ओशो : सदगुरुओं ने सिद्धात नहीं दिये हैं, सदगुरुओं ने दृष्टि दी है।
सदगुरुओं ने सिद्धात नहीं दिये हैं, सदगुरुओं ने दृष्टि दी है। सिद्धात थोड़ी दूर काम पड़ सकते हैं। ऐसा समझो एक अंधा आदमी तुम से पूछता है कि मुझे स्टेशन जाना है, कैसे जाऊं? तुम उसे सब समझा देते हो कि पहले बाएं रास्ते से चलना मील भर, फिर दाएं मुंडू जाना, फिर मील भर चलना, फिर बाएं मुड़ जाना; तुम उसे सब समझा देते हो; फिर भी पक्का नहीं है कि अंधा पहुंच पाएगा— अंधा आखिर अंधा है। कब मील पूरा हुआ, कैसे जानेगा? आधा मील पर ही मुड़ जाए, कि डेढ़ मील तक चलता चला जाए! सदगुरु अंधे को सूचनाएं नहीं देते, सदगुरु कहते है—यह अंजन लो, आंख पर आज लो, इससे तुम्हें दिखायी पड़ेगा। फिर तुम खुद ही जानोगे, राह के किनारे पत्थर लगे हैं वह इशारा बताते है कि स्टेशन कितनी दूर, तुम खुद ही पहुंच जाओगे। दृष्टि चाहिए।
मैं तुमसे दृष्टि की बात कर रहा हूं। तुम इस तरह से अपने जीवन की परीक्षा में लग जाओ—जो भी करते हो, इतनी ही बात सोचकर करो कि इससे मेरा संगीत गहन होगा? बस। अगर संगीत गहन होता है, फिकर छोड़ो दुनिया के शास्त्रों की और फिकर छोड़ो दुनिया के सिद्धातो की, उनका कोई मूल्य नहीं है; वे तुम्हारे लिए बनाये भी नहीं गये, जिनके लिए बनाये गये थे वे लोग अब हैं भी नहीं।
कोई वेद में जाकर अपना सिद्धात खोजता है। वेद पांच हजार साल पहले लिखे गये— और अगर लोकमान्य तिलक की माने तो पनचानबे हजार साल पहले लिखे गये। अगर लोकमान्य तिलक सही हैं, तो वेद उतने ही व्यर्थ हो गये, ज्यादा व्यर्थ हो गये, क्योंकि पनचानबे हजार साल पहले जिस आदमी से कहे गये थे वह आदमी अब नहीं है। पांच हजार साल भी काफी समय हो गया, जिंदगी बहुत बदल गयी है। जिंदगी ने नये रूप ले लिये हैं, नये मोड़ ले लिये हैं। जिन मोड़ों का कोई पता नहीं था वेद लिखने वालों को—हो भी नहीं सकता था—इन नये मोड़ों पर नयी घटनाएं घट गयी हैं।
अब जैसे समझो, जैन—मुनि वाहन में नहीं चलता। यह बात महावीर के समय में समझ में आती थी, क्योंकि वाहन का मतलब था घोड़े जुते होंगे, बैल जुते होंगे—बैलगाड़ी होगी, कि घोड़ागाड़ी होगी, और तो कोई वाहन था नहीं। बैलों पर कोड़े पड़ेंगे। महावीर ने कहा—यह हिंसा है। अपने पैर से जितना बन सके, चल लो। यह ज्यादती है। यह बैल पर सवार होना, यह घोड़े पर सवार होना ज्यादती है। यह तुम इन निरीह पशुओं के साथ अन्याय कर रहे हो। यह बात समझ में आती है। इससे भीतर का छंद टूटेगा।
