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ओशो : ऊर्जावान ध्यान कक्ष

 ऊर्जावान ध्यान कक्ष जिस कमरे में आप करें इस प्रयोग को, अगर उस कमरे को संभव हो सके आपके लिए, तो फिर इसी प्रयोग के लिए रखें, उसमें कुछ दूसरा काम न करें।  छोटी कोठरी हो, ताला बंद कर दें, उसमें सिर्फ यही प्रयोग करें। और अगर घर के दूसरे लोग भी उसमें आना चाहें तो वह प्रयोग करने के लिए आएं तो ही आ सकें, अन्यथा उसे बंद कर दें।  नहीं संभव हो सके तो बात अलग है। संभव हो सके तो इसके बहुत फायदे होंगे। वह कमरा चार्जड हो जाएगा। वह रोज आप जब उसके भीतर जाएंगे तो आपको पता चलेगा कि साधारण कमरा नहीं है।  क्योंकि हम पूरे समय अपने चारों तरफ रेडिएशन फैला रहे हैं। हमारे चारों तरफ हमारी चित्त—दशा की किरणें फिंक रही हैं। और कमरे और जगहें भी किरणों को पी जाती हैं। और इसीलिए हजारों—हजारों साल तक भी कोई जगह पवित्र बनी रहती है।  उसके कारण हैं। अगर वहां कभी कोई महावीर या बुद्ध या कृष्ण जैसा व्यक्ति बैठा हो, तो वह जगह हजारों साल के लिए और तरह का इम्पैक्ट ले लेती है, उस जगह पर खड़े होकर आपको दूसरी दुनिया में प्रवेश करना बहुत आसान हो जाता है। तो जो संपन्न हैं……. और संपन्न का मैं तो एक ही लक्षण म...

ओशो : कल्पना ध्यान

 कल्पना ध्यान "कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना"एक ध्यान विधि सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें– आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण– जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा– कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें। सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं। जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो , तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना है ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक दूसरे में घुलमिल जाएं। किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में निषेधात्मक कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं...

ओशो : शून्य का अर्थ

 *शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामर्थ्य.*...... शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामथ्र्य। एक व्यक्ति एक मंदिर में किसी दूर देश में हाथ जोड़कर बैठा हुआ है। परदेशी यात्री ने भीतर आकर उससे पूछा, क्या आप प्रार्थना कर रहे हैं? उस व्यक्ति ने कहाः कैसी प्रार्थना, किसकी प्रार्थना? परदेशी हैरान हुआ होगा। पूछा, भगवान की प्रार्थना करते होंगे। उसने कहाः मैं इतना छोटा हूं कि मुझे भगवान का कोई पता नहीं। किसी चीज को मांगने के लिए प्रार्थना करते होंगे? उसने कहाः कितना ही मांगें और कितना ही इकट्ठा करें, मौत सब छीन लेती है, इसलिए मांगने का मोह चला गया। क्या मांगें? जब सब छिन ही जाता है तो मांगने में कोई अर्थ न रहा। उस आदमी ने कहाः फिर भी आप प्रार्थना तो कर ही रहे हैं? उस आदमी ने कहाः कैसे कहूं कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं? अब तक बहुत अपने भीतर खोजा, किसी मैं को तो पा ही नहीं सका।  *यह जो क्षण है, ऐसा चित्त की दशा का। न कोई परमात्मा का ख्याल है, न कुछ मांगने का, न अपना। यह शून्य, खाली, यह नॉन-बीइंग की अवस्था है, यह नथिंगनेस। जीवन में स्वतंत्रता आए, सरलत...

