ओशो : तंत्र विज्ञान है

तंत्र विज्ञान है 

एक प्रश्न अपने साथ एक उत्तर लाता है और साथ ही अनेक प्रश्न भी । संदेह करने वाला मन ही समस्या है । 

पार्वती कहती हैं : मेरे प्रश्नों की फिकर न करें । मैंने अनेक प्रश्न पूछ लिए : आपका सत्य रूप क्या है ? समय और स्थान से परे होकर हम उसमें पूरी तरह प्रवेश कैसे करें ? लेकिन मेरे प्रश्नों की फिकर न करें । मेरे संशय निर्मूल करें । ये प्रश्न तो मैं इसलिए पूछती हूं कि वे मेरे मन में उठते हैं । मैं आपको केवल अपना मन दिखाने के लिए ये प्रश्न पूछती हूं । उन पर बहुत ध्यान मत दें । उत्तरों से मेरा काम नहीं चलेगा । मेरी जरूरत तो है कि मेरे संशय निर्मूल हों ।  

लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगे ? किसी उत्तर से ? क्या कोई उत्तर है जो कि मन के संशय दूर कर दे ? मन ही तो संशय है । जब तक मन ही मिटता है , संशय निर्मूल कैसे होंगे ?  

शिव उत्तर देंगे । उनके उत्तर में सिर्फ विधियां हैं - सबसे पुरानी , सबसे प्राचीन विधियां । लेकिन तुम उन्हें अत्याधुनिक भी कह सकते हो , क्योंकि उनमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता । वे पूर्ण हैं - एक सौ बारह विधियां । उनमें सभी संभावनाओं का समावेश है ; मन को शुद्ध करने के , मन के अतिक्रमण के सभी उपाय उनमें समाए हैं । शिव की एक सौ  बारह विधियों में एक और विधि नहीं जोड़ी जा सकती । और यह ग्रंथ , विज्ञान भैरव तंत्र , पांच हजार वर्ष पुराना है । उसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता ; कुछ जोड़ने की गुंजाइश ही नहीं है । यह सर्वागीण है , संपूर्ण है , अंतिम है । यह सब से प्राचीन है और साथ ही सबसे आधुनिक , सबसे नवीन । पुराने पर्वतों की भांति ये तंत्र पुराने हैं , शाश्वत जैसे लगते हैं , और साथ ही सुबह से सूरज के सामने खड़े ओस - कण की भांति ये नए हैं , ये इतने ताजे हैं । 

ध्यान की इन एक सौ बारह विधियों से मन के रूपांतरण का पूरा विज्ञान निर्मित हुआ है । एक - एक कर हम उनमें प्रवेश करेंगे । पहले हम उन्हें बुद्धि से समझने की चेष्टा करेंगे । लेकिन बुद्धि को मात्र एक यंत्र की तरह काम में लाओ , मालिक की तरह नहीं । समझने के लिए यंत्र की तरह उसका उपयोग करो , लेकिन उसके जरिए नए व्यवधान मत पैदा करो । 

जिस समय हम इन विधियों की चर्चा करेंगे , तुम अपने पुराने ज्ञान को , पुरानी जानकारियों को एक किनारे धर देना । उन्हें अलग ही कर देना ; वे रास्ते की धूल भर हैं ।

इन विधियों का साक्षात्कार निश्चय ही सावचेत मन से करो ; लेकिन तर्क को हटा कर करो । इस भ्रम में मत रहो कि विवाद करने वाला मन सावचेत मन है । वह नहीं है । क्योंकि जिस क्षण तुम विवाद में उतरते हो , उसी क्षण सजगता खो देते हो , सावचेत नहीं रहते हो । तुम तब यहां हो ही नहीं । 

ये विधियां किसी धर्म की नहीं हैं । याद रखो , वे ठीक वैसे ही हिन्दू नहीं हैं जैसे सापेक्षवाद का सिद्धांत आइंस्टीन के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण यहूदी नहीं हो जाता , रेडियो और टेलीविजन ईसाई नहीं हैं । कोई कहता है कि बिजली ईसाई है , क्योंकि ईसाई मस्तिष्क ने उसका आविष्कार किया था । विज्ञान किसी वर्ण या धर्म का नहीं है । और तंत्र विज्ञान है । इसलिए स्मरण रहे कि तंत्र हिंदू कतई नहीं है । ये विधियां हिंदुओं की ईजाद अवश्य हैं , लेकिन वे स्वयं हिंदू नहीं हैं । इसलिए इन विधियों में किसी धार्मिक अनुष्ठान का उल्लेख नहीं रहेगा । किसी मंदिर की जरूरत नहीं है । तुम स्वयं मंदिर हो । तुम ही प्रयोगशाला हो , तुम्हारे भीतर ही पूरा प्रयोग होने वाला है । और विश्वास की भी जरूरत नहीं है । 

ओशो 

तंत्र-सूत्र 1


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