जब भी तुम किसी को गुलाम बनाओगे, वह चाहे पशु हो, चाहे पक्षी हो, चाहे मनुष्य हो, जब भी तुम किसी को गुलाम बनाओगे, तुमने अपनी ही गुलामी का जाल रचा। तुमने जब किसी के लिए गड्डा खोदा, गड्डा तुम्हारे लिए खुदा। आखिर बैल का भी तो प्राण है, आत्मा है, संवेदना है! तुम मजे से बैठे हो, तुम को बैल ढो रहा है—जैसे बैल सिर्फ तुम्हें ढोने के लिए पैदा हुआ है! अगर बैलों की दुनिया होती, तो तुम बैलों को ढोते तुम जुते होते।
यह तो बात ठीक थी, लेकिन अब जैन—मुनि कार में भी नहीं बैठ सकता—क्योंकि वाहन का इनकार है। अब महावीर को कार का कुछ पता नहीं था कि एक दिन ऐसी घड़ी आ जाएगी कि न घोड़ा जुतेगा, न बैल जुतेगा—हार्स तो चला जाएगा, हार्स पावर आएगा—इसका कुछ पता नहीं था। अब यह जैन—मुनि अभी भी पैदल चल रहा है। अब यह बात जरा मूढ़ता की हो गयी। अब कार में चलने में कोई अड़चन नहीं, कोई हिंसा नहीं। लेकिन घबड़ाहट लगती है उसे, उसके शास्त्र में लिखा है। शास्त्र के विपरीत कैसे जाए?
शास्त्र सदा पैर की जंजीर हो जाते हैं। समय बीता कि पैर की जंजीर हुए। फिर उन में तुम देखोगे तो उलझोगे। और दो ही उपाय बचते हैं फिर। एक उपाय तो बचता है, उनकी मानकर चलो और मूढ़ रहो। और दूसरा उपाय यह बचता है कि उन को ऊपर—ऊपर मानते रहो और भीतर— भीतर मत मानो, तब पाखंडी हो जाते हो। दोनो हालत में हानि होती है। अब तो आकाश में उड़ता है हवाई जंहाज, पैदल चलकर जितनी हिंसा होती है उतनी हिंसा भी नहीं होती। पैदल भी चलोगे तो पैर तो जमीन पर पड़ता है न, कीड़े—मकोड़े, छोटे—मोटे जीव—जंतु तो दबते ही हैं! महावीर ने उसकी भी चिंता की है—सूखी जमीन में चलना, गीली जमीन में मत चलना; वर्षा में मत चलना;इसलिए वर्षा में जैन—मुनि नहीं चलते। लेकिन हवाई जंहाज में उड़ो। जमीन से कोई संबंध ही न रहा। हेलिकाप्टर में जाओ। न पैर पड़ेगा जमीन पर, न कोई कीड़ा मरेगा। फिर वर्षा हो कि गर्मी, कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन जैन—मुनि अटका है, क्योंकि वाहन है। वह शब्द जान ले रहा है—यह भी वाहन है, और वाहन का विरोध है! मैंने सिर्फ उदाहरण के लिए तुम से कहा।
शास्त्र सदा रुकावट का कारण हो जाते है। और निर्बुद्धि के लिए तो बहुत ज्यादा रुकावट के कारण हो जाते है। गले की फासी लग जाती है, जीना असंभव हो जाता है। महावीर ने कहा—रात भोजन मत करना। ठीक कहा, बिजली का उन्हें कुछ पता नहीं था। रात अभी भी तुम जाओ इस देश को गांवो में —ठेठ देहातों में जहां बिजली नहीं है, जंहा केरोसिन का तेल भी मिलना मुश्किल है;इतनी सामर्थ्य भी नहीं है कि केरोसिन का तेल खरीदें—लोग अंधेरे में भोजन करते हैं। महावीर ने जब कहा तो सारे लोग अंधेरे में भोजन कर रहे होंगे। अंधेरे मे भोजन करना जरूर खतरनाक है। खुद के लिए भी, कीड़े—मकोड़ों के लिए भी;पतिंगों के लिए भी, मच्छरों के लिए भी, और हिंसा हो जाएगी। हिंसा भी होगी और विषाक्त भी हो सकता है भोजन। लेकिन आज तो दिन की रोशनी रात में भी उपलब्ध है। दिन से भी ज्यादा रोशनी चाहो तो उतनी उपलब्ध हो सकती है। अब यह बात व्यर्थ हो गयी। मगर रात्रि भोजन का निषेध है, इसलिए रात्रि भोजन नहीं किया जा सकता।