ओशो : लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक गुप्त सूत्र ।

 संतुलन ध्यान -एक गुप्त ध्यान विधि लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक गुप्त सूत्र आपको कहता हूं, जो उसकी किताबों में उलेखित नहीं है, लेकिन कानों-कान लाओत्से की परंपरा में चलता रहा है। वह सूत्र है लाओत्से की ध्यान की पद्धति का। वह सूत्र यह है। लाओत्से कहता है कि पालथी मार कर बैठ जाएं और भीतर ऐसा अनुभव करें कि एक तराजू है, बैलेंस, एक तराजू। उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच, तीसरी आंख जहां समझी जाती है, वहां उसका कांटा है। तराजू की डंडी आपके मस्तिष्क में है। दोनों उसके पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं। और लाओत्से कहता है, चौबीस घंटे ध्यान रखें कि वे दोनों पलड़े बराबर रहें और कांटा सीधा रहे। लाओत्से कहता है कि अगर भीतर उस तराजू को साध लिया, तो सब सध जाएगा। लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे! जरा इसका प्रयोग करेंगे, तब आपको पता चलेगा। जरा सी श्वास भी ली नहीं कि एक पलड़ा नीचा हो जाएगा, एक पलड़ा ऊपर हो जाएगा। अकेले बैठे हैं, और एक आदमी बाहर से निकल गया दरवाजे से। उसको देख कर ही, अभी उसने कुछ किया भी नहीं, एक पलड़ा नी...

ओशो : शून्य कैसे हो ? एक सरल ध्यान विधि ।

 शून्य कैसे हों? ओशो एक ध्यान विधी। शून्य से पूर्ण का दर्शन होता है। और शून्य आता है विचार-प्रक्रिया के तटस्थ, चुनावरहित साक्षी-भाव से। विचार में शुभाशुभ का निर्णय नहीं करना है। वह निर्णय राग या विराम लाता है। किसी को रोक रखने और किसी को परित्याग करने का भाव उससे पैदा होता है। वह भाव ही विचार-बंधन है। वह भाव ही चित्त का जीवन और प्राण है। उस भाव के आधार पर ही विचार की श्रृंखला अनवरत चलती जाती है। विचार के प्रति कोई भी भाव हमें विचार से बांध देता है। उसके तटस्थ साक्षी का अर्थ है, विचार को निर्भाव के बिंदु से देखना। विचार को निर्भाव के बिंदु से देखना ध्यान है। बस, देखना है, “जस्ट सीइंग” और चुनाव नहीं करना है, और निर्णय नहीं लेना है। यह–“बस देखना”–बहुत श्रमसाध्य है। यद्यपि कुछ करना नहीं है, पर कुछ न कुछ करते रहने की हमारी इतनी आदत बनी है कि “कुछ न करने” जैसा सरल और सहज कार्य भी बहुत कठिन हो गया है। बस, देखने-मात्र के बिंदु पर स्थिर होने से क्रमशः विचार विलीन होने लगते हैं। वैसे ही, जैसे प्रभात में सूर्य के उत्ताप में दूब पर जमे ओसकण वाष्पीभूत हो जाते हैं। बस, देखने का उत्ताप विचारों के...
 #Osho से #Incest सबंधो पर पूछा गया एक सवाल का जवाब। *ओशो को फ्री सेक्स (मुक्त-यौन संबंध) के हिमायती बताएं जाते है। तो क्या वास्तव में ओशो मुक्त योन संबंध के हिमायती थे? और क्या अर्थ है मुक्त योन सबंध का?* ओशो से पूछा गया प्रश्न :  "मुक्त यौन-संबंध" के अंतर्गत क्या पिता-पुत्री और मां-बेटे के बीच भी यौन-संबंध हो सकता है? यदि नहीं तो क्यों नहीं? ओशो : - यह प्रश्न उन्होंने इतनी बार पूछा है कि मुझे शक है, तुम्हें अपनी मां से यौन-संबंध करना है कि अपनी बेटी से, किससे करना है? यह प्रश्न इतनी बार तुम क्यों पूछ रहे हो? और यही प्रश्न हेतु है उन्हें पूना लाने का! तो जरूर यह मामला निजी होना चाहिए, व्यक्तिगत होना चाहिए। किससे तुम्हें यौन-संबंध करना है--मां से कि अपनी बेटी से? सीधी-सीधी बात क्यों नहीं पूछते फिर? फिर इसको इतना तात्विक रंग-ढंग देने की क्यों कोशिश करते हो? कम से कम ईमानदार अपने प्रश्नों में होना चाहिए। मां-बेटे का संबंध या बेटे और मां का संबंध अवैज्ञानिक है। उससे जो बच्चे पैदा होंगे, वे अपंग होंगे, लंगड़े होंगे, लूले होंगे, बुद्धिहीन होंगे। इसका कोई धर्म से संबंध नहीं है। यह स...

