और फिर पछताये होत का जब चिड़िया चुग गई खेत! मौत ने अगर द्वार पर दस्तक दे दी, तब बहुत पछताओगे। क्योंकि उस क्षण में जितना समय ध्यान के लिए दिया था वही बचा हुआ सिद्ध होता है और जो और तरह गया वह गया। वह गया, नाली मैं बह गया! जो ध्यान में लगाया था वही बच जाता है। परमात्मा के सामने तुमने जो ध्यान में समय बिताया था, बस उसका ही लेखा है, बाकी कुछ नहीं लिखा जाता। बाकी तो सब दो कौड़ी का है, उसका कोई मूल्य नहीं है।

तुम परमात्मा के सामने खड़े हो कर यह नहीं कह सकोगे कि रोज टेनिस खेलने जाता था, कि इतनी फिल्में देखीं, कि एक फिल्म नहीं छोड़ी।

एक सज्जन को तो मैं जानता हूं, मेरे छोटे गांव में, वहां एक ही सनेमागृह है, एक फिल्म आती है तो चार -पांच दिन चलती है, वे एक ही फिल्म चार -पांच दिन देखते हैं। उनसे मैंने पूछा : एक ही फिल्म चार -पांच दिन देखना बड़ी हिम्मत की बात है! आदमी एकाध ही बार देखने से… हिंदी फिल्में और करीब-करीब दूसरी फिल्मों से ही, उनकी ही चोरी और उन्हीं का पुरुक्तिकरण होता है। तुम एक ही फिल्म पांच बार देखते हो!

उन्होंने कहा। देखता कौन है! मगर न जायें तो करें क्या? न जायें तो जायें कहां? समय कट जाता है। कभी-कभी सो भी लेते हैं वहां , कभी देख भी लेते हैं। और मालूम भी है कि अब यह फिल्म तो दो दफे देख ली तो इसका पता है, क्या-क्या होने वाला है। लेकिन फिर भी जायें तो कहां जायें? तुम देखते हो जीवन कैसा रिक्त है, कैसा खाली है! और हंसना मत उन पर, क्योंकि तुम भी यही कर रहे हो अलग- अलग ढंग से। वही जो तुमने कल किया था, आज भी करोगे। और वही तुमने परसों भी किया था, वही तुमने नरसों भी किया था। पुनरुक्ति ही तो तुम्हारा जीवन है। तुम दोहराते ही तो रहते हो। सुबह से सांझ तक एक कोलहू के बैल की तरह घूमते रहते हो। वही झगड़े वही प्रेम, वही मनाना, वही बुझाना! वही हार, वही जीत, वही अकड़! बस वही है! वही क्रोध, वही संबंध। अंतर क्या है?

अगर तुम अपनी जिंदगी को जरा गौर से देखो तो तुम पाओगे एक पुनरुक्ति है। लेकिन तुम देखते भी नहीं, क्योंकि देखोगे तो बहुत ऊब पैदा होगी, बहुत घबड़ाहट होगी। तुम देखते ही नहीं, भागे चले जाते हो- इस आशा में के कोल्ह के बैल नहीं हो, कहीं पहुंच रहे हो, अब पहुंचे तब पहुंचे।

जीवन की अंतिम घड़ी में बहुत रोओगे। मौत के कारण नहीं; वह जो जीवन गंवाया, उसके कारण। अभी समय है। अभी थोड़े से क्षण परमात्मा को देना शुरू कर दो। अभी एक घंटे – भर बस बैठ ही रहो। और बहुत बाधायें आयेंगी।

मगर एक काम न चूके, एक बात न चूके-एक घंटा कम-से -कम परमात्मा को दे दो। एक घंटा चुपचाप बैठ जाओ साक्षी होकर, मन की सारी गतिविधियों को देखते रहो। देखते -देखते तीन महीने से नौ महीने के बीच में साक्षी का भाव उफान शुरू हो जाता है। और जिस दिन पहली बार को भी तुम्हारे भीतर’साक्षी’ की अनुभूति होगी, और पहली दफे बासुरी सुनाई पड़ेगी क्षण भर सा शब्द नाच गुनगुना पड़ी! पहली दफा नाद का अनुभव होगा! और पहली दफे स्वाद मिलेगा-वास्तविक जीवन का, शाश्वत जीवन का! उस जीवन का ही दूसरा नाम परमात्मा है। 

ओशो 

हंसा तो मोती चूने
प्रवचन 4

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