तुम अपने छंद से परखो। आंख खोलकर देखो, अपने जीवन की जांच करते रहो, जहां तुम्हें लगे कि यह बात मेरे आनंद से जुड़ती है और इससे मेरा आनंद विकासमान होगा, वही शुभ। और जिससे तुम्हारा आनंद खंडित होता है, वही अशुभ।
फिर पूछा है—शुभाशुभ के पार क्या है? छंद बंधे तो शुभ, छंद टूटे तो अशुभ, और जब छंद ऐसा हो जाए कि टूटने की संभावना ही न रहे, तुम ही छंद हो जाओ, छंद तुम्हारी नियति हो जाए, तुम्हारा स्वभाव हो जाए, तब शुभाशुभ के पार। फिर चिंता की भी जरूरत नहीं कि क्या करूं, क्या न करूं? फिर उस छंद से जो होता है, वह सब ठीक ही होता है।
साधु और संत की परिभाषा में यही भेद है। असाधु वह, जो अशुभ करता है। साधु वह, जो शुभ करता है। संत वह, जिससे शुभ होता है, अशुभ नहीं होता—करने के पार चले गये। करने में तो सोचना पड़ता है —ऐसा करूं या न करूं? निर्णय लेना पड़ता है, विकल्प होता है। विकल्प मे कभी भूल भी हो सकती है। विकल्प मे कभी चूक भी हो सकती है। आखिर विचार से ही किया जा रहा है, विचार में भ्रांतियां हैं। संत की दशा का अर्थ होता है—अब न शुभ की चिंता है, न अशुभ की चिंता है। छंद ऐसा बंधा है कि अब टूट ही नहीं सकता।
तुम संत को नर्क में भी फेंक दो तो भी वह स्वर्ग में होगा। छंद ऐसा बंधा है कि अब नर्क भी उसे तोड़ नहीं सकता। तुम संत को बाजार में बिठा दो, तो भी उसके ध्यान में भंग नहीं है। छंद ऐसा बंधा है, अब हिमालय की गुफा पर ही बैठने की कोई जरूरत नहीं है। अब डर ही नहीं रहा। अब छंद से भेद नहीं रहा कि मैं अलग और छंद अलग, सम्हाले रहूं। अब संगीतज्ञ अलग नहीं है, अब संगीतज्ञ अपना संगीत हो गया। वह आखिरी दशा है। उसी को परमहंस कहा है। उसी को शांडिल्य ने भक्ति कहा है, परम भक्ति, जहां भक्त और भगवान एक हो जाते है—पराभक्ति जंहा भक्त और भगवान एक हो गए, फिर कौन सी चिंता कि ऐसा करूं कि वैसा करूं करने वाला रहा ही नहीं, अब भगवान करता है।
अब तुम तो मिट ही गये। अब तो भूल हो ही नहीं सकती, क्योंकि बुनियादी भूल मिट गयी—मैं होने की भूल ही मिट गयी। उस मैं से और—और भूलें पैदा होती थीं। अब चिंता की कोई जरूरत नहीं, अब निश्चित होकर जी सकते हो। इसलिए उस परमदशा में संत बालवत हो जाता है।
छोटे बच्चे जैसा हो जाता है—न कुछ शुभ है, न कुछ अशुभ है। उसे पता ही नहीं कि क्या शुभ है, क्या अशुभ है।
ओशो
अथातो भक्ति जिज्ञासा
प्रवचन 12
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