ओशो : "तीर्थ है, मंदिर है, उनका सारा का सारा विज्ञान है।

  "तीर्थ है, मंदिर है, उनका सारा का सारा विज्ञान है। और उस पूरे विज्ञान की अपनी सूत्रबद्ध प्रक्रिया है।…  एक भी कदम बीच में खो जाए, एक भी सूत्र बीच में खो जाए, तो परिणाम नहीं होता। जिन गुप्त तीर्थों की मैं बात कर रहा हूं उनके द्वार हैं, उन तक पहुंचने की व्यवस्थाएं हैं, लेकिन उन सबके आंतरिक सूत्र हैं। इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके।"—ओशो

ओशो : तीर्थ -- मिश्र के पिरामिड एक रहस्‍य

 तीर्थ--(मिश्र के पिरामिड एक रहस्‍य)    सब तीर्थ बहुत ख्‍याल से बनाये गए है। अब जै कि मिश्र में पिरामिड है। वे मिश्र में पुरानी  खो गई  सभ्‍यता के तीर्थ है। और एक बड़ी मजे की बात है कि इन पिरामिड के अंदर....। क्‍योंकि पिरामिड जब बने तब, वैज्ञानिको का खयाल है, उस काल में इलैक्ट्रिसिटी हो नहीं सकती।       आदमी के पास बिजली नहीं हो सकती। बिजली का आविष्‍कार उस वक्‍त कहां, कोई दस हजार वर्ष पुराना पिरामिड है, कई बीस हजार वर्ष पुराना पिरामिड है। तब बिजली का तो कोई उपाय नहीं था। और इनके अंदर इतना अँधेरा कि उस  अंधेरे में जाने का कोई उपाय  नहीं है। अनुमान यह लगाया जा सकता है कि लोग मशाल ले जाते हों, या दीये ले जाते हो। लेकिन धुएँ का एक भी निशान नहीं है इतने पिरामिड में कहीं । इसलिए बड़ी मुश्‍किल है। एक छोटा सा दीया घर में जलाएगें तो पता चल जाता है। अगर लोग मशालें भीतर ले गए हों तो इन पत्‍थरों पर कहीं न कहीं न कहीं धुएँ के निशान तो होने चाहिए।       रास्‍ते इतने लंबे, इतने मोड़ वाले है, और गहन अंधकार है। तो दो ही उपाय हैं, या तो हम ...

ओशो : शून्य से प्रवेश

 शून्य है दरवाजा  एक मकान में से  सामन को निकालना  शुरू कर दे,  सारा फर्नीचर  बाहर कर दे।  दरवाजे से  फोटुएं निकाल ले,  केलेंडर निकाल लें।  जब सब चीज़ें  निकल जाए तब भी  कुछ पीछे रह जाता है।  तब पीछे क्या रह जाता है ? खालीपन पीछे रह जाता है।  वह खालीपन ही मकान है ।  पीछे कुछ रह जाता है ?  खाली मकान  पीछे रह जाता है ।  और हम  उस खालीपन में चीज़ें  भरते चले जाएँ और  हम इतनी चीज़ें भर दें  की भीतर जाना  मुश्किल हो जाए ,  तो फिर मकान तो है ,  लेकिन भरा मकान है  जिसमें प्रवेश भी  नही पाया जा सकता । मन भी एक मकान है,  जिस मकान में हम  शब्दों को भरते चले जाते है ।  शब्द इतने भर जाते है की  फिर मन के भीतर प्रवेश  मुश्किल हो जाता है ।  कभी अपने भीतर गए है ?  सिवाय शब्दों के वहां  कुछ भी नही मिलेगा ।  भीतर जाएंगे और  शब्द ही शब्द  टकराते मिलेंगे ।  जैसे बाज़ार में चले जाएँ  और आदमी ही आदमी मिलेंगे, ...

