ओशो : शून्य से प्रवेश
शून्य है दरवाजा
एक मकान में से
सामन को निकालना
शुरू कर दे,
सारा फर्नीचर
बाहर कर दे।
दरवाजे से
फोटुएं निकाल ले,
केलेंडर निकाल लें।
जब सब चीज़ें
निकल जाए तब भी
कुछ पीछे रह जाता है।
तब पीछे क्या रह जाता है ?
खालीपन पीछे रह जाता है।
वह खालीपन ही मकान है ।
पीछे कुछ रह जाता है ?
खाली मकान
पीछे रह जाता है ।
और हम
उस खालीपन में चीज़ें
भरते चले जाएँ और
हम इतनी चीज़ें भर दें
की भीतर जाना
मुश्किल हो जाए ,
तो फिर मकान तो है ,
लेकिन भरा मकान है
जिसमें प्रवेश भी
नही पाया जा सकता ।
मन भी एक मकान है,
जिस मकान में हम
शब्दों को भरते चले जाते है ।
शब्द इतने भर जाते है की
फिर मन के भीतर प्रवेश
मुश्किल हो जाता है ।
कभी अपने भीतर गए है ?
सिवाय शब्दों के वहां
कुछ भी नही मिलेगा ।
भीतर जाएंगे और
शब्द ही शब्द
टकराते मिलेंगे ।
जैसे बाज़ार में चले जाएँ
और आदमी ही आदमी मिलेंगे,
वैसे ही अपने भीतर चले जाएँ
तो सिवाय शब्दों के
कुछ भी नही मिलेगा ।
लेकिन
इन शब्दों की
भीड़ के कारण ही
भीतर प्रवेश नही हो पाता।
जब इन सारे शब्दों को
कोई बाहर फेंक देता है
तब भी आप तो
भीतर रह जायेंगे ।
आप तो शब्द नही है
आप तो कुछ और है ।
शब्द बाहर निकल जायेंगे
फिर भी आप तो बचेंगे ।
जब सारे शब्द
फेंक दिए जाएंगे ,
तब जो बच जाता है
उसका नाम ही आत्मा है।
और जो उसे जान लेता है
वह सत्य को जान लेता है ।
और
जो अपने भीतर
जान लेता है
वह सबके भितर
जान लेता है ।
और जिसे एक वार
उसका दर्शन हो जाता है ,
उसे फिर घड़ी घड़ी ,
सब जगह उसका ही
दर्शन होने लगता है।
इस लिए मैं कहता हूँ
शब्द से नही ,
शास्त्र से नही,
शून्य से दरवाजा है।
शून्य से प्रवेश करने की
जरूरत है।
ओशो
नेति नेति
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