ओशो : ध्यान क्या है ?

 ओशो द्वारा दिए गए ध्यान-प्रयोगों एवं ध्यान पर दिए गए प्रवचनांशों का संकलन। उद्धरण : ध्‍यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्‍ति - पहला खंड : ध्यान के विषय में - ध्यान क्या है? "साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो, यह बात गौण है। तुम वृक्षों को देख सकते हो, तुम नदी को देख सकते हो, बादलों को देख सकते हो, तुम बच्चों को आस-पास खेलता हुआ देख सकते हो। साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो यह बात नहीं है; विषय-वस्तु की बात नहीं है। देखने की गुणवत्ता, होशपूर्ण और सजग होने की गुणवत्ता--यह है ध्यान।  एक बात ध्यान रखें : ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो कुछ भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, यह प्रश्न नहीं, किंतु गुणवत्ता जो तुम कर्म में ले आते हो, उसकी बात है। चलना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक चलो। बैठना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक बैठ सको। पक्षियों की चहचहाहट को सुनना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक सुन सको। या केवल अपने भीतर मन की आवाजों को सुनना ध्यान बन सकता है, यदि तुम सजग और साक्षी रह सको। सारी बात यह है कि तुम सोए-सोए मत रहो। फिर जो भी हो, वह ध्यान होगा।...

ओशो : एक सुंदर कहानी

मैं एक छोटी सी कहानी कहूंगा। हिमालय की घाटियों में एक चिड़िया निरंतर रट लगाती है—जुहो! जुहो! जुहो! अगर तुम हिमालय गए हो तो तुमने इस चिड़िया को सुना होगा। इस दर्द भरी पुकार से हिमालय के सारे यात्री परिचित हैं। घने जंगलों में, पहाड़ी झरनों के पास, गहरी घाटियों में निरंतर सुनायी पड़ता है—जुहो! जुहो! जुहो! और एक रिसता दर्द पीछे छूट जाता है। इस पक्षी के संबंध में एक मार्मिक लोक—कथा है। किसी जमाने में एक अत्यंत रूपवती पहाडी कन्या थी, जो वर्ड्सवर्थ की लूसी की भांति झरनों के संगीत, वृक्षों की मर्मर और घाटियों की प्रतिध्वनियों पर पली थी। लेकिन उसका पिता गरीब था और लाचारी में उसने अपनी कन्या को मैदानों में ब्याह दिया। वे मैदान, जहां सूरज आग की तरह तपता है। और झरनों और जंगलों का जहां नाम—निशान भी नहीं। प्रीतम के स्नेह की छाया में वर्षा और सर्दी के दिन तौ किसी तरह बीत गए, कट गए, पर फिर आए सूरज के तपते हुए दिन—वह युवती अकुला उठी पहाड़ों के लिए। उसने नैहर जाने की प्रार्थना की। आग बरसती थी—न सो सकती थी, न उठ सकती थी, न बैठ सकती थी। ऐसी आग उसने कभी जानी न थी। पहाड़ों के झरनों के पास पली थी, पहाड़ों की शीतलता...

ओशो : माया से नहीं, मन से छूटना है ।

बोध कथा.......... माया से नहीं, मन से छूटना है । जापान की प्रसिद्ध कहानी है। एक आदमी की पत्नी मरी। पत्नियां, पहली तो बात, आसानी से मरतीं नहीं; अक्सर तो पतियों को मार कर मरती हैं। स्त्रियां ज्यादा जीती हैं, यह खयाल रखना--पांच साल औसत ज्यादा जीती हैं। आदमी को यह भ्रम है कि हम मजबूत हैं। ऐसी कुछ खास मजबूती नहीं। स्त्रियां ज्यादा मजबूत हैं। उनकी सहने की क्षमता, सहनशीलता आदमी से बहुत ज्यादा है। स्त्रियां कम बीमार पड़ती हैं; आदमी ज्यादा बीमार पड़ता है। स्त्रियां हर बीमारी को पार करके गुजर जाती हैं; आदमी हर बीमारी में टूट जाता है, कोई भी बीमारी तोड़ देती है उसे। और सारी दुनिया में स्त्रियां पांच साल आदमियों से ज्यादा जीती हैं--औसत। और फिर आदमियों को और एक अहंकार है कि समान उम्र की स्त्री से विवाह नहीं करते; पच्चीस साल का जवान हो तो उसे बीस साल की लड़की चाहिए। तो पांच साल का और फर्क हो गया। सो ये भैया दस साल पहले मरेंगे। इसलिए दुनिया में तुम्हें विधवाएं बहुत दिखाई पड़ेंगी, विधुर इतने दिखाई नहीं पड़ेंगे। मगर कभी-कभी चमत्कार भी होता है, वह स्त्री मर गई। मगर मरते-मरते अपने पति को कह गई कि सुन लो, लफंगे...

ओशो : पत्नी का इतना अधिक प्रेम केवल भारत में घट सकता है, और कहीं नहीं ।

पत्नी का इतना अधिक प्रेम केवल भारत में घट सकता है, और कहीं नहीं । एक बहुत सुन्दर #कहानी है। एक महान दार्शनिक था, विचारक, जिसका नाम था #वाचस्पति। वह अपने अध्ययन में बहुत ज्यादा व्यस्त था। एक दिन उसके पिता ने उससे कहा, अब मैं बूढ़ा हो चला और मैं नहीं जानता कि कब किस क्षण विदा हो जाऊँ! और तुम मेरे इकलौते बेटे हो तो मैं चाहता हूँ, तुम विवाहित हो जाओ। वाचस्पति अध्ययन में इतना ज्यादा डूबा हुआ था कि वह बोला, ‘ठीक है’, यह सुने बगैर कि उसके पिता क्या कह रहे हैं। तो उसका विवाह हुआ, पर वह बिलकुल भूला रहा कि उसकी पत्नी थी, इतना डूबा हुआ था वह अपनी अध्ययनशीलता में।और यह केवल भारत में घट सकता है; यह कहीं और नहीं घट सकता। पत्नी उससे इतना अधिक प्रेम करती थी कि वह उसे अड़चन नहीं देना चाहती। तो यह कहा जाता है कि बारह वर्ष गुजर गये। वह छाया की भाँति उसकी सेवा करती, हर बात का ध्यान रखती, लेकिन वह जरा भी शांति भंग न करती। वह न कहती, ‘मैं भी हूँ यहाँ, और क्या कर रहे हो तुम?’ वाचस्पति लगातार एक व्याख्यान लिख रहा था जितनी व्याख्याएँ लिखी गयी हैं, उनमें से एक महानतम व्याख्या। वह बादरायण के ब्रह्म सूत्र पर भाष्य ...

ओशो : बोध कथा : ग्रंथियां

बोध-कथा ग्रंथियां C O M P L E X E S बुद्ध  एक दिन सुबह-सुबह प्रवचन देने आए और  हाथ में एक रूमाल ले कर आए।  लोग बहुत चकित थे, क्योंकि वे कभी कुछ ले कर आते न थे, हाथ में रूमाल आज क्यों था? रेशमी रूमाल था, और बैठ कर इसके पहले कि प्रवचन दें, उन्होंने, रूमाल पर एक गांठ के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, चौथी, पांचवीं–पांच गांठें लगायीं। लोग बिलकुल देखते रहे टकटकी बांध के कि क्या हो रहा है? क्या कर रहे हैं वे? क्या आज कोई जादू का खेल दिखाने वाले हैं?और पांचों गांठें लगाने के बाद बुद्ध ने पूछा कि भिक्षुओं, मैं एक प्रश्न पूछता हूं।अभी-अभी तुमने देखा था, यह रूमाल बिना गांठों के था, अब गांठों से भर गया। क्या यह रूमाल वही है जो बिना गांठ का था या दूसरा है ? उनके शिष्य आनंद ने कहा कि भगवान, आप हमें व्यर्थ की झंझट में डाल रहे हैं। क्योंकि अगर हम कहें यह रूमाल वही है, तो आप कहेंगे, उसमें गांठें नहीं थीं, इसमें गांठें हैं। अगर हम कहें यह रूमाल दूसरा है, तो आप कहेंगे, यह वही है। अरे, गांठों से क्या फर्क पड़ता है, रूमाल तो बिलकुल वही का वही है। यह रूमाल एक अर्थ में वही है जो आप लाए थे, क्यो...

ओशो : तो तुम्हे मिला है, उसके प्रति धन्यवाद से भरो।

तुम दुखी हो सकते हो, तुम शिकायते किये चले जा सकते हो कि जीवन ने तुम्हारे साथ न्याय नहीं किया। लेकिन स्मरण रखो कि शिकायत का तुम्हारा यह दृष्टिकोण तुम्हे और भी दुखी करता चला जाएगा क्योंकि तुम उस सबसे चूकते जाओगे जो तुम्हे दिया गया है। तो तुम्हे मिला है, उसके प्रति धन्यवाद से भरो। और जीवन ने तुम्हे इतना दिया है कि हर धन्यवाद छोटा पड़ जाये। तुम अहोभाव से जीते हो, तो तुम पोषित होते हो।                          ओशो प्रेम को प्रार्थना बनाओ

ओशो : प्रतीक्षा करना सीखो।

प्रतीक्षा करना सीखो। धैर्यवान बनो और यकीन करो कि अस्तित्व तुम्हें वह सब देगा जिसे लेने तुम तैयार हो, तुम्हें सिर्फ गहरे ध्यान में चले जाना है। मस्तिष्क के परे मौन में।न कोई विचार रहे,न मनोभाव न मूड, केवल एक मौन सजगता और प्रतीक्षा रहे, उसके लिए जो अस्तित्व तुम्हारे लिए खोज कर लाता है जिसके लिए तुम तैयार हो। ओशो 

ओशो : पतंजलि के ध्यान और झाझेन में क्या अंतर है ?

पतंजलि के ध्यान और झाझेन में क्या अंतर है ? पतंजलि का ध्यान एक चरण है, उनके आठ चरणों में एक चरण है ध्यान। झाझेन में, ध्यान ही एकमात्र चरण है, और कोई चरण नहीं है। पतंजलि क्रमिक विकास में भरोसा करते हैं।  झेन का भरोसा सडन एनलाइटेनमेंट, अकस्मात संबोधि में है। तो जो केवल एक चरण है पतंजलि के अष्टांग में, झेन में ध्यान ही सब कुछ है —झेन में बस ध्यान ही पर्याप्त होता है, और किसी बात की आवश्यकता नहीं। शेष बातें अलग निकाली जा सकती हैं। शेष बातें सहायक हो सकती हैं, लेकिन फिर भी आवश्यक नहीं—झाझेन में केवल ध्यान आवश्यक है। ध्यान की यात्रा में —प्रारंभ से लेकर अंत तक सभी आवश्यकताओं के लिए—पतंजलि एक पूरी की पूरी क्रमबद्ध प्रणाली दे देते हैं। वे ध्यान के बारे में सब कुछ बता देते हैं। पतंजलि के मार्ग में ध्यान कोई अकस्मात घटी घटना नहीं है, उसमें तो धीरे — धीरे, एक —एक कदम चलते हुए ध्यान में विकसित होना होता है। जैसे —जैसे तुम ध्यान में विकसित होते हो और ध्यान को आत्मसात करते जाते हो, तुम अगले चरण के लिए तैयार होते जाते हो। झेन तो उन थोड़े से दुर्लभ लोगों के लिए है, उन थोड़े से साहसी लोगों के लिए है,...

ओशो : माया क्या है ?

 माया क्या है ? माया का अर्थ है: जो नहीं है, नहीं हो सकता है, लेकिन जिसका आभास होता है। और आभास का हम रोज—रोज पोषण करते हैं। एक स्त्री के तुम प्रेम में पड़ गए। फिर विवाह का संयोजन किया। चला, जादू शुरू हुआ! विवाह का आयोजन जादू की शुरुआत है। अब एक भ्रांति पैदा करनी है। यह स्त्री तुम्हारी नहीं है, यह तुम्हें पता है अभी। अब एक भ्रांति पैदा करनी है कि मेरी है, तो बैंड – बाजे बजाए, बारात चली, घोड़े पर तुम्हें दुल्हा बना कर बिठाया। अब ऐसे कोई घोड़े पर बैठता भी नहीं। अब तो सिर्फ दुल्हा जब बनते हैं, तभी घोड़े पर बैठते हैं। छुरी इत्यादि लटका दी। चाहे छुरी निकालना भी न आता हो, चाहे छुरी से साग-सब्जी भी न कट सकती हो; मगर छुरी लटका दी। मोर-मुकुट बांध दिए। बड़े बैंड—बाजे, बड़ा शोरगुल – चली बारात! यह भ्रांति पैदा करने का उपाय है। यह एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। तुम्हें यह विश्वास दिलाया जा रहा है: कोई बड़ी महत्वपूर्ण घटना घट रही है! भारी घटना घट रही है! फिर मंत्र, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ… चलती है प्रक्रिया लंबी। वह प्रक्रिया सिर्फ मनोवैज्ञानिक है, हिप्नोटिक है। उसका पूरा उपाय इतना है कि यह सम्मोहन गहरा बै...

ओशो : हृदय का द्वार

 सिर्फ,         ह्रदय का द्वार                   खुला हो... एक वैज्ञानिक ने  एक अदभुत काम किया इधर।  कैक्टस का  एक पौधा,  जिसमें कांटे ही  कांटे होते हैं  और जिसमें कभी  बिना कांटे की कोई  शाखा नहीं होती,  एक अमरीकन  वैज्ञानिक उस पौधे को  बहुत प्रेम करता रहा।  लोगों ने तो समझा  कि पागल है,  क्योंकि  पौधे को प्रेम करना!  अरे आदमी को ही  प्रेम करने वाले को  बाकी लोग  पागल समझते हैं,  तो पौधे को  प्रेम करने वाले को तो  कौन  समझदार समझेगा!  उसके  घर के लोगों ने भी  समझा कि दिमाग  खराब हो गया है।  वह सुबह से उठता  तो वह  पौधा ही पौधा था।  उसी को प्रेम करता,  उससे बातें भी करता।  तब तो और  पागलपन हो गया।  वृक्ष से तो बातें  हो कैसे सकती हैं?  उस वैज्ञानिक ने  जब यह घोषणा की  कि मैं एक वृक्ष से  बातें शुरू किया हूं  और...

ओशो के सुंदर विचार

वैसा अपने को बनाओ, जैसा तुम चाहते हो दूसरे हों। तुम चाहते हो दूसरे सत्यवादी हों, सत्यवादी हो जाओ। क्योंकि दूसरे भी यही चाहते हैं। तुम चाहते हो दूसरे क्रोध न करें, तुम क्रोध न करो। तुम चाहते हो दूसरे प्रेमवान हों, तुम प्रेमवान हो जाओ।  इसे तुम सूत्र समझ लो। बड़ा बहुमूल्य सूत्र है।  इससे तुम धर्म की कसौटी कर लोगे। तुम जो चाहते हो कि दूसरे करें, दूसरे हों, वैसे ही तुम होने लगो, वही तुम्हारे जीवन का शास्त्र है। कहीं और खोजना नहीं है। ओशो